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Friday, July 16, 2010

बुन्देली जीवन-शैली में व्याप्त लोक विश्वास --- डॉ0 उपेन्द्र तिवारी



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली जीवन-शैली में व्याप्त लोक विश्वास
डॉ0 उपेन्द्र तिवारी



हमारे समाज में विपरीत परिस्थितियों में अथवा किसी विपदा के समय जनसामान्य द्वारा कई कार्य इस मान्यता के साथ किये जाते हैं कि इस कार्य से वो विपदा या परेशानी दूर हो जाती है। ऐसे कार्य चाहे वो पूजा पाठ से सम्बन्धित हों, तंत्र-मंत्र से सम्बन्धित हों या टोने-टोटके आदि से सम्बन्धित हों, यदि उस पर लोक की सहमति हो जाती है, उसे लोक से मान्यता मिल जाती है तो वे लोक विश्वास के अन्तर्गत आते हैं। बुन्देलखण्ड में लोक विश्वासों को मुख्यतः पाँच वर्गों में बाँटा जा सकता है।

(क) व्यक्तिगत विश्वास

(ख) सामाजिक विश्वास
(ग) धार्मिक विश्वास
(घ) कृषि आधारित
(ड़) टोने-टोटके

धर्म का जन्म भय की कोख से हुआ है। दैवी आपदा या रोग बीमारी से ग्रस्त होने पर कोई छोटा सा कार्य (भले ही उसका उस बीमारी से कोई सम्बन्ध न हो) होने पर वह आपदा समाप्त हो जाती है या रोगी को आराम मिल जाता है तो उसे उसी पर विश्वास होने लगता है। दूसरे व्यक्ति के पीड़ित होने पर वह उसी कार्य को करने की सलाह देता है। धीरे-धीरे यह समाज में प्रचलित हो जाता है उस पर लोक की सहमति होने पर वह व्यक्तिगत विश्वास, लोक विश्वास बन जाते हैं। कुछ लोक विश्वास बड़े ही वैज्ञानिक हैं, वह या तो धर्म से जुड़े हैं या केवल विश्वास हैं किन्तु लोक से मान्यता प्राप्त कर लोक विश्वास बन गये हैं। उदाहरणार्थ-प्रसूत-गृह के दरवाजे पर बराबर आग जलायी जाती है। जिसकी वैज्ञानिकता यह है कि गाँवो में चिकित्सा की सुविधा न होना तथा गाँव में इतनी सफाई भी नहीं होती, अतः कीटाणुओं से बचाने के लिए एक पात्र में आग जलायी जाती थी जिससे कीटाणु प्रसूति गृह में प्रवेश न करें तथा आग और धुँये से नष्ट हो जायें। यह लोक विश्वास बना कि प्रसूति-गृह ‘सौर’ के दरवाजे आग जलाने से ‘जमूले’ नहीं लगते हैं। ‘जमूले’ एक प्रकार का टिटनिस नुमा रोग है जो नवजात शिशु को हो जाता है। शिशु मृतप्राय हो जाता है या शिशु की मृत्यु हो जाती है जिसे लोक में कहा जाता है कि जमूले शिशु का खून पी गये। जब प्रसूति-गृह के दरवाजे पर आग जलने से जच्चा-बच्चा दोनों स्वस्थ रहे तो प्रसूति-गृह के दरवाजे पर आग जलाने का प्रचलन समाज में प्रचलित हो गया तथा सम्पूर्ण लोक का हृदय जीतने के बाद प्रसविनी स्त्री एवं नवजात शिशु की रक्षार्थ प्रसूति-गृह के दरवाजे पर आग जलाना लोक विश्वास बन गया है।
लोक विश्वास में तंत्र-मंत्र, जादू, टोना-टोटका शामिल हैं। इस लोक जीवन के हर पहलू में कोई न कोई विश्वास देखने को मिल जाता है। जैसे नजर के लिए लोक में ऐसा विश्वास है कि नजर लगने पर बच्चे, युवा बीमार पड़ जाते हैं। नजर उतारने के लिए सबसे ज्यादा प्रसिद्ध तरीका है राई-नौन उसारना अर्थात् सरसों, गेंहू की भूसी, सूखी लाल मिर्च और नमक पीड़ित व्यक्ति के चारों तरफ फेरा लगाकर (उसार कर) उल्टा मुँह करके दोनों पैरों के बीच से जलती हुयी आग में फेंक दिया जाता है। दूसरी विधि में पत्थर का टुकड़ा उसार कर आग में डाल दिया जाता है। नजर अत्यधिक होने पर पत्थर लाल पड़ जाता है। उस पत्थर को निकाल कर पानी में डाल दिया जाता है। पत्थर टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो जाये तो नजर जाती है। इसे पत्थरमारी नजर कहते हैं। तीसरे प्रकार के तरीके में चारपाई की मूँज में रुई लपेट कर बत्तीनुमा बना ली जाती है और इस पर सरसों का तेल लगा दिया जाता है। उसको उसार कर दरवाजे के कुंडे पर बाँध दिया जाता है तथा उसमें आग लगा दी जाती है। नीचे काँसे की थाली में पानी रख दिया जाता है। जले हुए सरसों के तेल की बूँदें नीचे थाली में पानी में गिरती हैं तो एक विशेष प्रकार की साँय-साँय की आवाज करती है। उस पानी को पीड़ित के माथे पर लगा दिया जाता है जिससे नजर उतर जाती है।
नवजात शिशु जिसका प्रसूति-गृह से निष्क्रमण संस्कार न हुआ हो उसके बीमार पड़ने पर दीपावली के एक दिन पहले अर्थात् चतुर्दशी-जिसको नरक चउदस या जमघंट बोलते हैं-के दिन जो दियाली जलायी जाती है उन दियाली को पानी में घिस कर पिलाने से वह रोग मुक्त हो जाता है। दूसरे प्रकार में सात छप्पर के फूस निकाल कर उसको जलाया जाता है। उसकी राख माथे पर लगाने से टोना दूर हो जाता है। दूध देने वाले जानवर नजर या टोने की वजह से दूध देना बन्द कर देते हैं तो उन्हें बया चिड़िया के घोंसले को जलाकर सेंक दिया जाता है। जिससे वह नजर या टोना से मुक्त होकर पुनः दूध देने लगते हैं।
बच्चे मुँह से लार गिराते हैं। ऐसी मान्यता है कि बच्चे की बुआ को लड्डू में लार खिला दी जाये तो बच्चे लार गिराना बन्द कर देते हैं। बच्चे को सूखा रोग होने पर उसे अलस्सुबह चिता पर कपड़े पहने हुए स्नान करा दिया जाता है। बच्चे के कपड़े वहीं उतार कर फेंक दिये जाते हैं तथा लौटते समय पीछे मुड़ कर नहीं देखते हैं। माना जाता है कि इस तरह सूखा रोग ठीक हो जाता है। दूसरे प्रकार में बच्चे को कपड़ों सहित ‘आक’ (अकौआ) के पेड़ पर स्नान करा दिया जाता है। बच्चे के कपड़े निकाल कर पेड़ के ऊपर डाल दिये जाते हैं। जिससे वह पेड़ सूखने लगता है और बच्चा ठीक हो जाता है।
यदि बुखार काफी समय तक ठीक न हो तो शनिवार या बुधवार का सुबह चूल्हे की राख दोनों हाथों में भर कर यह कहते हुए घर से चलें कि चलो गंगा स्नान कर आयें। तिराहे या चौराहा मिलने पर उस राख को वहीं छोड़ दिया जाता है और कहा जाता है कि तुम्हीं चले जाओ गंगा स्नान के लिए। इससे पुराना बुखार अथवा एक दिन छोड़ एक दिन आने वाला बुखार ठीक हो जाता है।
चेचक निकल आने पर शीतला माता की मनौती मानी जाती है। नीम के पेड़ की छोटी सी डाल (जिसे झौंका कहा जाता है) रोगी के पास रख दी जाती है। घर में छोंक, बघार, नहीं लगाया जाता है। मनौती मानने वाला व्यक्ति हजामत, बाल इत्यादि नहीं बनवाता; जूते, चप्पल नहीं पहनता है। प्रतिदिन मन्दिर जाकर शीतला माँ का जलाभिषेक करता है तथा चरणों से बह कर जो जल निकालता है उसे रोगी को पिलाया जाता है। रोगी के ठीक होने पर माँ की विधिवत पूजा की जाती है।
आँखों में इन्फैक्शन होने को ‘आँख आना’ कहा जाता है। इस समय नीम का झौंका सदैव अपने पास रखा जाता है क्योंकि लोक विश्वास है कि नीम में ‘देवी’ का वास होता है। इसीलिए नीम एवं पीपल के हरे पेड़ नहीं काटे जाते हैं।
विवाह के समय भी किये जाने वाले सैकड़ों विश्वास ऐसे ही हैं। मान्यता है कि बारात चली जाने पर सभी देवता, अच्छी आत्मायें बारात के साथ चली जाती हैं किन्तु अनिष्टकारी आत्माओं से निवेदन कर स्त्रियाँ उन्हें रोक लेती हैं। उनके लिए वे रीति-रिवाज रात में होने वाले ‘नकटौरा’ के अन्तर्गत करती हैं। इसमें द्वार-चार, बाजे बजना, पंगत होना, कन्यादान, भाँवर इत्यादि बारात जैसे कार्यक्रम सम्पन्न किये जाते है। इस कार्यक्रम में केवल स्त्रियाँ ही भाग लेती हैं जिनके बीच फूहड, अश्लील शब्द-बातें इत्यादि होती हैं। समझा जाता है कि इससे अनिष्टकारी आत्मायें जादू, टोना, टोटका यहीं रह जाता है तथा विवाह निर्विध्न सम्पन्न हो जाता है। विवाह समय में भाँवर के बीच बधू का भाई धान बोता है। लोक में ऐसा विश्वास है कि इससे बहन धनी होती है।
लोक आत्मा के पुनर्जन्म को मान्यता देता है। अतः जो व्यक्ति अल्पायु में मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं या जिनको मोक्ष प्राप्त नहीं होता है, वह भूत, प्रेत, पिशाच, चुडैल, मसान इत्यादि की योनि को प्राप्त हो जाते हैं। इनके सम्पर्क में आने पर वह उसे परेशान करते हैं। तांत्रिक, गुनिया, ओझा, भगत आदि की विशिष्ट क्रिया के द्वारा उनसे निजात दिलाने का भी लोक में विश्वास किया जाता है।
जीवन के अन्य कार्यों में लोक स्थापित है यथा बुध का बरोसी, मंगलवार को चारपाई तथा छत या छप्पर नहीं डाला जाता है। इस सम्बन्ध में कहावत है कि ‘बुघ बरोसी मंगल खाट, मरै नहीं तो आवै ताप।’
अथवा ‘मंगल मगरी (छत) बुधै खाट, मरै नहिं तो आवे ताप।’
सावन में चारपाई में मँूज नहीं भरवाई जाती है। कहा जाता है कि सावन के महीने की भरी चारपाई पर साँप चढ़ जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसके अतिरिक्त साँप चारपाई पर नहीं चढ़ता क्योंकि वह चारपाई की आन मानता है।
त्यौहार वाले दिन किसी की मृत्यु होने पर उस परिवार में वह त्यौहार खोटा हो जाता है, मनाया नहीं जाता है। उसी दिन पुत्र पैदा हो या गाय बछड़े को जन्म दे तो पुनः उस त्यौहार को मनाने लगते हैं।
लोक में विश्वास है कि शगुन-अपशगुन अपना फल अवश्य देते हैं। यात्रा में निकलने पर नेवला, वेदपाठी ब्राम्हण, दही, मछली, नीलकण्ठ, बालिकायें, मंगल घट रखे स्त्री, सधवा स्त्री, मुर्दा या बछड़े को दूध पिलाती हुई गाय, मेहतरानी, वेश्या देखना शगुन है। कहा भी गया है कि ‘सन्मुख गऊ चुखाबे बच्छा, ई है सगुना सबसे अच्छा।’ इसके विपरीत खाली बर्तन, निपूता इंसान, बाँझ स्त्री, विधवा स्त्री, गधा, काना व्यक्ति या जिसकी एक आँख में कुछ खराबी हो, जिसके वक्षस्थल पर बाल न जमे हों, बिल्लौरी आँखों वाला व्यक्ति या छींक होना अपशगुन माना जाता है। यथा ‘सवा कोस तक मिलै जो काना, लौट आये वह परम सयाना।’
इसके अतिरिक्त अंगों के फड़कने से होने वाले शगुन-अशगुन भी लोक विश्वास हैं। पुरुषों की दाहिनी आँख, दाहिनी भुजा फड़कना शुभ होती है।
यथा- ‘भरत नयन भुज दक्षिण फरकहि बारंहि बार।
जान सगुन मन हरष अति लागे करन विचार।।’ इसी तरह स्त्रियों की बाँयी भुजा, बाँयी आँख फड़कना शुभ होता है।
यथा- ‘मिलन खौं तो बहियाँ फरकै, बहियाँ फरकै।
दरस खों फरक रये दोई नैन।।’
पुरुषों की बाँयी आँख तथा बाँह, स्त्रियों की दाहिनी आँख तथा भुजा फड़कना अपशगुन समझा जाता है।
कृषि सम्बन्धी भी लोक के अनुभव और विश्वास हैं। जैसे ओले पड़ने पर गर्म तवा आँगन में डाल देना ऋतु की आँधी को झाड़ू दिखाना, कुऋतु की वर्षा होने पर बादल को उल्टा मूसल दिखाने पर इस तरह की अनिष्टकारी प्राकृतिक विपदा रुक जाती है। यह भी लोक का कृषिपरक विश्वास है कि अकउवा (मदार) ज्यादा होने पर, कुदवा (धान्य) नीम ज्यादा फलने पर जौ, बबूल के ज्यादा फलने पर धान अच्छा पैदा होता है। यदि कहीं आम में बौर अच्छा आये तो पूरे संवत अर्थात पूरे वर्ष सभी फसलें अच्छी होती हैं।
धार्मिक लोक विश्वासों में सभी धार्मिक कार्य सम्मिलित है। गाय और गंगा मोक्षदायिनी है। मान्यता है कि दान सभी विधि कल्याण करता है। यह लोक का परम विश्वास है कि ईश्वर द्वारा बताये गये पुण्य कार्य करना, ईश्वरवादी या ईश्वर के अधीन रहना, जो ईश्वर की शरण पकड़े रहेगा वह दो पाटों के बीच में नहीं पिस पायेगा अर्थात मोक्ष को प्राप्त कर लेगा।
ये सभी लोक विश्वास हमें समाज में रहकर एक दिशा प्रदान करते हैं और जीने की प्रेरणा देते हैं। हम संघर्ष करते हुए सुख-दुख में साथ रहकर और एक दूसरे को शारीरिक व मानसिक सहारा देकर समाज में परिवार की भावना को सुदृढ़ बनाते चलते हैं।

संगीत,
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई

बुन्देली लोकगीतों में लयात्मक नाद-सौन्दर्य --- डॉ0 वीणा श्रीवास्तव



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली लोकगीतों में लयात्मक नाद-सौन्दर्य
डॉ0 वीणा श्रीवास्तव



नाद ब्रह्म है, ब्रह्म ही जीव है। जीवन में सभी कुछ लय के अन्तर्गत निहित है। बिना लय या गति से सब कुछ निर्जीव है।
विराट प्रकृति लय, ताल, छंद पर नर्तन करती गतिमान है। मनुष्य जीवन संगीतमय हैं। संगीत की इस चतुर्दिक परिव्याप्ति में वाद्य का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि वाद्य की अनुपस्थिति में गायन तथा नृत्य क्रियायें प्रायः पंगु हो जाती हैं। सच तो यह है कि संगीत के इन अवयवों में वाद्य का प्रादुर्भाव हुआ होगा।आदि मानव ने जब बादलों की गम्भीर गड़गड़ाहट, वर्षा की बूंदों की झमझमाहट, तेज हवाओं की सनसनाहट तथा समुद्री लहरों की छपछपाहट आदि सुनी होगी तब ध्वन्यानुकरण पर उसने अपनी तालियों को, लकड़ी अथवा पत्थर के टुकड़ों को बजाया होगा, उस ध्वनि में तन्मय होकर गुनगुनाया होगा तथा प्रसन्न होकर नाचने लगा होगा।
लोक संगीत में लोकवाद्यों की प्राचीनता तथा लोकप्रियता स्वयं सिद्ध है। डमरू देवाधिदेव भगवान शिव की पहचान है। विष्णु शंखधारी हैं। प्रजापति ब्रह्मा ढोल के निर्माता हैं। मुरली कृष्ण की पर्याय है। वाग्देवी वीणापाणि हैं। नारद वीणा, करताल वादक हैं। महाभारत के महासमर का प्रतिदिन आरम्भ तथा अन्त शंख-ध्वनि से किया जाता था फलतः वाद्यों की चिरन्तन धारा अनादिकाल से चली आ रही है और इसका आविष्कार तथा विकास लोक जीवन में ही हुआ है।
लोक जन जीवन सीधा सादा सरल, सहज भाव से एवं निश्चल रूप से गतिमान या प्रवाहित होता रहता है। लोकमन के जीवन से जुड़ी हुई प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति उसके कार्य-विचार यहाँ तक कि प्रकृति भी उसके मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करती रहती है और यह सब किसी न किसी रूप से उसे प्रभावित भी करती है, इसीलिए जब मानव निश्चिन्त होकर कुछ गाता-गुनगुनाता है तो उसके गीतों में स्वतः ही यह सब समाहित हो जाता है। वह कभी मिलन के गीत गाता है, तो कभी विरह के, कभी शृंगार के तो कभी आध्यात्म के, कभी सावन-वर्षा तो कभी बसंत के, कभी उत्सवों के तो कभी त्योहारों के, कभी-झरनों व नदियों की बात तो कभी विन्ध्य पहाड़ियों का शौर्य न जाने कितने ही प्रसंग उसके गीतों की बानगी हुआ करते हैं।
लयात्मकता इन सभी की विशेषता है और इस लय से नाद-सौन्दर्य को द्विगुणित करते हैं लोकवाद्य।
बुन्देलखण्ड अपने लोकगीतों, लोकवाद्यों तथा लोकनृत्यों के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ लोकवाद्यों का प्रयोग लोकगीतों, नृत्यों में संगत देने तथा स्वतंत्र रूप से वादन के लिए किया जाता है। लोकनायक स्वरों को सम बनाने, गीतों को तन्मयता से गाने, गायन के बीच साँस भरने (भाव) तथा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने के लिए लोकवाद्यों का उपयोग करते हैं।
लोकसंगीत सहज एवं प्रकृतितः होता है। इसमें स्वर और ताल प्रधान न होकर लय तथा धुन प्रधान होती है। यह शास्त्रीयता के बन्धन को स्वीकार नहीं करता। यही स्थिति लोकवाद्यों की भी है। लोकजन बाह्याडम्बरहीन बजाने की दृष्टि से उपेक्षित तथा सहज उपलब्ध वस्तुओं से ही बजाने का कार्य ले लेता है। यहाँ तुम्बी से बीन, गोल तुम्बे से इकतारा, बांस, नरकुल से बांसुरी, आम की गुठली से पपीहा, ताड़ या बरगद के पत्तों से पिपहरी आदि बना लिये जाते हैं। यहाँ तक कि थाली, लोटा, कटोरा, सूप, चालन, चिमटा, घड़ा, मटका, ताली एवं चुटकी आदि सभी वाद्य के रूप में प्रयुक्त किये जाते हैं। जहाँ चक्की की घरघराहट तथा चूड़ियों की खनखनाहट के समवेत स्वर में गाती बुन्देली बालाओं की धुनें अन्तर्मन को स्पर्श कर लेती हैं, वहीं ढेकी, ऊखल-मूसल की धमक तथा चूड़ियों की खनक के बीच गाए जाने वाले गीत किसी अन्य वाद्य यंत्र की अपेक्षा नहीं रखते हैं। जलाशयों से पानी लाते जाते समय स्त्रियों के पैर की पैंजनी तथा बिछुआ की रुनझुन की ध्वनि ही उनके गीतों में वाद्ययंत्र होते हैं।
पुत्र जन्मोत्सव की खुशी का इज़हार वे थाली बजाकर कर लेती हैं। ग्र्रामीणजन बैलों के गले में बँधी घंटी, घुँघरू तथा उनके खुरों की टपटपाहट की लय, ढेकली चलाने वाले पानी की सरसराहट तथा ढेकली की चरचराहट, तेल या रस पेरने वाले कोल्हू की मचमचाहट, नाविक के पतवार की छपछपाहट तथा धोबी के कपड़े धोने से उत्पन्न ध्वनि की लय पर मस्ती से गीत गाते देखे सुने जाते हैं। इसके अतिरिक्त बुन्देली लोकवाद्यों में मुख्य रूप से ढोलक, ढप, ढाक, ढपली, मृदंग, अलगोजा, रमतूला, तुरही, शहनाई, बाँसुरी, मंजीरा, झाँझ, करताल, लोटा, चिमटा, एकतारा, केंकडिया, तम्बूरा एवं सारंगी आदि वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ तो स्वतंत्र वाद्य के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं और अधिकतर लोकगीतों, लोकगाथाओं एवं लोकनृत्यों के साथ संगत के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इन सभी के साथ प्रयुक्त संगत वाद्यों का नाद-सौन्दर्य लोकगीतों आदि में चार चाँद लगा देता है।
बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में गीतों के अनुरूप काल, स्थान एवं जाति के अनुसार भी वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। कुछ तो वाद्य ऐसे हैं जिनका प्रयोग स्थान विशेष तथा समय विशेष पर ही किया जाता है। उदाहरण के तौर पर ‘गोटें’ (लोकगीत का एक प्रकार) प्रत्येक समय, काल तथा स्थान पर नहीं गाई जातीं। यह भादौं महीने की चौथ को देव-चबूतरे पर ‘ढाक-वाद्य’ के साथ पूजा के समय ही गाई जाती हैं।
कहना न होगा कि बुन्देली लोक जीवन में हमें वाद्यों के मुख्य दो स्वरूप मिलते हैं-प्रथम मनुष्य की क्रियायें वाद्य का स्वरूप धारण कर लेती हैं जैसे ढेकली चलाने से उत्पन्न ध्वनि या चकिया की घरर-घरर की ध्वनि। इन क्रियागत ध्वनियों को हम क्रिया-वाद्य का नाम दे सकते हैं। दूसरे प्रकार के वाद्यों को हम वाद्यों के स्वरूप से ही सामने लाते हैं, उदाहरण के लिए ढोलक, ढाक, मंजीरा आदि।
प्रत्येक क्रिया-वाद्य का अपना एक स्वर होता है जिसको आधार स्वर मानकर बुन्देली जन अनायास गीत गाने लगते हैं। इन सरल एवं सहज ग्रामीणजन को तो स्वर और लय का ज्ञान ही नहीं होता परन्तु प्रकृति एवं पीढ़ियाँ इनके मानस, हृदय एवं संस्कारों में कब प्रवेश कर जाती हैं पता ही नहीं चलता। चक्की चलाते समय, बैलों की चाल पर उनके गले में बँधी घंटी की लय पर, धोबी के कपड़े धोने की आवाज की लय आदि पर बुन्देली जन लोकगीत गाते हैं। जब इसे ग्रामीणजन नियमित लय में बाँध लेते हैं तब इन लोकगीतों का लयात्मक नाद-सौन्दर्य देखते ही बनता है।
‘चक्की’ का लोकवाद्य के रूप में प्रयोग कितना सार्थक है, इसका उदाहरण एक जनश्रुति के रूप में मुझे मिला है-
बुन्देलखण्ड के पन्ना राज्य के राजा अमान सिंह एक बार भेष बदलकर अपने राज्य में प्रजा के हाल-चाल लेने के उद्देश्य से घूमने निकले। एक महिला अपने घर में चक्की चला रही थी साथ ही गा भी रही थी-‘‘ढुंढवा दियो राजा अमान हमाई खेलत बेंदी गिर गई।’’
राजा ने सुना, उन्हें वह गीत बहुत पसन्द आया। राजा ने उस मकान के बाहर एक चिन्ह बनाया और वापस चले आए। सबेरे उन्होंने अपने सिपाही भेजे और कहा कि जिस मकान पर ऐसा चिन्ह बना हो, उस घर की महिला को ले आओ। सिपाही तुरन्त गए और यह मानकर कि इस महिला ने जरूर कोई अपराध किया है, उसे जबरन पकड़ कर ले आए। महिला आते ही गिड़गिड़ाने लगी, बोली ‘‘मराज, हमसैं का गलती भई जो हमैं पकरवा लओ।’’ राजा बोले, ‘‘बाई हमनैं तुमै पकरवाओ? अरे हमनै तो तुमै बुलाओ तो। खैर! इन सिपाइयन सें तो हम बाद खां निपटैं। और बाई गलती तो तुमसैं भई हय। पैलें जा बताइए तैं रातैं का गा रई ती?’’ ‘‘मराज, हम तो फाग गा रए ते।’’ ‘‘अरे फागैं तो हमने बौत सुनी, फागैं तो ऐसी नई गाई जात। जे कितै की है?’’ ‘‘मराज, जा डिड़खरयाऊ फाग आय। एक दायं आपकै इतैं सैं चैतुआ चैत काटबे हमाए उतै ‘उबौरा’ गाँव गए ते। हमाओ आदमी हतो नईं सो हमनै जाय राख लओ और बई के संगैं हम इतै आ गए। जा फाग हमाए उतई ‘बीजौरबाघाट’ के ओरईं की हय, उतई जाको जनम भओ।’’ महाराज बोले ‘‘तो जा बता, तैं हमाओ नाँव लै के काय गा रई ती।’’ ‘‘आंहां मराज! हम आप खों नाँव लै के काय खां गा रए ते।’’ ‘‘काय हमईं तो राजा अमान सिंह हैं।’’ ‘‘मराज, हमैं का पता, हम तो अपएं आदमी खों नाँव लय रए ते। हमाए आदमी को नाँव ‘अमना’ है हमने बाय थोड़ो नैक सुदार लओ और अपएं आदमी से सैंया, बलमा, राजा कत हईं हैं, सो बोई हम गा रए ते।’’
राजा मन ही मन उसके गाने से प्रसन्न तो थे ही और यह बात वह महिला भी समझ रही थी। राजा बोले, ‘‘तोय सजा तो मिलहै।’’ वह बोली, ‘‘ठीकई है मराज, तो जौन सजा दैनी होय हमें मंजूर हय।’’ राजा बोले, ‘‘जौन फाग तैं रातें गा रई ती, बई फिर सैं सुनाउनै परहै। महिला बोली, ‘‘ठीक है मराज तो हमाईयु एक सर्त है-चकिया मंगाउनी परहै, तबही हम गा सगत।’’ राजा बोले, ‘‘काय, का बिना चकिया के तैं नईं गा सकत?’’ ‘‘आंहां मराज, चकिया तो मँगाउनैइ परहै।’’ राजा ने तुरन्त चक्की व अनाज मँगवाया। एक पिछोरा की आड़ की गई। फिर उसने चक्की के स्वर और लय पर वही फाग राजा को सुनाई। राजा बहुत प्रसन्न हुए बोले, ‘‘बाई हम तुमाए गाबैं से बहुतईं खुस हैं। तुम हमाई प्रजा हो, बताओ तुमाई बैंदी काए की हती, हम बाय ढुँढबाबैं की कोसिस करहैं।’’ महिला सहज हो बोली, ‘‘मराज हमाईं बैंदी तो लाख की हती।’’ राजा बोले, ‘‘ठीक है बाई तुम पन्द्रह दिन बाद आइयो हम तुमाईं बैंदी ढुँढवा दैंहैं।’’
पन्द्रह दिनों बाद राजा ने महिला को स्वयं बुलवाया और कहा, ‘‘बाई! हमनै तुमाई बैंदी ढुँढबाबै की बहुतई कोसिस करी। तुमाईं बा लाख की बैंदी तो मिली नहीं, हमने ‘सवा लाख’ की बनवा दई।’’ और राजा ने सवा तोले सोने की बैंदी जिसमें बीच में ‘हीरा’ जड़ा था तथा हीरे के चारों ओर ‘पन्ना’ की रवार लगी थी, उस महिला को भेंट की।

रीडर एवं विभागाध्यक्ष, संगीत,
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई

बुन्देली बाल लोक साहित्य में मामुलिया --- डॉ0 हरीमोहन पुरवार



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली बाल लोक साहित्य में मामुलिया
डॉ0 हरीमोहन पुरवार



ज्येष्ठ की तपती दोपहर और उसके बाद असाढ की उमसभरी सड़ी गर्मी, परिवार, समाज के वातावरण को कुछ ऐसा गरमा देती है कि सब कुछ उजड़ा सा हो जाता है और फिर श्रावण में वर्षा की फुहार से सभी का मन-मयूर नृत्य करने लगता है। वर्षा आई और बुन्देलखण्ड की पथरीली भूमि में हँसी-खुशी की एक ऐसी सरिता प्रवाहित होती है जिसकी निर्मल शान्त धारा में परिवार एवं समाज रसमय मधुर एवं प्रेम से सराबोर हो, निर्मल, स्वच्छ वातावरण का सृजन करती है। इसी निर्मल स्वच्छ वातावरण के सृजन में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता बुन्देली ललनाओं का सुप्रिय खेल ‘मामुलिया’ प्रारम्भ हो जाता है।
‘मामुलिया’ के इस खेल में बालिकायें बेर अथवा बबूल की एक कँटीली टहनी लेती हैं और उसे किसी लीप-पोत कर स्वच्छ पवित्र किये हुए स्थान पर रखती है। इस कँटीली टहनी से ही ‘मामुलिया’ की स्थापना होती है और उस समय सभी बालिकायें समवेत् स्वर में गाती हैं-
‘‘छिटक मोरी मामुलिया
मामुलिया के दो दो फूल, छिटक मोरी मामुलिया।
कहाँ लगा दऊं मामुलिया, छिटक मोरी मामुलिया।
अंगना लगा दऊं मामुलिया, छिटक मोरी मामुलिया।’’
कँटीली टहनी की स्थापना के बाद उसका अलंकरण किया जाता है। उस टहनी पर जितने भी काँटे होते हैं उन सब पर तरह-तरह के फूल लगाये जाते हैं और देखते ही देखते उस कँटीली टहनी का कँटीलापन समाप्त हो जाता है और वहाँ मन मोहने वाले विभिन्न प्रकार के पुष्पों की अलौकिक छटा बिखर जाती है। मामुलिया के अंलकरण के समय सभी बालिकायें फूल सजाते गाती हैं-
‘‘ल्याइयो ल्याइयो रतन जड़े फूल, सजइयो मोरी मामुलिया
ल्याइयो गेंदा हजारी के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो चम्पा चमेली के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो घिया तुरैया के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो सदा सुहागन के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।’’
जब मामुलिया सज जाती है फिर रोरी अक्षत चन्दन से उसका पूजन किया जाता है। सभी बालिकायें बारी-बारी से जल छिड़क कर, प्रसाद चढ़ाकर पूजन करती हैं और मिलकर गाती हैं-
‘‘चीकनी मामुलिया के चीकने पतौआ
बरा तरें लागली अथैया
कै बारी भौजी, बरा तरें लागी अथैया
मीठी कचरिया के मीठे जो बीजा
मीठे ससुर जू के बोल
कै बारी भौजी, मीठे ससुर जी के बोल
करई कचरिया के करए जो बीजा
करये सासू के बोल
कै बारी भौजी, करये सासू के बोल।’’
पूजन के पश्चात फिर मामुलिया की परिक्रमा करते हुए बालिकायें गाती हैं-
‘‘चली चकौटी चली मकौटी, चंदन चौका करियो लाल
ऊ चौका में बैठे बीरन भइया, पागड़िया लटकावैं लाल
उन पागड़ियन के फूल मुरत हैं, बीनत हैं भौजइयां लाल
झिलमिल झिलमिल दिया बरत है, परखत है भौजइयां लाल
एक रुपइया खोंटो कड़ गओ, मार भगाई भौजइयां लाल।’’
और परिक्रमा करते हुए मामुलिया को हाथ में उठाकर फिर नृत्य प्रारम्भ हो जाता है और लोकवाणी का प्रस्फुटन बालिकाओं की बोली में मुखरित हो उठता है-
‘‘मामुल दाई मामुल दाई
दूध भात ने खायें
बतुरी के धोखे
बिनौरा चबायें।’’
मामुलिया नृत्य के समय कई गीत गाये जाते हैं। एक बानगी इस प्रकार भी है -
‘‘नानों पीसों उड़ उड़ जाय
मोटो पीसों कोऊ न खाय
नई तिली कै तेल, तिलनियां लो लो लो
नये हंडा कौ भात, बननियां लो लो लो।’’
मामुलिया के खेल की समाप्ति के बाद उसे तालाब, पोखर अथवा नदी में विसर्जित करने के लिए सब लड़कियाँ जाती हैं और जल में प्रवाहित करते समय गाती हैं-
‘‘जरै ई छाबी तला कौ पानी रे
मोरी मामुलिया उजर गई।’’
इन पंक्तियों में भारतीय वेदान्त का सार तत्त्व निहित है। जीवन जल के समान है जिसमें नहाकर मामुलिया रूपी आत्मा और अधिक निखर उठती है। मामुलिया विसर्जन के पश्चात सभी लड़कियाँ अपने-अपने घरों को बापस लौटते हुए गाती जाती हैं-
‘‘चंदा के आसपास, गौओं की रास
चंदा के आसपास, मुतियन की रास
बिटिया खेले सब सब रात
चंदा राम राम लेव
सूरज राम राम लेव
हम घरैं चलें।’’
और ये लड़कियाँ आपस में विदाई के समय भी ठिठोली करते हुए गाती हैं-
‘‘चूँ चूँ चिरइयां, बन की बिलैया
ताते ताते माड़े, सीरे सीरे घैला
सो जाओ री चिरैंया
उठो उठो री चिरैंया
तुमाये दद्दा लड़ुआ ल्याये।’’
मामुलिया देखने में बड़ा सहज और साधारण सा खेल दिखता है परन्तु इस खेल का मनोविज्ञान अति सुन्दर है। इस खेल के माध्यम से लड़कियों को जो शिक्षा दी जाती है वह लड़कियों के जीवन को सुखी बनाने एवं समाज में आनन्द की सरिता बहाने का कार्य करती है।
परिवार में, समाज में नित, निरन्तर नयी नयी कठिनाईयाँ, मुश्किलें, परेशानियाँ, उलझने आदि आती रहती हैं। इन सबको काँटों की संज्ञा यदि दे दी जाये तो हम पाते हैं कि मामुलिया में प्रत्येक काँटे को पुष्प द्वारा सजाया जाता है अर्थात् स्त्री अपने व्यवहार, कर्म, आदि से परिवार व समाज की सभी कँटीली समस्याओं को पुष्परूपी समाधानों द्वारा सजाकर, सुखमय, आनन्दमय वातावरण की सृष्टि करती है।
इसी मामुलिया का एक अन्य विश्लेषण भी दर्शनीय है। जब कन्या का विवाह होता है तब उसे यह शिक्षा दी जाती है कि -
‘‘सम्राज्ञी श्चशुरे भव सम्राज्ञी श्रृश्वां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषुं।’’
वधू! तुम घर में सास, ससुर, ननद और देवर सबके हृदय की महारनी बनो। सबको अपने प्रेम, सेवा और सद्व्यवहार से जीत लो।
मामुलिया सजाना, मामुलिया सजाने का भाव मन में होना और सजावट का कृत्य करना, यही प्रेम, सेवा और सद्व्यवहार की शिक्षा प्रदान करता है। मनुस्मृति में यही व्यवस्था दी गई है-
‘‘अन्योन्यस्याव्यभीचारा भवेदामरणान्तिकः।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्री पुसंयो परः।।
अर्थात् स्त्री पुरुष मरणपर्यन्त धर्म, अर्थ आदि में परस्पर अभिन्न होकर रहे। यह स्त्री-पुरुष का श्रेष्ठ धर्म संक्षेप में जानना चाहिए और यही मामुलिया का स्वरूप है। मामुलिया का सत्त्व वास्तव में बड़ा ही प्रेरणास्पद है। इसके विषय में कहा जाता है-
‘‘बीन बीन फुलवा लगाई बड़ी रास
उड़ गये फुलवा रै गई बास।’’
मामुलिया मात्र एक खेल ही नहीं है वह तो सम्पूर्ण सामाजिक अनुष्ठान है। तभी तो कहा गया जाता है-
‘‘मौत में मुसकाबो सिखाबै
सिसकावै सैं छुटकारो गुआवै
जौ मामुलिया कौ अनुस्टान।’’
मामुलिया का भौतिक स्वरूप भी दर्शनीय है। आजकल शहरों के बड़े बड़े ड्राईगरूमों में ‘मामुलिया’ एक सजावट का साधन बनी दिखलाई पड़ती है परन्तु बुन्देली भावनाओं के अनुरूप मानव का प्रकृति के साथ तारतम्य के अनुपम कड़ी के रूप में मामुलिया की प्रतिष्ठा आज भी माननीय है। फूलों को कोटों के ऊपर सजाने की विश्वप्रसिद्ध जापानी कला ‘इकेबाना’ शायद इसी मामुलिया का परिमार्जित स्वरूप है।
इन्हीं सब बातों से मामुलिया का खेल सभी खेलों में सिरमौर हो जाता है। बुन्देली कवि माध्ाौशुक्ल मनोज सागर ने तो यहाँ तक कहा है-
‘‘मामुलिया तोरे आज हिमालय की चिट्टानें दिरकीं
देश की आजादी ने जिन पै खून की बूँदैं छिरकीं
देश की जनता चली बरसने, बदरा वन के मामुलिया
दुश्मन के सिर पै ओरे बन, टपक चली मोरी मामुलिया
मामुलिया तोरे आ गये लिबौआ, ढुड़क चली मोरी मामुलिया।’’
और मामुलिया केवल बालिकाओं के मनोरंजन का साधन ही नहीं बनती बल्कि वह तो समस्त मानव-समाज के लिए प्रेरणा का कारण बनती है।

निदेशक बुन्देलखण्ड संग्रहालय,
बलदाऊ चौक, उरई जालौन

बुन्देलखण्ड का लोकसाहित्य -- अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देलखण्ड का लोकसाहित्य
अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’



बुन्देलखण्ड में लोक साहित्य की समृद्ध वाचिक परम्परा है। बुन्देली भाषा की रचनाओं का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। इस सहस्त्राब्दी के कालखण्ड में लोक साहित्य की विभिन्न विधाओं का सृजन और विकास हुआ है। मूल रचनाकारों द्वारा रचा गया साहित्य अपनी प्रासंगिकता तथा लोकाभिरुचि के कारण लोककंठ में बसकर लोक की थाती बनता गया। काल के प्रवाह में लोक की सीमाओं और परिवर्तित परिस्थितियों के परिणामस्वरूप मूलरचना में परिवर्तन होते रहे। इसी लिए विभिन्न स्थानों पर एक की रचना के अनेक पाठान्तर मिलते हैं। लोक साहित्य की इस वैविध्यपूर्ण विरासत में लोकगीत, लोकगाथायें, लोककथायें एवं लोकसुभाषित (लोकोक्तियाँ अर्थात कहावतें, मुहावरे तथा बुझौअल अर्थात पहेलियाँ) सम्मिलित हैं।
लोकगीत
जनमानस अपना उल्लास और कसक लोक गीतों कें माध्यम से व्यक्त करता है। सौन्दर्य, मधुरता, करुणा और वेदना से सराबोर ये गीत सैकड़ों वर्षों की परम्परा में जनमन में इतने बस गये हैं कि किसी को इन गीतों में ‘उत्स’ का पता नहीं होता है। यदि किसी गीत का रचनाकार ज्ञात होता है तो उसे लोकगीत की श्रेणी में परिगणित नहीं किया जाता है।
इन गीतों का लोकत्व यह है कि इनकी अपनी विशिष्टि धुनें यमुना से नर्मदा तक और चम्बल से टौंस तक सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में एक जैसी गायी जाती रही हैं, गायी जाती हैं, और गायी जाती रहेंगी। स्थान दूरी पर होने वाले भाषागत या उच्चारणगत परिवर्तनों के अलावा उनमें कोई विशेष अन्तर नहीं होता है। स्वर, रागरागिनी वही रहती है, केन्द्रीय भाव वही हैं, एक दो पंक्तियों को छोड़कर गीत ज्यों के त्यों मिलते हैं।
यह गीत लिखित में कम, वाचिक परम्परा में अधिक हैं। इस क्षेत्र में सर्वेक्षण करते समय मुझे यह सुखद आश्चर्य हुआ कि यह गीत उन महिलाओं के कंठों में सबसे अधिक सुरक्षित हैं, जिन्होंने न तो पोथी पढ़कर अक्षर ज्ञान पाया और न जो कागज का एक अक्षर बाँच सकती हैं परन्तु उनमें स्मरण शक्ति गजब की है। उन्होंने परम्परा से इसे सुना, सुनकर यदि किया और वे अपनी पीढ़ियों को देने को तैयार हैं किन्तु आज के कथित शिक्षाधारी युवक/युवतियाँ इस सांस्कृतिक विरासत को ग्रहण करने से कतरा रहे हैं। इस विलुप्तोन्मुखी विरासत को जितने शीघ्र लिपिबद्ध, स्वरबद्ध तथा अन्य तरीकों से संरक्षित किया जा सके वह लोक संस्कृति के हित में है।
बुन्देलखण्ड में घर-घर होने वाले पारिवारिक समारोह तथा मांगलिक आयोजन इन्हीं गीतों और संगीत के साथ आयोजित होते हैं। हृदय की कोमल भावनायें इन गीतों में सहजता के साथ व्यक्त हुई हैं। इस क्षेत्र में प्राप्त लोकगीतों को निम्न कोटि में विभाजित किया जा सकता है -
1 देवी देवताओं के पूजा विषयक गीत
2. संस्कार गीत

3. बालक/बालिकाओं के क्रीड़ात्मक उपासना गीत

4. ऋतु विषयक गीत

5. शृंगार गीत

6. श्रमदान गीत

7. जातियों के गीत

8. शौर्य /प्रशस्ति गीत

9. स्फुटगीत


देवी-देवताओं के पूजा विषयक गीत
बुन्देलखण्ड आस्था और भक्ति का प्रदेश है। यहाँ आदर्शों के प्रति आस्था ने लाला हरदौल जैसे मनुष्य को देवत्य प्रदान किया है। विष पीकर भी भावज के चरित्र की निष्कलंकता उन्होंने प्रमाणित की, बहिन की याचना की रक्षा की और इसने उन्हें अमरत्व दिया। हरदौल यहाँ के लोकदेवता हैं। गीत हर विवाह का मांगलिक कार्य में गाये जाते हैं। हनुमान जी पवन के पुत्र हैं, आँधी-अंधड़ से विनाश को रोकने वाले हैं, उनकी निर्विध्नता के प्रति यह आस्था लोकगीतों में मुखरित हुई है। राम और कृष्ण तो यहाँ घर-घर बसे हैं। हर कार्य अवसर पर उनकी पूजा का विधान है, उनके जीवन का अनुरक्षण है। कार्तिक-स्नान पर्व में महिलायें उनके चरित्र विषयक गीत प्रभात बेला में झुण्डों में निकलकर गाती है।
महिषमर्दिनी माँ दुर्गा तथा शारदा यहाँ की अधिष्ठात्री हैं। महिषासुर को लोकभाषा में मइखासुर या मइकासुर भी कहते हैं। उनका मर्दन करने वाली माँ यहाँ विपत्तियों से रक्षा के लिए विशेष पूज्य हैं। देवी के प्रति यह आस्था ‘अचरियों’ में व्यक्त होती हैं। अचरियाँ धुनों के आधार पर छह प्रकार की मिलती हैं। झूला की अचरी, शब्द बानी, (भजन) डंगइया, अमान, जिकड़ी तथा माँ वाली अचरी। शारदीय तथा बासंतिक दोनों नवरात्रियों में हर गाँव नगर अचरियों के इस मंगल गायन से भक्तिमय हो जाता है।
अचरियाँ केवल दुर्गा माँ की ही नहीं, सीता माँ, राधाजू, कालका माँ और उनके आगे चलने वाले भैरव बाबा की भी मिलतीं हैं। इसी क्रम में लांगुरिया गीत आते हैं।
शक्ति पूजा में ‘माई का मार्ग’ पूजने का विधान है। इस पूजा में शक्ति और गणेश के ‘मायले’ गाये जाते हैं। कारसदेव की गोटें भी पशुरक्षा की पूजा में कथा के रूप में गाई जाती हैं। इन गीतों पर पुरुषों तथा महिलाओं का समान अधिकार है। ‘कार्तिक गीत’ केवल महिलायें गाती हैं। गोटें केवल पुरुष गाते हैं।

संस्कार गीत
बुन्देलखण्ड का लोक जीवन सुसंस्कृत है। हिन्दू शास्त्रों में वर्णित सभी संस्कार यहाँ विधिविधानपूर्वक करके जातक (व्यक्ति) को संस्कारित किया जाता है। यह मांगलिक संस्कार संगीत की लय और ताल पर लोकगीतों के साथ होते हैं। संस्कार निम्नलिखित हैं-
1 गर्भाधान संस्कार
2 पुंसवन संस्कार

3 सीमन्तोन्नयन (सीमन्त संस्कार)
4 जातकर्म संस्कार

5 नामकरण संस्कार
6 निष्क्रमण संस्कार

7. अन्नप्राशन संस्कार
8. चूड़ाकर्म संस्कार

9. वेदारंभ संस्कार
10. उपनयन संस्कार

11. कर्णवेधन संस्कार
12. समावर्तन संस्कार

13. विवाह संस्कार
14. वानप्रस्थ संस्कार

15. संन्यास संस्कार
16. अन्त्येष्टि संस्कार


उक्त संस्कारों में प्रथम तीन जन्म-पूर्व के हैं। अतः इनके अन्तर्गत माता का संस्कार किया जाता है। शेष संस्कार जन्मोपरान्त जातक के किये जाते हैं। किसी माता की कितनी भी संतानें हों, उसका संस्कार प्रथम संतान होने के पूर्व होता है। परवर्ती संतानों के होने पर माता के यह संस्कार नहीं कराये जाते हैं। इन सभी संस्कारों के अवसर पर अनेक प्रकार के लोकगीत गाये जाते हैं। यह गीत प्रायः महिलायें गातीं हैं। अन्य लोकवाद्यों के साथ ढोलक का प्रयोग प्रचुरता के साथ होता है।
महत्वपूर्ण तथ्य है कि इस क्षेत्र में राम और कृष्ण का प्रभाव इतना व्यापक है कि अधिकांश संस्कार राम-सीता और राधा-कृष्ण के जीवन प्रसंगों पर आधारित हैं। हर परिवार में जन्मा बालक ‘राम’ या ‘नंदलाल’ होता है और कौशल्या या जशोदा की कोख से जन्मता सा लगता है। उसके जन्म पर वही उल्लास और हर्ष पाया जाता है जो कभी अवध और ब्रज में छाया था। यह कहा जा सकता है कि इन संस्कारों में लोक-गायन के क्षणों में बुन्देली धरती पर ब्रज और अवध उतर आता है।
अनेक संस्कार कर्मकाण्डी पण्डितों के बजाय कोकिलकण्ठी महिलाओं के पावन स्वरों से अभिसिंचित होते हैं। आश्चर्य यह है कि इन गीतों के गायन में रुचि रखने वाली महिलायें और पुरुष निरक्षर या अल्पशिक्षित हैं किन्तु यह लोकगीत उनकी स्मृतियों में इस तरह बस गये हैं कि पढ़े लिखे व्यक्तियों की स्मरण शक्ति पराजित हो जाती है। आप सिर्फ उनके तार छेड़ दीजिए फिर उनके बोल अपने आप फूट पड़ेंगे। स्मृतियों की यह अविचल और लोक व्याप्त परम्परा ही लोक संस्कृति को जीवित रखे हैं। इन संस्कारों गीतों में आधार-विधान भी व्यक्त होता चलता है।

बालक-बालिकाओं के क्रीड़ात्मक-उपासना गीत
बालक-बालिकाओं में प्रारम्भिक अवस्था में ही जीवन-यात्रा की दीर्घकालिक तैयारी, कला और संगीत के प्रति अभिरुचि सौन्दर्य बोध का विकास, संघर्ष के साथ भी मृदुल समरसता एवं समृद्धि का समन्वय तथा जीवन के अनेक भावी कार्यों के क्रीड़ात्मक ढंग से प्रशिक्षण की भावना से कुछ खेल बुन्देली लोक जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन गये हैं। इनमें अकती तथा सुआटा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
अकती, अक्षय तृतीया के रूप में पूरे देश में पूजित है किन्तु उस दिन बुन्देली बालक-बालिकाओं द्वारा कलात्मक ढंग से बनाई गई पुतरा पुतरियाँ सौन्दर्य बोध, सृजन-क्षमता, कलाप्रियता का अद्भुत उदाहरण है। आजकल ‘डॉल मेकिंग आर्ट’ का फैशन आ रहा है किन्तु बुन्देलखण्ड में यह कला युगों-युगों से विकसित हो चुकी है। इस अवसर पर अक्ती के गीत गाये जाते हैं-वे विवाहोन्मुख कुमारियों की सलज्जता, शालीनता तथा प्रिय के प्रति सर्वाधिक अनुराग का प्रतिबिम्बन करते हैं।
सुआटा एक दीर्घकालिक क्रीड़ात्मक उपासना विधान है। यह भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन पूर्णिमा तक चलता है। मामुलिया, नौरता सुआटा, टेसू तथा झिंझिया के पाँच अंगों से समन्वित यह खेल बालकों में उनकी कल्पनाशीलता विकसित करने, प्रकृति के प्रति अनुराग उत्पन्न करने, सौन्दर्य बोध तथा कला प्रेम बढ़ाने का उपक्रम है। बेर की कँटीली टहनी को भी नारी के रूप में सजाने का प्रयास-जापान के इकेबाना की शैली का है। इसमें काँटे, फल और फूल संघर्ष, सृजनात्मक उपलब्धि तथा अनुरागात्मक माध्यम का प्रतीक है। एक ओर यह खेल प्राचीन कथा पर आधारित है, जिसका पुष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है, दूसरी ओर यह अंधविश्वासों में जकड़ी मान्यताओं की ओर संकेत करता है। यह बुन्देलखण्ड का विशिष्ट लोकोत्सव है। इसमें लोकगाथात्मक तथा सामान्य, दोनों प्रकार के गीत मिलते हैं।

ऋतु विषयक गीत
लोक जीवन में हर मौसम का अपना आनन्द है...बरसात, जाड़ा, फगुनाई भरा बसंत या ग्रीष्म; हर माह के अपने त्यौहार हैं, अपने सुख-दुख हैं। सावन तो बहिनों का माह है, बहिनों के लिए भाई की प्रतीक्षा का माह। बहिन की हर टकटकी भाई के आने की बाट जोहती है। घर के बाहर या बाग बगीचों में झूलों पर पैंगें मारती बहिनों को भी अपना परदेश में रहना अखरता है। वे भाई के आगमन की प्रतीक्षा करती हैं।
फागुन प्रेम का उत्कर्ष काल है। बसंत की बहार, फगुनाई का मौसम एक विशेष भावोद्रेक करता है। बुन्देलखण्ड में हर स्थान पर फागें और रसिया गाने का रिवाज है। यह फागें शृंगार और आध्यात्मिकता का अद्भुत काव्य हैं। फागें छन्दयाऊ, खड़ी तथा चौकड़ी तीन कोटियों में विभक्त होती हैं। इन संवेदनाओं से जुड़े गीत मनोरम होते हैं।

शृंगार गीत
बुन्देलखण्ड के लोक साहित्य में शृंगार की समृद्ध परम्परा है। मनोभावों की सरस अभिव्यक्ति इन गीतों में हुई है। ये गीत तन्मयता का अद्भुत उदाहरण हैं। बुन्देली बालायें अपने प्रिय के साथ इतनी तन्मय हैं कि उन्हें ‘भुनसारे चिरैयों’ का बोलना प्रेम में व्यवधान लगता है।
नारी नहीं चाहती है कि उसका प्रिय किसी और को चाहे। कुँए पर, बाग में, चौपर में वह हर स्थान पर प्रिय के साथ रहना चाहती है। वह तो ढिंमरिया और मलिनियाँ तक बनने को तैयार है। पारस्परिक समर्पण का कैसा भावपूर्ण संयोग है-‘नजरिया मोई सों लगइयों।’
प्रेम आर्थिक सीमायें नहीं देखता। वह गरीब है तो क्या हुआ? वह अपने पति को संदेश भेजना चाहती है। कागज, स्याही और कलम नहीं तो छिंगुरिया को कलम बनाकर संदेश भेजने को व्याकुल रहती है। उसकी इच्छा है कि वह भी ‘लिखदऊं दो दस बोल’। प्रेयसी कितनी आशावान और मानिनी है उसे प्रिय के आगमन से खेतों में दूबा हरी होती दिखती है, रीते कुँआ भरते नजर आते हैं। यह प्रतीक विलक्षण है। वह मोतियों का चौक पूरकर और स्वर्ण कलश की मांगलिकता के साथ प्रिय का स्वागत करने को उत्सुक है।
यहाँ की नारी अपने पति को परेशान नहीं देखना चाहती है। चाहे वह अपनी लाखों की इज्जत गिरवी रख दे किन्तु सीधेपन के कारण कोई उसके पति को परेशान न करे। यह बुंदेली बाला का आदर्श ‘जो ररिया हमसे कर लेऔ’ गीत में व्यक्त हुआ। नायिका प्रिय के लिए जो खेत में कृषि कार्य कर रहा है, कलेवा लेकर जाती है किन्तु उसकी तन्मयता इतनी है कि उसे कलेवा देखने की फुरसत नहीं। यहाँ नायिका की अधीरता दृष्टव्य होती है।
बुन्देलखण्ड में महिलायें बाँहों में ‘गोदना’ गुदवाकर तथा हाथों में मेंहदी रचाकर सौन्दर्य वृद्धि करती हैं। गोदना गुदवाने में बड़ी पीड़ा होती है किन्तु सुन्दर बनने की ललक उन्हें यह करने को भी मानसिक रूप से तैयार करती है। इस पीड़ा को कम करने में गुदना गीत सहायक होते हैं।

श्रम के गीत
व्यक्ति चाहे हल चलायें, बुआई करें, फसल काटें, कोल्हू में तेल पेरंे या चक्की पीसें, इन क्षणों में उसकी तन्मयता के लिए गीत सहायक होते हैं। स्वरलहरी में तन्मय होकर वह अपनी थकान भूल जाता है। इन्हीं व्यस्त क्षणों में, खेती में, कटाई या अन्य कृषि कार्य करते समय, बिलवारी तथा दिनरी और महिलाओं द्वारा चक्की पीसते समय ‘जंतसार’ के गीत लोकजीवन में रच-बस गये हैं। इनकी अपनी धुनें हैं और अपनी संगीतात्मकता।

जातियों के गीत
विभिन्न जातियों, विशेषकर अति पिछड़ी जातियों में विभिन्न अवसरों पर गाये जाने वाले अपने लोकगीत तथा उनकी लोकधुनें हैं। उन्हें उनके जातिगत गीत या गारी के नाम से जानते हैं। यथा-ढिमरियाऊ गारी, कछियाऊ गारी, धुवियाऊ गारी, गड़रियाऊ गारी, कहरवा (कहार गीत) आदि। इन जातियों के लोग प्रायः अपने पारम्परिक लोकगीतों, गोटें आदि को न तो लिपिबद्ध करने देते हैं और न उन्हें रिकॉर्ड करने देते हैं। सर्वेक्षकों द्वारा आग्रह करने के बावजूद उसे लिपिबद्ध कराने को तैयार नहीं होते हैं। उनकी मान्यता है कि ऐसा करने से कारसदेव नाराज हो जायेंगे किन्तु उन्हीं जातियों के शिक्षित या शोधोन्मुख युवक-युवतियों के माध्यम से वे गीत प्रकाश में आ रहे हैं।

शौर्य/प्रशस्तिगीत
समकालीन महापुरुषों ऐतिहासिक पात्रों, आंचलिक ख्याति के व्यक्तियों की प्रशंसा में अथवा उनके शौर्य को बखानते हुए अनेक गीत मिलते हैं। यह गीत शौर्यपरक होने पर रासो परम्परा में गिने जाते हैं। राछरे तथा पंवारे बुन्देलखण्ड में गाये जाने वाले ऐसे ही लोकगीत हैं। इनमें कथात्मक गीतों को तकनीकी दृष्टि से लोकगाथा की श्रेणी में गिना जाता है।

स्फुट गीत
इसके अतिरिक्त विविध विषयों पर जो गीत मिलते हैं उन्हें इस श्रेणी में रखा जा सकता है।

लोकगाथायें
लोक जीवन में लोकगाथायें बड़े प्रेम और तन्मयता से गाईं तथा सुनीं जाती हैं। ये कथापरक गीत होते हैं। इनमें कहानी गीत के माध्यम से आगे बढ़ती है। इस प्रकार लोकगाथाओं को इतिवृत्तात्मक लोक काव्य कहा जा सकता है। इनका आकार सामान्य लोकगीतों से अधिक बड़ा होता है। अनेक लोकगाथायें तो महाकाव्य की भाँति 600-700 पृष्ठों में मिलती हैं। आल्हा बुन्देलखण्ड में गायी जाने वाली सर्वप्रिय लोकगाथा है। जगनिक ने जब आल्हखण्ड लिखा होगा तब वह सीमित पृष्ठों का रहा होगा किन्तु समय की गति के साथ गायकों ने उसमें क्षेपक जोड़कर उसे इतना विस्तृत कर दिया कि खेमराज श्रीकृष्ण दास द्वारा प्रकाशित आल्हखण्ड 940 पृष्ठों में छपा है किन्तु बुन्देलखण्ड क्षेत्र में गाया जाने वाला आल्हा उससे भी बृहत् है। इसमें आल्हा ऊदल द्वारा लड़ी गई 52 लड़ाइयों की विस्तृत कहानी है। बरसात के दिनों में कृषि कार्य से निश्चिन्त होकर ग्रामवासी हर गाँव में आल्हा गाते सुनते मिल जायेंगे। कई लोकगाथायें छोटे आकार में भी मिलती हैं।
बुन्देलखण्ड की प्रमुख लोकगाथाओं में, अमान सिंह की राछरा, प्रान सिंह का राछरा, जागी का राछरा, भरथरी, सरवन गाथा, सीताबनवास, सुरहिन गाथा, हरिश्चन्द्र गाथा, सन्तवसन्त की गाथा, रमैनी आदि चालीस से अधिक लोकगाथायें प्राप्त होती हैं।

लोककथायें
लोक कथायें लोक जीवन का अभिन्न अंग है। घर के भीतर बूढ़ी महिलायें या मातायें परिवार के बच्चों को रात में कहानियाँ सुनाती हैं। घर के बाहर चौपालों मंे अग्नि जलाकर अलाव के सामने कहानियाँ सुनाने की परम्परा है। प्रत्येक व्रत, त्योहार या पूजन के समय पंडित जी या परिवार की वरिष्ठ महिलाओं द्वारा कहानियाँ कही जातीं हैं। यह सभी कहानियाँ लोक कथा के रूप में जानी जाती हैं। इनमें पौराणिक प्रसंगों से लेकर उपदेशपरक तथा मनोरंजक कथानक होता है। कई कथायें तिलस्म या रोमांच से भरपूर होती है। अनेक में लड़ाइयों का विवरण होता है। अधिकांश में समाज कल्याण का जीवंत चित्र बड़ी स्वाभाविकता के साथ बखाना जाता है।
इस क्षेत्र की लोक कथाओं के संकलन तथा अध्ययन से इस क्षेत्र के सामाजिक परिवेश का पूरा चित्र समझा जा सकता है। व्रतकथाओं का विषय प्रायः यह होता है कि अमुक ने यह व्रत किया तो उसे क्या लाभ हुआ? अमुक ने नहीं किया तो उसे क्या कष्ट सहना पड़ा? इस प्रकार वे कथा सुनने वालों को व्रत तथा धार्मिक आचरणों के प्रति आकृष्ट करने वाले होते हैं। घर के भीतर बच्चों को सुनाई जाने वाली या अलाव पर कही जाने वाली लोक कथाओं की विशेषता यह है कि उनमें मर्यादित शब्दावली में ज्ञानवर्द्धक सामग्री प्रचुर मात्रा में मिलती है। कहानियों के अंत में लोकमंगल की भावना इन शब्दों में व्यक्त होती है -
‘जैसी भगवान ने इनकी सुनी, तैसी सबकी सुनै’, ‘सबकौ भलौ करै’, ‘सुख में रख्खै’ और ‘दूधन भरौ, पूतन फरौ’ आदि। इन लोककथाओं को कहने के पूर्व उनकी भूमिका भी बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत की जाती है।

लोकसुभाषित
लोकोक्तियाँ
बुन्देलखण्ड निवासियों का वाग्चातुर्य यहाँ प्रचलित लोकोक्तियों, मुहावरों तथा बुझौअलों (पहेलियों) में झलकता है। किसी भी सुन्दर कथन के लिए सूक्ति या सुभाषित शब्द का प्रयोग मिलता है। जब यह सूक्ति या सुभाषित लोकव्याप्त होकर जन-जन में प्रचलित हो तो उसे ‘लोकोक्ति’ कहते हैं। इन लोकोक्तियाँ की सबसे बड़ी विशेषता संक्षिप्तता होती है, जिसमें बड़ी से बड़ी बात को कम शब्दों में कहने का सामर्थ्य है। इनमें गागर में सागर भरा है।
यह कहावतें ग्राम्य-कथन या ग्राम्य-साहित्य नहीं हैं। यह लोकजीवन का नीतिशास्त्र हैं। यह संसार के नीतिसाहित्य का विशिष्ट अध्याय हैं। विश्व-वाड़गमय में जिन सूत्रों को प्रेरक, अनुकरणीय तथा उद्धरणीय माना गया है, उनका सार प्रकारान्तर से इनमें मिल जायेगा। समान अनुभव से प्रसूत इन कहावतों से अधिकांश सूत्र सार्वभौमिक सत्य होते हैं। कुछ सूत्र स्थानीय या आंचलिक वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते हैं।
यह कहावतें जनमानस के लिए आलोक स्तम्भ हैं। इनके प्रकाश में हम जीवन के कठिन क्षणों में लोकानुभव से मार्गदर्शन प्राप्त कर सफलता का मार्ग ढूढते हैं। यह वह चिनगारी है जिनमें अनन्त ऊष्मा है जो जनमानस को मति, गति और शक्ति प्रदान करती है। हम किसी भी प्रसंग की चर्चा छेड़ दें, उससे जुड़ी कहावतें लोगों की जुबान पर आ जाती हैं। यही इनकी लोकव्याप्ति का प्रमाण है। इन्हें पढ़कर इनके गढ़ने वालों की सूझबूझ, सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता तथा वाक्विदग्धता पर आश्चर्य होता है। वे सचमुच जीवनदृष्टा थे।
यह कहावतें नदी के उन अनगढ़ शिलाखण्डों की तरह हैं जो युग युगान्तर काल के प्रवाह में थपेड़े खा-खाकर शालिग्राम बन शिवत्व को प्राप्त करते हैं। इनमें लोक का बेडौलपन है, छन्दों की शास्त्रीयता नहीं है तथापि इनमें काव्य का सा सहज प्रवाह है, वे सहज स्मरणीय हैं।

बुझौअल
सांकेतिक ढंग से रहस्यात्मक बात कहना तथा दूसरे से पूछना और सही अर्थ जानना, यह बुन्देली में बुझौअल कहलाता है। बुझौअल बूझने (पूछना) से बना है। यह संस्कृति के प्रहेलिया शब्द का पर्यायवाची है। हिन्दी या अन्य लोकभाषाओं में इसे पहेली भी कहते हैं।

मुहावरे
वाक्य को आकर्षक एवं चुस्त बनाने के लिए विलक्षण अर्थपरक वाक्यांश प्रयोग करते हैं, यह मुहावरे कहलाते हैं। मुहावरेदार भाषा का प्रयोग व्यक्ति की विद्वता तथा वाग्चातुर्य का प्रतीक है। यह वाक्य का अंश होता है, अतः इसका स्वतंत्र प्रयोग नहीं किया जा सकता है किन्तु किसी वाक्य में यथोचित स्थान पर रख देने से उसका अर्थ महत्व बढ़ जाता है। बुन्देली लोकजीवन में मुहावरों का प्रयोग बहुतायत में होता है।
इस प्रकार बुन्देलखण्ड का लोक साहित्य बहुआयामी है तथा हमें इसमें बुन्देलखण्ड की संस्कृति के विविध पक्षों की झलक देखने को मिलती है। सांस्कृतिक अनुशीलन हेतु यह महत्वपूर्ण आधारभूत सामग्री है।

मण्डपम्, राठ रोड, उरई (जालौन)

Thursday, September 17, 2009

स्वतंत्रता आन्दोलन में बुन्देलखण्ड का योगदान


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव


भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की चर्चा विश्व के सबसे बड़े आन्दोलनों में होती है क्योंकि इस आन्दोलन ने अलग-अलग विचारधाराओं और विभिन्न वर्गों के लाखों-लाख लोगों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से सक्रिय किया। इस स्वतंत्रता आन्दोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह थी कि इसे बिना किसी क्रांति के नैतिक, राजनीतिक साथ ही विचारधारात्मक तीनों ही स्तरों पर लम्बे जनसंघर्ष के द्वारा चलाया गया। हालाँकि इतिहासकारों के बीच यह बहस का मुद्दा रहा कि यह विद्रोह एक सिपाही बगावत था, राष्ट्रीय आन्दोलन था या सामंती प्रतिक्रिया का प्रस्फुटन मात्र? क्या भारतीय असंतोष को कम करके आंकने के लिये यह अंग्रेज इतिहासकारों की एक साजिश थी?
कारण कुछ भी हों परन्तु इतना तो कहा जा सकता है कि सन् 1857 ई. का विद्रोह उन विभिन्न असंतोषों का परिणाम था जिनसे भारतीय वर्षों से घुटन अनुभव कर रहे थे। सन् 1757 ई. से सन् 1857 ई. के सौ वर्षों में अंग्रेज कम्पनी भारत के विभिन्न क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाती जा रही थी। कम्पनी की भारत में इस गतिविधि से उसके राज्य का तेजी से विस्तार हुआ। फलतः शासन प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन हुये। इसके संचित प्रभाव से भारत में सभी वर्गों, रियासतों के राजाओं, सैनिकों, जमींदारों, कृषकों, व्यापारियों, ब्राह्मणों तथा मौलवियों (केवल शहरी पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त वर्ग जो अपनी जीविका के लिये कम्पनी पर निर्भर थे) सभी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अंग्रेजों के इन तरीकों ने भारतीय जीवन की शांत धाराओं को आंदोलित होने को विवश कर दिया, जिससे देश के विभिन्न भागों में हलचल पैदा होने लगी। कुलीन और जन-साधारण दोनों ही वर्गों में बढ़ता असंतोष और आशंका ही छोटे-छोटे विद्रोह के रूप में (सन् 1857 ई. के विद्रोह से पहले) वैल्लोर में सन् 1806 ई. में, सन् 1816 ई. में बरेली, सन् 1824 ई. में बैरकपुर, सन् 1831-32 ई. में कोल विप्लव तथा छोटा नागपुर और पलामू में अन्य छोटे विद्रोह, मुस्लिम आन्दोलन जैसे फेराजी उपद्रव-सन् 1831 ई. में बरासत (बंगाल) में सैयद अहमद और उनके शिष्य मीर नासिर अली या टीटो मीर के नेतृत्व में, सन् 1842 ई. में 34वीं रेजिमेंट का विद्रोह, सन् 1849 ई. में फरीदपुर (बंगाल) में दीदू मीर के पथ प्रदर्शन में (सन् 1849 ई, सन् 1851ई., सन् 1852 ई. और सन् 1855 ई. में मोपला विप्लव तथा सन् 1855-1857 ई. का संथाल विद्रोह)। सन् 1849 ई. में सातवीं बंगाल कैवेलरी और 64वीं रेजीमेंट और 22वीं एन.आई. का विद्रोह, सन् 1850 ई. में 66वीं एन.आई. का विद्रोह और सन् 1852 ई. में 38वीं एन.आई. का विद्रोह इत्यादि। इन विद्रोहों के पीछे अनेक राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक, सैनिक कारण हो सकते हैं परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि ये सभी अंग्रेजी शासन की नीतियों के विरूद्ध जनता के दिलों में संचित असन्तोष एवं विदेशी सत्ता के प्रति घृणा का परिणाम था। इस सामान्य विक्षोभ की धीरे-धीरे सुलगती आग सन् 1857 ई. में धधक उठी जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की मजबूत बुनियाद की जड़ों को झकझोर (हिला) दिया। सन् 1857 ई. के इस विद्रोह को अंग्रेजी साम्राज्यवादी विचारधारा से प्रभावित इतिहासकारों ने सामंती असंतोष की अभिव्यक्ति मात्र कहा है परन्तु वास्तव में प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अंग्रेजों की नीतियों ने जो अस्तव्यस्तता एवं असंतोष की भावना ला दी उसकी ही अभिव्यक्ति सामंत सेना और जनता के माध्यम से सन् 1857 ई. की क्रांति, विप्लव या महान विद्रोह या प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में हुई।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की इस चिंगारी ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रगति को बढ़ावा दिया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की कहानी भारतीयों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के संग्राम का इतिहास है। यह ब्रिटिश सत्ता की गुलामी से मुक्ति पाने के लिये भारतीयों द्वारा संचालित आन्दोलन था। सन् 1857 ई. में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध भारतीयों द्वारा पहली बार संगठित एवं हथियार बंद लड़ाई ने राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में संघर्ष, समझ एवं एकता के बीज बोये। यद्यपि यह विप्लव असफल रहा, परन्तु इसने प्राचीन और सामंतवादी परम्पराओं को तोड़ने में पर्याप्त सहायता पहुँचायी तथा इसके बाद ही भारत आधुनिक स्वतंत्रता संघर्ष आन्दोलन के नये युग में प्रवेश कर सका।
देशव्यापी इस क्रांति का प्रभाव बुन्देलखण्ड की माटी पर भी पड़ा। बुन्देलों की इस वीर बसुन्धरा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका अदा की है क्योंकि वर्तमान में बुन्देलखण्ड के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र का इतिहास अत्यन्त प्राचीन एवं गौरवशाली रहा है। यह भारत के हृदय प्रदेश के रूप में सुविख्यात अपनी स्वतंत्र चेतना के लिये महत्वपूर्ण माना जाता है। बुन्देलखण्ड को चेदि, मध्यप्रदेश, जैजाक-भुक्ति, आटविक, दशार्ण आदि प्राचीन नामों से भी संबोधित किया जाता है। इतिहासकार जयचंद विद्यालंकार ने विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी में विस्तृत क्षेत्र को बुन्देलखण्ड के नाम से सम्बोधित किया है। वहीं दूसरी ओर बुन्देलखण्ड की भौतिक शोधों के आधार पर निम्न सीमा निर्धारित की गई है-‘वह क्षेत्र जो उत्तर में यमुना, दक्षिण में विन्ध्य, प्लैटों की श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में चम्बल और दक्षिण-पूर्व में पन्ना व अजयगढ़ श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुन्देलखण्ड के नाम से जाना जाता है।
बुन्देलखण्ड का यह भूखण्ड अपनी अदम्य प्रेरणाओं और स्वतंत्र प्रवृत्तियों के लिये प्राचीन काल से ही विशिष्ट है। मध्यकाल में महाराज छत्रसाल बुन्देला ने इस क्षेत्र के सुयश को आगे बढ़ाया। जिससे इसे बुन्देलखण्ड नाम दिया। चंदेलों और बुंदेलों की संतानों का शौर्य सन् 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में पराक्रम एवं स्वतंत्रता की कामना ज्वलंत रूप से सामने आयी जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, नानासाहब और तात्या टोपे के सुयोग्य नेतृत्व में अंग्रेजों से युद्ध करते हुये भारतीय इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ा था।
भारत में राष्ट्रीय चेतना पूर्णरूप से सन् 1857 ई. तथा सन् 1921 ई. की अवधि के दौरान पुष्पित हुई और परवर्ती कालीन स्वतंत्रता आन्दोलन जिसे हम राष्ट्रीय आन्दोलन की संज्ञा देते हैं जो सन् 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म के साथ ही सुगठित रूप में सामने आया। जिसके नेतृत्व में भारतवासियों ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता के लिये लम्बा और ऐतिहासिक संघर्ष किया। इस कालावधि के संघर्ष में बुन्देलखण्ड सक्रिय रूप से भाग ले रहा था। सन् 1905 ई. में बंग भंग के विरुद्ध आन्दोलन में बुन्देलखण्ड ने अपनी जुझारू प्रवृत्ति का परिचय दिया। सन् 1905 ई. से 1911-12 तक और सन् 1921 ई. से सन् 1930-31 ई. तक के आन्दोलनों में क्रान्तिकारी आन्दोलन के स्वर ही अधिक मुखर हुये। जिनमें से पहले में तो कम परन्तु द्वितीय चरण में चन्द्रशेखर आजाद और भगवानदास माहौर जैसे क्रांन्तिकारियों के नेतृत्व में बुन्देलखण्ड ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बुन्देलखण्ड की इस प्रकृति और प्रवृत्ति की धारा में सन् 1921 ई. के असहयोग आन्दोलन के आह्वान पर अनेक वीर युवक सामने आये। सन् 1928 ई. में साइमन कमीशन के विरोध में और सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आन्दोलन में भारी संख्या में बुन्देलखण्ड के शिक्षित युवकों ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी। सन् 1931 ई. से सन् 1940 ई. के मध्य महात्मा गाँधी और पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बुन्देलखण्ड ने आजादी की राजनीतिक लड़ाई में बड़े उत्साह से भाग लिया, जेल यात्रायें की और पुलिस का दमन सहा। सन् 1942 ई. में भारत छोड़ो आन्दोलन में बुन्देलखण्ड की साधारण जनता ने भी गाँधी जी के आह्वान पर शासन से अहसयोग किया।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के महान नेताओं को उनके त्याग एवं बलिदान के लिये आज भी हम याद करते हैं किन्तु वे स्थानीय और आंचलिक नेता, जो स्वतंत्रता आन्दोलन की भागीदारी में राष्ट्रीय नेताओं के सहयोगी रहे एवं उनसे किसी भी स्तर (अर्थ) पर पीछे नहीं रहे, उनके योगदान का आज तक कोई उचित मूल्यांकन करने का प्रयास नहीं किया गया है। जब हम बुन्देलखण्ड के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि अपने अनूठे शौर्य और स्वातन्त्रय प्रेम के कारण विदेशियों के विरुद्ध या राष्ट्रीय आन्दोलन में बुन्देलखण्ड सदैव से ही अग्रणी रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन में बुन्देलखण्ड के योगदान का अद्यतन न तो उचित मूल्यांकन किया गया है और न ही देश की प्रगति में इस क्षेत्र को बराबरी का भागीदारी बनाने की दिशा में कोई प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त बहुत से महत्वपूर्ण तथ्य जिनके मौखिक और अभिलेखीय साक्ष्य अभी उपलब्ध हैं जो लेखबद्ध नहीं किये गये हैं? बुन्देलखण्ड के आन्दोलन एवं स्वतन्त्रता के इतिहास की उसकी प्रकृति, प्रवृत्ति और उसकी गौरवमयी परम्परा का आंकलन करते हुये इस क्षेत्र को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन तथा क्रांतिकारी संगठनों का सम्यक् लेखा-जोखा अभी शोध के क्षेत्र में नहीं हुआ है। स्वतंत्रता आन्दोलन के उन अगणित शूरवीरों को समय के अन्धकार के गर्त से निकालकर प्रकाश में लाना आज की महती आवश्यकता है।

सम्पादक कृतिका एवम वरिष्ठ प्रवक्ता,
हिन्दी विभाग, डी.वी.कालेज, उरई(जालौन)
पिन-285001 उ0प्र0

बुंदेली महिला कथाकार और लोक संस्कृति


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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डा0 अवधेश चंसौलिया


बुंदेली माटी में जन्मी महिला कथाकार आज भले ही बुन्देलखण्ड से दूर अपनी रचनाधर्मिता में संलग्न हांे लेकिन उनके संस्कारों में, उनके मन में, रोम-रोम में बुन्देली जन-जीवन रचा-बसा है। यही कारण है कि जन्म से मरण तक के संस्कारों, रीतिरिवाजों एवं यहाँ के तीज त्यौहारों का जीवंत चित्रण इनके कथा साहित्य में सहजता से प्राप्त हो जाता है। बुंदेली महिला कथाकारों में मैत्रेयी पुष्पा का नाम सर्वोपरि है। मैत्रेयी जी ने बुदेली समाज को बहुत नजदीकी से देखा-परखा है। इसलिए इनके कथा साहित्य में बुंदेली जन-जीवन पूरी सूक्ष्मता, गहन आत्मीयता के साथ रूपायित हुआ है। बुंदेलखण्ड ही नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत में पुत्री की अपेक्षा पुत्र जन्म पर लोगों को अधिक प्रसन्नता होती है। पुत्र जन्म पर दिल खोलकर खर्च किया जाता है, नेग बाँटे जाते हैं, जबकि पुत्री जन्म पर लोग जन्म संस्कार से जुड़ी दाई का मेहनताना देने में भी संकोच करते हैं। ऐसी स्थिति में दाई, पुत्र-पुत्री में भेद न करती हुई सोहर गाती है -
‘‘जसोदा जी से हँस-हँस पूंछत दाई,
नंदरानी जी से हँस-हँस पूंछत दाई,
रातैं तो मैं लली जनाय गयी,
लालन कहाँ से लाई। जसोदा जी से....।’’ 1
रूढ़ियों से ग्रस्त बंदेली समाज में पुत्र को जन्म देने वाली माता को जो सम्मान प्राप्त है, वह पुत्री जन्मने वाली माता को नहीं है। तुम किसकी हो बिन्नी कहानी में पुत्री की माँ की मानसिक संघर्ष की स्थिति दृष्टव्य है-‘‘बिना पुत्र की जननी बने, वे माँ के गौरवान्वित पद को स्वीकार नहीं कर पा रहीं थी।...अधूरेपन का एहसास मकड़ी के जाले सा मन पर चारों ओर लिपट गया। सामाजिक परिवेश कटीला सा हो चला। तीज त्यौहार चिढ़ाते-बिराते से निकलने लगे। कलेजे में हीनता की हूक सी उठती, तो बेचारगी में पलट जाती.....यह एक बात उनके कलेजे को निरंतर उधेड़ती रहती कि-वे बेटे को जन्म नहीं दे सकी।’’ 2
पुत्र जन्म की प्रसन्न्ता अवर्णनीय होती है। ‘‘चाची आ गयीं। गोमा ने बालक को जनम दिया है। चाची थाली बजाने लगीं.....घर-घर बुलावे दिये जा रहे हैं। चैक पूरकर सांतियां घरे जायेंगे। चाची कोरा चरुआ भर रहीं हैं। बत्तीसा डालकर उबालने धरेगीं। गोमा को बत्तीसा का पानी पीना है। नेग सगुन हो रहे हें।....सोहर गाये जा रहे हैं-
ऐसे फूले सालिग राम डोलें, हाथ लिये रुपइया,
ए लाला के बाबा, आज बधाई बाजी त्यारे।।’’ 3
मैत्रेयी पुष्पा के अल्मा कबूतरी में बच्चे की छठी संस्कार का चित्रण यथार्थपरक है। ‘कदमबाई कबूतरी ने बेटे को जन्म दिया है। कबूतरे के डेरों पर गाँव के पंडित जी तो आते नहीं अतः पंडिताई का कार्य मलियाकाका ही करते हैं। बच्चे का पालना बाहर निकाला गया। चैक जगमगाने लगा। सरमन की औरत देवर को गालियाँ देकर, हल्की हो चुकी थी, सो सोहर गाने लगी। आधा गज नया कपड़ा भी ले आयी। कुर्ता टोपी के लिए।' 4
मैत्रेयी पुष्पा के कथा संसार में सामाजिक रीति-रिवाजों का जैसा विशद और सुन्दर चित्रण है वैसा अन्य किसी बुन्देली कथालेखिका के कथा लेखन में नहीं है। इस दृष्टि से उनके उपन्यास इदन्नमम्, बेतवा बहती रही, अल्मा कबूतरी, झूला नट तथा कहानी संग्रह ललमनिया तथा अन्य कहानियाँ अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। कहानी ललमनिया तो बारात चित्रण का विहंगम एवं मनमोहन दृश्य उपस्थित करने में बेजोड़ है। इदन्नमम् उपन्यास में ‘नव वधू की रोटी छुआई’ का दृश्य इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। जिसमें बुढ़िया, जब पुराना नाम ले लेकर नव वधू को बुलाती हैं तो वह कमरे से बाहर नहीं निकलती। लेकिन जैसे ही मंदा, बहू को नर्मदा नाम से पुकारती है तो वह झट से बाहर निकल आती है और उसका नाम ससुराल में नर्मदा पड़ जाता है। मैत्रेयी जी के कथा साहित्य में बुन्देली वाद्य यंत्रों को भी यथास्थान महत्व प्राप्त हुआ है। मंगल अवसरों पर यहाँ रमतूला बजाया जाता है। ‘मन्दाकिनी की पक्यात में रमतूला बजा टू ऊं टू ऊं बुलउवा दिये गये। कुसुमा का स्वर मंगल गीतों में सबसे ऊपर है।
‘‘सिया बारी बनरी, रघुनन्दन बनरे।
को को बरातें जाय मोरो लाल।।’ 5
बुन्देलखण्ड में जब नववधू आती है तब उसकी गोद में छोटे देवर को बिठाया जाता है। इस रस्म का सजीव चित्रण मैत्रेयी पुष्पा झूला नट उपन्यास में विस्तार से करती हैं।
मैत्रेयी पुष्पा के लोक कवि ईसुरी पर आधारित उपन्यास कही ईसुरी फाग में बुंदेली लोक-संस्कृति में रची-बसी फागों के अनेक दृश्य जीवंत हो उठे हैं। मैत्रेयी जी के कथा साहित्य में नौटंकी, रास, राई नृत्य, सुअटा खेल आदि लोक नृत्यों का दृश्यांकन बहुत ही आकर्षक रूप में हुआ है। ‘नारे सुअटा’ बुंदेली क्वांरी कन्याओं का एक महत्वपूर्ण पर्व है। अगनपाखी उपन्यास में क्वार के महीने में इस पर्व की मनोरम झाँकी प्रस्तुत हुई है। क्वांरी कन्याओं के द्वारा सुअटा की मूर्ति के सामने पूजा-अर्चना कर प्रभाती गाये जाने का दृश्य इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है -
‘‘उठो सूरजमल भैया भोर भये
उठो-उठो चन्दुमल भइया भोर भये
नारे सुअटा, मालिनी खड़ी तेरे द्वार
इन्दरगढ़ की, मालिनी नारे सुअटा, हाटा ई हाअ बिकाय।’’ 6
इन्हीं के उपन्यास इदन्नमम् में बुंदेली लोकनृत्य दिवारी का मनोहारी चित्रण बरबस ही लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लेता है-
‘‘दिबरिया लोग, गाते हुए नाचते हैं। होऽऽ! होऽऽ! होऽऽ! होऽऽऽऽ!
दिबारी माय लक्ष्मी माय। हो मोरे गनपत महाराजऽऽऽज!
नाच जमने लगा। मोर पंख हिल रहे हैं। लोग डूबे हुए हैं रेग में। एक दिबरिया भागता हुआ आया और जा मिला समूह में.....बऊ थाली में खील बतासा गुड़ धरकर ले आयीं।’’ 7
मैत्रेयी पुष्पा के अतिरिक्त अन्य लेखिकाओं ने भी अपने साहित्य में बुंदेली रीति-रिवाजों, परम्पराओं को उकेरा है। डा0 छाया श्रीवास्तव की कहानी असगुनी में भी पुत्र जन्म पर खुशी में सोहर गाते हुए स्त्रियों के मनमोहक दृश्य हैं। ननद के कहने पर छोटी भाभी गाती है-‘‘हमको तो पीर आवें, ननद हँसत डोलें।’’ 8
डा0 कामिनी ने गुलदस्ता कहानी में सातवें महीने के गर्भ के समय लड़की के मायके से आने वाले पच की बात इस प्रकार की ‘बिटिया के अगर लड़का हुआ तो पच के लिए दो धोती, अच्छा ब्लाउज, बच्चे को कपड़े, दामाद को कुर्ता-धोती चाहिए। मिठाईयाँ, गेहूँ, दालें, चावल अलग। सोने की नहीं तो चाँदी की हाथ की पुतरिया, तबिजिया चाहिए। गिरिजा को तीन-तीन बिछिया नहीं तो गाँव वाले नाम धरेंगे। कोई क्या कहेगा कि घर में जुआरा बंधा है। खेती भी है और कुछ न भेजा।’’ 9
सामाजिक रीति-रिवाजों की विस्तृत और यथार्थपरक जानकारी होने के कारण लेखिकाओं के चित्रण अधिक सजीव और यथार्थ बन पड़े हैं। डा0 छाया श्रीवास्तव कहानी विकल्प में लड़की देखने का दृश्य इस प्रकार उपस्थित करती हैं-‘‘कानपुर के सब-इंजीनियर आये थे, दलबल सहित माँ, दो बहिनें, एक भाई के साथ। पिता ने आदर सत्कार में कमी नहीं रखी थी। लड़के ने भांति-भांति से इंटरव्यू लिया था। बहिनों ने तो नचाकर देखा था। पूरे दो दिन में वे महीनों का हिसाब बिगाड़ गये थे।’’ 10 जीवन पथ कहानी में भी छाया श्रीवास्तव ने वर-वधू के विवाह की रस्म के सुन्दर चित्रांकन के साथ बेटी की विदाई का बहुत ही कारुणिक दृश्य उपस्थित कर पाठकों को द्रवित करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है।’’ 11
डा0 पद्मा शर्मा ने रेत का घरोंदा कहानी में वधू के ससुराल आने पर कंकन खोलने के रिवाज का बड़ा ही मनोरंजक चित्र उपस्थित किया है। इसी कहानी में ससुराल में नई वधू से गाना गाने को कहा जाता है, इस प्रथा को दादरे गाने की रस्म कहा जाता है। नई वधू के समक्ष यह बहुत ही दुविधा की घड़ी होती है। वह सोचती है क्या गाऊँ क्या न गाऊँ। कहानी की नव वधू स्मिता ढोलक पर थाप देकर गा उठती है-
‘‘राजा की ऊँची अटरिया, दइया मर गई, मर गई
सासू कहे बहू रोटी कर लो, सब्जी कर लो,
राजा कहे मेरी रामकली की उंगली जल गई।’’ 12
विवाह में मामा द्वारा भात लाने की परम्परा बुन्देली समाज में बहुत महत्व रखती है। इस अवसर पर मामा अपनी सामथ्र्य के अनुसार सामान आदि की व्यवस्था करते हैं। भतैयों के स्वागत में बहिनें गाती हैं-
‘‘सुनो भैया करूँ विनती समय पर भात दे जाना।
ससुर को सूट सिलवाना, सास को साड़ी ले आना।
अगर इतना न हो भैया तो खाली हाथ आ जाना।
मण्डप की शोभा रख जाना।।’’ 13
बुंदेली महिला कथाकारों ने बुंदेली संस्कृति का अपने कथा साहित्य में जिस गहराई के साथ संरक्षण किया है, संस्कृति के प्रति वैसा समर्पण भाव, पुरुष कथा लेखन में लगभग अप्राप्त है। मेले, दंगल, पर्वों, त्यौहारों की विशेष सजधज तथा ग्रामीण संस्कृति की झलक पूरी तन्मयता और तीव्रता के साथ हमें महिला कथाकारों के कथा साहित्य में दृष्टिगत होती है। करवाचैथ भारतीय नारियों का विशेष पर्व है। इसका चित्राकन रजनी सक्सेना ने अपनी कहानी अन्तर संवाद में बहुत ही अच्छी तरह से किया है। इसी कहानी में शारदीय नवरात्रि का दृश्य भी अवलोकनीय है। डा0 शरद सिंह ने पिछले पन्ने की औरतें उपन्यास में चंदेरी (गुना) में लगने वाले बेड़नियों के मेले में ‘राई नृत्य’ का सुंदर चित्रण किया है-‘‘मशाल के इर्द-गिर्द पचासों दलों के रूप में सैकड़ों पुरुषों की भीड़ और उन दलों के मध्य पूरी सज-धज के साथ पचासों बेड़नियां...। रंग पंचमी की रात को ग्राम करीला में बेड़नियों का विराट मेला लगता है। समूची पहाड़ी बेड़नियों और उनके सोहबतियों के नाच रंग से नहा जाती है।’’ 14
उपर्युक्त तथ्यों से स्पष्ट होता है कि बुंदेली महिला कथाकार बुंदेली संस्कृति के लुप्त होते स्वरूप को पुनर्जीवित करने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह कर रही है। उनका कथा लेखन सोउद्देश्य है और वे इसमें पूरी तरह सफल भी हो रही हैं। महिलाएँ सचमुच लोक संस्कृति की सच्ची वाहिकाएँ हैं। लोक संस्कृति के संरक्षण में बुंदेली महिला कथाकारों के इस योगदान को निरंतरता मिलनी चाहिए।
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संदर्भ-
1. मैत्रेयी पुष्पा-रिजक, ललमनिया तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह) पृ0 18
2. वही पृ0 126
3. मैत्रेयी पुष्पा-गोमा हंसती है, ललमनिया तथा अन्य कहानियाँ(कहानी संग्रह) पृ0 167-168
4. मैत्रेयी पुष्पा-अल्मा कबूतरी पृ0 34 राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली, 2004
5. मैत्रेयी पुष्पा-इदन्नमम पृ0 106, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 1999
6. मैत्रेयी पुष्पा, अगनपाखी, पृ0 24-25, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली 2003
7. वही पृ0 312
8. डा0 छाया श्रीवास्तव-असगुनी, आकांक्षी (कहानी संग्रह) पृ0 40, राजीव प्रकाशन, टीकमगढ़, 1997-98
9. डा0 कामिनी-गुलदस्ता पृ0 46 आराधना ब्रदर्स, गोविन्द नगर, कानपुर 1991
10. डा0 छाया श्रीवास्तव-विकल्प, आकांक्षी (कहानी संग्रह) पृ0 60
11. डा0 छाया श्रीवास्तव-परित्यक्ता पृ0 8 अमन प्रकाशन 1/20, महरौली दिल्ली 1981
12. वही पृ0 32
13. वही पृ0 105-106
14. डा0 शरद सिंह, पिछले पन्ने की औरतें, पृ0 278 सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली,2005

डी.एम. 242, दीनदयाल नगर
भिण्ड रोड ग्वालियर म0प्र0 पिन -47005

मधुरोपासक भक्तकवि हरिराम व्यास


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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डा0 बहादुर सिंह परमार


अपनी आन-बान और शान के लिए विख्यात बुन्देलखण्ड वसुधा में जहाँ एक ओर आल्हा-ऊदल और छत्रसाल जैसे योद्धाओं ने जन्म लिया वहीं दूसरी ओर जगनिक, विष्णुदास, गोरेलाल, ईसुरी और हरिराम व्यास जैसे महान काव्य प्रणेताओं ने इस माटी का नाम सार्थक किया है। मध्यकाल में जब भक्ति की धारा समूचे हिन्दी प्रान्त में प्रवाहित हो रही थी तब बुन्देलखण्ड के भक्तिकुंड में भी अनेक सन्त डुबकी लगाकर काव्य साधना के साथ लोक आदर्श के केन्द्र बिन्दु बने हुए थे। ऐसे ही लोकादर्श व भक्ति शिरोमणि व्यास का जन्म बेत्रवती सरिता के किनारे अवस्थित ओरछा नगरी में शमोखन शुल्क व देविकारानी के घर संवत 1567 की मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष 5 को हुआ था। इस विलक्षण बालक को परिवार से पुराण की परम्परा व माधव सम्प्रदाय की भक्ति भावना विरासत में मिली। हरिराम ने अपने पिता से भरपूर गुणों को ग्रहण कर पुराणवक्ता के रूप में क्षेत्र में इतनी प्रसिद्धि पाई कि उन्हें लोग व्यास जी कहने लगे। यही से हरिराम शुक्ल हरिराम व्यास हो गए। बालक हरिराम कुशाग्र बुद्धि के थे। इनकी प्रतिभा से क्षेत्र में लोग आश्चर्यचकित रह जाते थे। जब हरिराम व्यास लगभग बीस वर्ष की अवस्था के थे तभी बुन्देला राजाओं ने गढ़कुंड़ार के स्थान पर ओरछा को राजधानी बनाने का निर्णय लिया जिससे नगर का चतुर्दिक विकास होने लगा। इधर राजधानी होने से राजदरबार में विद्वान आने लगे। आए दिन व्यासजी के विद्वानों से शास्त्रार्थ होने लगा जिसमें उन्हें विजयश्री सदैव मिलती रही। इसी क्रम में हरिराम व्यास ने काशी पहुँचकर अनेक विद्वानों से शास्त्रार्थ किया। काशी में उन्हें यह अनुभव हुआ कि शास्त्रार्थ और मात्र तर्क से जीवन सफल नहीं किया जा सकता हैं। जीवन में भक्ति के लिय प्रेम, सहजता, भाव प्रवणता तथा मन की एकाग्रता आवश्यक हैं। वहाँ से लौटकर वे ओरछा आये तथा बाद में वृन्दावन गए। उन्होने तीर्थाटन किया। इस दौरान भक्त कवियत्री मीराबाई से भी मिले। वे जीवन में ओरछा व वृन्दावन आते-जाते रहे और उन्होने जीवन के अन्तिम क्षण वृन्दावन में ही बिताए।
मधुरोपासक हरिराम व्यासजी द्वारा हिन्दी में रचित रागमाला, व्यासजू की बानी, रस-सिद्धान्त के पद, व्यासजू की बानी सिद्धान्त की, व्यासजी के रस के पद, व्यासजी के साधारण पद, व्यासजी की पदावली, रास पंचाध्यायी, व्यासजी की साखी तथा व्यास जी की चैरासी नामक दस ग्रन्थ मिलते हैं। इनके ग्रन्थों में भारतीय संगीतशास्त्र, ज्ञान परम्परा, भक्ति साधना तथा जीवन दर्शन के विविध पक्ष गहनता से प्रकट हुए हैं। प्रेम और समर्पण के साथ सख्य भाव भक्ति के विवध रूप तथा अराध्य राधाकृष्ण की छवियाँ प्रमुखता से देखने को मिलती हैं। इनके काव्य में तत्कालीन समाज में व्याप्त तमाम विसंगतियों पर प्रहार भी दृष्टव्य हैं। वे जीवन में जितने सरल, निश्छल और प्रेमी थे उतने ही परम्पराभंजक भी थे। व्यासजी भक्त को भक्त मानते थे वह चाहे किसी भी जाति या वर्ण का हो। जब वर्ण-व्यवस्था के तहत छुआछूत चरम पर थी तब व्यासजी इस भेद को नकारते हैं। इनसे जुडी एक कथा बुन्देलखण्ड में प्रचलित हैं जिसके अनुसार व्यासजी कुलीन और विद्वान भक्त की तुलना में अछूत भक्त का अधिक सम्मान करते थे। इस भावना से समाज के कुछ लोग उनसे चिढते थे तथा कहा करते थे कि ये मात्र दिखावा करते हैं। इस भाव की परीक्षा लेने हेतु उन्होंने योजना बनाई कि व्यासजी को भंगिन के हाथ से जूठा प्रसाद सार्वजनिक रूप से खिलाया जाए। किसी मंदिर से साधु भोजन के उपरान्त एक भंगिन जूठी बची हुई सामग्री ला रही थी। समाज के उन चिढ़ने वाले लोगों ने उस भंगिन से व्यास जी को प्रसाद देने की बात कही। व्यास जी को इस पर कोई आपत्ति नहीं हुई और उन्होंने सहजता से उस भंगिन द्वारा जठून में से दी गई प्रसाद की पकौड़ी को आदरपूर्वक लेकर ग्रहण किया, जिसे देखकर वे चिढ़ने वाले लोग भी दंग रह गए। ऐसे लोगों के आचरण को हरिराम व्यासजी ने उद्घाटित किया है, जो ब्राम्हण कुल में जन्म लेकर दूसरे को ठगने के लिए वेद-पुराणों का सहारा लेते हैं। जिन्हें भक्ति भाव का भान नहीं होता, वे सत्य से दूर मिथ्या को अपनाने वाले होते हैं, जो नरकगामी होते हैं। व्यासजी लिखते हैं -
‘बाम्हन के मन भक्ति न आवै।
भूलै आप, सबनि समुझावै।।
औरनि ठगि-ठगि अपुन ठगावै।
आपुन सोवै, सबनि जगावै।।
वेद-पुरान बेंचि धन ल्यावै।
सत्या तजि हत्याहिं मिलावै।।
हरि-हरिदास न देख्यौ भावै।
भूत-पितर, देवता पुजावै।
अपुन नरक परि कुलहिं बुलावै।।’
(हरिराम व्यास, सं0 वासुदेव गोस्वामी पृ0 90)
उन्हें साधुओं की सेवा करने में बड़ी रुचि थी। एक बार संतों की एक मंडली व्यासजी की अतिथि हुई। जब सब प्रकार से आग्रह करने पर भी वह मंडली एक दिन और रुकने के लिए राजी नहीं हुई तो व्यासजी ने उनके ठाकुर जी उठा लिए और उनके स्थान पर चुपचाप एक पक्षी बन्द कर दिया। साधु जब चलने लगे तो व्यासजी ने उनसे कहा कि आप लोग हमारी अनुमति के बिना जा रहे हैं। देखिये आपके ठाकुर जी आपको पुनः यहाँ लौटा लायेंगे। इस कथन पर बिना ध्यान दिये साधुमंडली वहाँ से चली। तीन मील चल कर सरिता में साधुओं ने स्नान करने के उपरान्त ज्यों ही अपने ठाकुरजी की सेवा करने के लिए संपुट खोला तो उसमें से एक पक्षी निकल कर वृन्दावन की ओर को उड़ गया। साधुओं को व्यास जी की यह याद आई जो उन्होंने चलते समय कहीं थी। वे पुनः वापस आये। व्यास जी प्रसन्न हुए। उनके ठाकुर देकर उन्होंने उस मंडली का पूर्ववत् आदर सत्कार करना प्रारम्भ किया। जब भक्तों के प्रति व्यासजी की आदर भावना और निष्ठा की चर्चा चारों ओर हुई तो उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से एक महन्त उनके पास आये और अपने को बहुत भूखा बताते हुए भोजन माँगने लगे। उस समय व्यास जी के आराध्य देव युगल किशोर जी को भोग नहीं लगा था। अतः व्यासजी ने उन महन्तजी को थोड़ा देर ठहरने के लिए कहा इस पर महन्त जी उन्हें गालियां देने लगे। व्यासजी ने विनम्र भाव से यह दोहा पढ़ा।
‘व्यास’ बड़ाई और की, मेरे मन धिक्कार।
संतन की गारी भली, यह मेरी श्रृंगार।।’
इसे सुनकर महन्तजी को चुप हो जाना पड़ा। थोड़ी ही देर में ठाकुरजी को भोग लग जाने पर एक पत्तल परोस कर व्यासजी उन महन्त जी के लिए ले गये। उसमें से थोड़ा सा ही खा कर महन्त जी ने पेट के दर्द का बहाना करते हुए वह प्रसाद जूठा कर वहीं छोड़ दिया। व्यासजी ने उस उच्छिष्ट प्रसाद को मस्तक से लगाया और खाने लगे। सन्त-सेवा और प्रसाद के प्रति इतनी श्रद्धा देखकर परीक्षक महन्त गद्गद हो गये और उनके नेत्रों में आँसू भर आये।
व्यासजी पूर्ण समर्पण भाव से राधा कृष्ण की भक्ति करते थे। इनके सम्बन्ध में लोक में अनेक किंवदंतियों लोकमुख में जीवित हैं। व्यासजी के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटना है उनके जनेऊ तोड़कर नूपुर बांधने की। एक समय रास में नृत्य करती हुई राधिका जी के चरण के नूपुर की डोरी टूट गई। रास लीला में विक्षेप पड़ने लगा। उपस्थित रसिक जन एक दूसरे का मुँह ताकने लगे परन्तु उपाय सूझा तो व्यासजी को। उन्होंने चट से अपना यज्ञोपवीत तोड़कर नूपुर बाँध दिया। यह देखकर उपस्थित लोगों ने व्यासजी से ताना देते हुए कहा कि ब्राह्मण होकर तुमने जनेऊ ही तोड़ डाला? व्यासजी ने उन्हें यह उत्तर दिया कि मेरे यज्ञोपवीत का लक्ष्य ही श्रीराधिका के चरणों की प्राप्ति करना ही तो था।
एक दूसरी घटना यह कही जाती है कि किसी ने श्री ठाकुरजी की सेवा के लिए एक जरकसी पगड़ी चढ़ाई। व्यासजी ने उस पगड़ी को धारण करने का असफल प्रयत्न किया, क्योंकि उसके बांधन में वह पगड़ी ठाकुरजी के मस्तक से बार-बार खिसक पड़ती है। अन्त में परेशान होकर व्यासजी ने यह कहकर उसे वहीं छोड़ दी कि मेरी बँधी पसन्द नहीं आती तो स्वयं बाँध लो। थोड़ी देर के उपरान्त जब वे मन्दिर के भीतर गये तब उन्होंने अपने इष्टदेव को पगड़ी बाँधे हुए पाया।
इसी तरह हरिराम व्यास जी के सम्बन्ध में ओरछा के आसपास यह दंतकथा और प्रचलित है कि शरद-ऋतु की ज्योत्सना से मुक्त एक रात बेतवा नदी के किनारे अपने आराध्य श्री ठाकुरजी की मूर्ति के समक्ष अपने प्रिय शिष्य महाराज मधुकर शाह के साथ रास रचाई। इस रास में प्रेमभाव से बेसुध होकर व्यासजी नृत्य करते रहे और उनके साथ महाराज मधुकर शाह ने भी नूपुर बांधकर नृत्य किया। प्रेमभाव से युक्त नृत्य देखकर देवगण प्रसन्न हो गये थे और आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी थी। कहा जाता है कि आकाश से धरती पर गिरा प्रत्येक पुष्प सोने का हो गया था। इसीलिए इस बेतवा घाट का नाम ‘कंचनाघाट’ पड़ा।
व्यासजी राधाकृष्ण ने अनन्य भक्त थे। कहते हैं कि उन्होंने राधाकृष्ण के अतिरिक्त किसी की पूजा नहीं है। यहां तक कि अपनी पुत्री के विवाह के अवसर पर भी गणेश पूजन करने से इंकार कर दिया था। जिसके कारण परिजनों व समाज का विरोध उन्हें झेलना पड़ा था। व्यास जी ने अपने जीवन में एकनिष्ठ भक्ति भाव के मर्म को पहचान कर उपासना की विविध जड़ीभूत सच्चाइयों को अस्वीकार कर प्रेम के मूल्यों को नये ढंग से परिभाषित किया।
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एम.आई.जी.-7, न्यू हाउसिंग बोर्ड कालौनी
छतरपुर (म0प्र0)

बुन्देलखण्ड में होरी


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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श्याम बहादुर श्रीवास्तव ‘श्याम’


अपँए देस भारत के उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बुन्देलखण्ड भाग में अलग-अलग जगाँ अलग-अलग तरीकां से होरी को त्यौहार मनावे की परम्परा देखबे कों मिलत है।
फागुन महीना में लगतई खैम यानी कै होरी को डाँड़ो धरवे सें लैकें फागुन के अन्त लौं बल्कि चैत की ओंठें-नौं लोग लुगाईं, बूढे़-बारे सबईं एक रंग में रंगे दिखाई देत और बो रंग है होरी को उन्मादी प्रेम रंग, जीको रूप उजागर होत है आपुस में एक-दूसरे के गालन में मले गये रंग-अबीर सें। गाँवन में देखत हैं मान लें कौनउँ भौजाई गोबर पाथ रइ या अपँए द्वारें गोबर सें चैंतरा लीप रइ और गाँव-मुहल्ला के कौनउँ देवर लला ढिंगा सें निकर भर गए तौ समजो नजर बरकाकें उनकी पीठ पै गोबर को लौंदा छप्पइ हो जानें, भौजी के हाँत में पानी भरी गड़ई पर गइ तौ पिछाउँ से उनके ऊपर पानियँइँ लौंड़ दओ जात, कछू नइयाँ तौ देउर पै धूरइ उल्ला दई। ऐसे में बिचारे देउर लला कों हँस-मुस्क्या कें भगबे के सिवा कौनउँ रस्तइ नइँ सूझत। सारी-सरजें, जीजा-सारे फागुन के महीना में गाँव में चायँ जाके घरै आ जायँ, फिर तौ समजो बिनकी कुगतइ हो जानें। जित्ते जाने लागती के लगत और उन्नें देख लओ तौ समझो जित्ते मौं उत्तिअइँ छुतयानी बातें, उत्तेइ हातन रँग-अबीर-कारोंच आदि उनहें अपँए स्वागत-सत्कार में मिलनेंइँ मिलनें हैं।
चैत की फसल ठाड़ी है। नुनाई हौनें है। पकी फसल सें भरे लैलहात खेतन कों देख किसानन को मन एक नई उमंग में भरो रहत है। खुशी के मारें गाँवन में रातन ढोल और झाँझन के बीच रस भरी फागें और तरा-तरा के रसीले गीत सब मिलकें गाउत हैं। फागुन की पूनों कों बाजे-गाजे के साथ होरी गीत गाउत भए गाँव के बाहर सबरे होरी उराउत हैं और कण्डा-लकड़ियाँ-गोबर के बल्ला जरत होरी में डार के गोजा-गुजियाँ आदि पकवान और रंग-अबीर चढ़ा कें होरी की पूजा करत हैं। बाके बाद बई में सें आगी ल्याकें अपने-अपने घरन में सब परिवार के संगै होरी जराउत हैं। सब एक दूसरे कें रंग-अबीर लगाउत हैं। गले मिलत हैं, छोटे अपने बड़िन के पाँव छू कें आशीर्वाद लेत हैं। बस होरी जरबे के टैम सेंइँ रंगा-रंग सुरू हो जात। जितै देखों उतइँ रंग-अबीर। छोटे-बड़े औरत-मर्द सबई बंदरा-लँगूरन जैसो मौं बनाय दिखाई देत। सबइ नर-नारी आपुस के ईरखा-द्वेष, भेदभाव कों भूल कें एक-दूसरे के गरे मिलत हैं। कोउ काउ की गारियन को या उल्टी-सीदी कही बातन को बुरो नइँ मानत। जा है इतै की होरी जो आपुस में प्रैम और भाईचारा को सँदेसो आजउँ दै रइ।
होरी के त्यौहार पै घर-घर में कम से कम दो-चार दिना पैले सें तरा-तरा कीं मिठाईं, गोजा-गुजियाँ, झार के लड़ुआ, ऐरसे आदि बनबो सुरू हो जात है। होरी कों गाँव भर में मिठाइयन की, पुआ-पुरीं, कचैरियन आदि पकवानन की मँहक सबकों बिनइँ खायँ छका देत है। घर-गांव सें दूर नौकरी और ब्यौपार-बंज क्रबे बाले लोग अपने बाल-बच्चन समेत अपने गाँव आकें घर-परिवार के संगै ई पावन त्यौहार मनाउत हैं। आपुस में एक-दूसरे के घर की भौजाइयें देवरन को नौता करकें अपने हाँत सें बनाए पकवान खबाउतीं हैं और उनके रंग-अबीर, लगाउतीं हैं, काजर-बूँदा टिकली-माहुर लगा कें आशीर्वाद देतीं हैं। देवर भी भौजाई कों मिठाई और उपहार बगैरा भेंट करत हैं। ऐसो प्रैम-आनन्द सब जगाँ मिलबो दुरलभ है।
गाँव खिली होरी की एक झाँकी हम अपँए गीत के माध्यम से अपुन औरन कों दिखा रए। बिल्कुल आँखन देखी है, देखो-एक जीजा जू होरी पै अपनी ससुरार में आन फंसे। उनपै कैसें होरी खिली, उनपै का बीती, सो देखो-
होरी को हुरदंग
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नन्दबाइ ने चिठिया लिख दइ, होरी पै जिन अइयो।
इतै कुधर हो जै है बालम! चार दिना गम खइयो।।
जीजा-जू आये तै तौरस, गत-उनकी देखी ती,
घर-घर से आये ते नोंता, होरी ऐन खिली ती,
माहुर-बूँदा-टिकुली रुच-रुच कर गइँ तीं भौजाई,
माँग भरी सेंदुर से, ओंठन लाली चटक लगाई,
ऐसे फँसे भगउ नइँ पाये, तुमउँ न आ फस जइयो।। इतै कुधर हो जै है..
गाँव भरे की भौजाइन ने करी कुगत सो छोड़ो,
भओ अँगाई का-का साजन। ध्यान उतै कों मोड़ो
द्वारें कढ़े कि चार मुचण्डा भइयन नें गपया लयो,
घात लगायें बैठे ते सब, उन्नें गधा मँगा लयो,
फिलट रंगों तो मौं जीजा को, होसयार तुमं रहयो।। इतै कुधर हो जै है..
उन्ना सब उतार कें, उनकों लँहगा पैराओ तो,
अँगिया बाँधी ती छाती पै, जम्फल हिलगाओ तो,
उढ़ा चुनरिया, मौं पै हल्को डार दओ तो घूंगट,
मौंर बाँध दइ ती खजूर की उनके माथे पै झट,
जबरन दव बेठार गधा पै, तुमउँ न हँसी करइयो।। इतै कुधर हो जै है..
बजन लगे ते ढोल-झाँझ ढप, आये तबई गबइया,
फागें गब रइँ तीं छुतयानी, का बतायँ हा दइया,
भीड़ गबउआ-हुरियारिन की चली नचत गाउत भइ,
जीजा जू की चली सबारी पाछूँ सें मटकत भइ,
सबई लगत ते रीछ-लँगूरा, तुमउँ न हुरया जइयो।। इतै कुधर हो जै है..
राई-नोंन उसारें कोऊ, बिजना कोउ डुलाबैं,
द्वारिन-द्वारिन जीजा जू को टीका बे-करवाबै,
गुजिया ख्वाय, मार कें गुल्चा हँस रइँ तीं भौजइयाँ,
जीजा जू जब नजर लेत ते, भकुर जात ती मुँइयां,
होरी को हुरदंग बुरो है, ससुरारै जिन अइयो।
इतै कुधर हो जैहे बालम! चार दिना गम खइयो।


रजिस्ट्रार
शासकीय आदर्श विज्ञान महाविद्यालय,
ग्वालियर म0प्र0

बुन्देली का मानकीकरण


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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डा0 कैलाश बिहारी द्विवेदी


बुन्देली भाषी क्षेत्र विस्तृत है। इसके विस्तार के सम्बन्ध में डा0 एम. पी. जैसवाल ने कुछ रोचक तथ्य दिये हैं-
1-बुन्देली का क्षेत्र पश्चिमी हिन्दी के लगभग आधे क्षेत्र में फैला हुआ है।
2-खड़ी बोली, ब्रज और कन्नौजी के सम्मिलित क्षेत्र के बराबर बुन्देली क्षेत्र है।
3-यूरोप के स्विटजरलैण्ड और बैलजियम के सम्मिलित क्षेत्र के बराबर बुन्देली क्षेत्र है।
बुन्देली उत्तर प्रदेश के छः जिलों -झाँसी, ललितपुर, महोबा, उरई (जालौन) हमीरपुर तथा बाँदा और मध्य प्रदेश के लगभग बाईस जिलों-टीकमगढ. छतरपुर, पन्ना, सागर, दमोह, सतना, की नागौद तहसील, जबलपुर की मुड़बारा (कटनी) तहसील छोड़कर नरसिंहपुर, मण्डला, सिवनी, रायसेन, भोपाल, होशंगाबाद, विदिशा, गुना, मुरैना, भिण्ड़, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, सीहौर जिलें का कुछ भाग तथा बालाघाट और छिन्दबाड़ा के कुछ भागों में बोली जाती हैं।
भाषाई क्षेत्रों की सीमा राजनैतिक सीमाओं की तरह बिल्कुल निश्चित तो होती नहीं है। दो भाषाओं या बोलियों के बीच एक संक्रमणशील क्ष्ेत्र होता है। इसमें दोनों बोलियों की झलक रहती है। प्रमुखतः शब्द समूह मिश्रित रहता है। उदाहरणार्थ सतना जिले की बोली को बुन्देली भाषी बघेली कहते हैं और बघेली भाषी बुन्दलहाई बघेली कहते हैं। इस कारण उपर्युक्त जिलों में से ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, गुना आदि दूसरी बोलियों से लगने वाले जिलों की बुन्देली पर निकटवर्ती बोलियों का प्रभाव है।
इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के आगरा, इटावा और मैनपुरी जिलों में भी काफी बुन्देली भाषी हैं। ग्रियर्सन ने सन् 1891 की जनसंख्या के अनुसार इनकी संख्या 313000 लिखी थी। इसके विच्छिन्न रूप म0प्र0 के बैतूल तथा महाराष्ट्र के भण्डारा, अमरावती और चान्दा जिलों में पाये जाते हैं। ग्रियर्सन ने नागपुरी हिन्दी को भी बुन्देली के अन्तर्गत माना है।
बुन्देली की भाषिक इकाई का क्षेत्रफल लगभग 183479 वर्ग किमी0 है। सम्पूर्ण बुन्देली क्षेत्र की बोली को एक नाम न मिल पाने का मुख्य कारण है इसका बुन्देली नाम। यह नाम बुन्देला क्षत्रियों से जुड़ा है। इस कारण जो क्षेत्र बुन्देला राज्यों के बाहर थे, उन्हें अपनी बोली को बुन्देली कहने में ऐतराज रहा। इस मानसिकता के कारण इसके छोटे-छोटे क्षेत्रों की बोली के लिए मरैठी, डँगई, चैरासी की बोली, मालए की बोली, सगरयाऊ, गढ़ा की बोली, खटोला की बोली, लुदयाऊ या रठोंय (जिसको बाद मे ग्रियर्सन ने क्रमशः लुधाँती और रठौरा कहा), पवारी, भदौरी, तवरधारी, बनाफरी, लोधी, कुम्हारी, कोष्ठी, चमारी, गावली आदि जातियों या स्थानों के आधार पर नाम चलते रहे। डा0 कृष्णलाल हंश ने ऐसे बहुत सारे नामों का उल्लेख किया है परन्तु वास्तविकता यह है कि मोटे तौर पर इसके दो ही रूप हैं-एक पूर्वी दूसरी पश्चिमी। पूर्वी का क्षेत्र विस्तार पश्चिमी से लगभग दोगुना है। पूर्वी पर नव प्रवर्तन का प्रभाव कम है। जबकि दिल्ली से दक्षिण के सैनिक अभियानों का मार्ग होने तथा वहाँ की उपजाऊ धरती होने के कारण दिल्ली के शासकों की लुब्ध दृष्टि बुन्देली के पश्चिमी क्षेत्र पर सदा लगी रही। इस कारण वह बार-बार आक्रमणों का शिकार होता रहा और उनके अधीन भी रहा। अतएव दिल्ली-मेरठ के आसपास की कौरवी बोली के संघात से उसमें नव प्रवर्तन अधिक हुआ। इस क्षेत्र पर गैर बुन्देली शासन जो स्वतंत्रता पूर्व तक रहा, वह भी नव प्रवर्तन का एक कारण है।
सर्वप्रथम सन् 1894 से 1933 तक ग्रियर्सन ने जब भारतीय भाषाओं का व्यापक सर्वे कराया तब भाषाई तत्वों के आधार पर इस सम्पूर्ण क्षेत्र के उपबोलीगत रूपों में एकसूत्रता की तलाश कर उनके समग्र रूप को बुन्देली के रूप में मान्यता किया।
बोलियों के छोटे या बड़े उपबोली रूपों के विकसित होने के कारण हैं-
(1) घने जंगलों, नदियों, पहाड़ों आदि प्राकृतिक बाधाओं का होना, जिससे बोलीगत आदान-प्रदान स्वतंत्रतापूर्वक और बारम्बार नहीं हो पाता है।
(2) राजनैतिक एक सूत्रता का अभाव।
(3) समाजैतिहासिक प्रभाव आक्रमणकारियों की भाषा के संघात से बोलियों में संकरता पैदा होती है और राजनैतिक उथल-पुथल भरे अशान्त वातावरण में साहित्य सृजन न हो पाने के कारण बोलियों का मानक रूप नहीं उभर पाता है। बुन्देली के साथ ये सभी कारण जुड़े हुए हैं।
इनके प्रभाव से बुन्देली के स्वरूप में जो विविधता है, वह निम्न प्रकार हैं-
(1) बुन्देली भाषी क्षेत्र के कई अन्य बोली क्षेत्रों से घिरे होने के कारण इसका वाक्यगत बलाघात सुर लहर और अंशतः शब्द समूह प्रभावित हुआ है।
(2) हकार प्रयोग की न्यूनाधिकता पायी जाती है।
(3) रकार लोप की प्रवृत्ति और उसकी विभिन्न पद्वतियों से रकार कहीं स्वरीकृत होता है। जैसे-अटारी-अटाई, कहीं अग्रध्यनि में द्वित्व हो जाता है जैसे -करलो, कल्लो, धर दो धद्दो। रकार लोप की न्यूनाधिकता बोलने वालों के बौद्धिक स्तर पर निर्भर करती है।
(4) महाप्रणत्व की न्यूनाधिकता-जैसे बनाफरी और लुघांती के कुछ क्षेत्रों में महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। हकार बहुलता इसी का एक अंग है। बुन्देली के अन्य क्षेत्रों में, सगरयाऊ को छोड़कर अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति है। दूसरी प्रवृत्ति है महाप्राणत्व के शब्दगत अपशरण की। जैसे स्तम्भ-थामों, रकम्भ-खास, वृहद्-भौत।
(5) कृषि सम्बन्धी क्षेत्रीय और अतिक्षेत्रीय शब्दों का प्रचलन पाया जाता है।
(6) सर्वनामों में कुछ अधिक भिन्नता पायी जाती है। जैसे-स्थानवाची सर्वनामों में इतै-उतै, नायँ-मायँ, ह्याँ-हाँ, हिनाँ-हुनाँ, झाँ-भाँ आदि रूप पाये जाते हैं। पुरुषवाची सर्वनामों में उत्तम पुरुष एकवचन में ‘मैं, ‘हम’ बहुवचन में ‘हम औरें’ और ‘हमन’ रूप पाये जाते हैं। मध्यम पुरुष में ‘तूँ, तें’ और तुम तथा बहुवचन में ‘तुम औरें’ और ‘तुमन’ शब्दों का प्रयोग होता है। निश्चयवाची सर्वनामों में दूरवर्ती ‘ऊ,ओ और बा’ तीन रूप प्रचलित हैं। निकटवर्ती में ‘ए, ई और जा’ प्रचलित है।
(7) बहुवचन बनाने के लिए ‘न’ और ‘ओं’ परसगों का प्रयोग होता है। जैसे मोड़ा-मोड़न तथा मोड़ा-मोंड़ों।
(8) बलवाची प्रत्यय ऊ तथा ई का प्रयोग होता है और अधिक बल देने के लिए कहीं-कहीं ‘आ’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-हमइँआ गये ते। इस उदाहरण में हम के साथ ‘ई’ और ‘आ’ का दुहरा बल लगा है। शब्द पर अधिक बल देने की एक और भी पद्वति है जिसे तत्स्थानी बलवाची कहा जा सकता है। जैसे सबरौ-सब्बरौ-बब्बरौई, तनक-तन्नक-तन्नकऊ, निठुँअँइँ-निठ्टुँअँइँ। प्रथम दो उदाहरणों में दुहरा बल लगा है। तीसरे का पहला रूप भी बलयुक्त है। उस पर भी दुहरा बल दिया गया है।
आजकल शिक्षा और संचार माध्यमों के प्रसार तथा यातायात के साधनों में वृद्धि के कारण जनसामान्य में नकली और दिखावटी जीवन जीने की ललक पैदा हो रही है। इससे लोगों के मन में लोक भाषा और संस्कृति के प्रति एक हीन भावना घर करती जा रही है फिर भी सरकार, विश्वविद्यालय और बुद्धिजीवी, जो भविष्यचेता हैं तथा यह जान रहे हैं कि इस ऊहापोह भरे भौतिकवादी युग में लोकभाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, परम्परा आदि सम्पूर्ण लोक-विरासत शीघ्र ही विच्छिन्न होकर एक संक्रमण शून्य अन्तराल पैदा करने वाली है, के प्रयत्न और प्रोत्साहन से लोक साहित्य और संस्कृति पर किये जाने वाले काम को कुछ महत्व मिलने लगा है। अतएव उसके संरक्षण और संवर्धन की प्रेरणा लोगों में पैदा हो रही है। इस कारण आज यह आवश्यक हो गया है कि बुन्देली का एक परिनिष्ठित या मानक रूप स्थापित हो, ताकि बुन्देली साहित्य के संवर्द्धन के लिए एक व्यापक आधार बने।
भाषा के विकास की गति स्वाभाविक होती है। यदि उसकी गति से अधिक छेड़-छाड़ की जाये तो नव स्थापित रूप प्रवाह में तैरते हुए हलके पदार्थ की तरह एक किनारे जा लगता है और प्रवाह स्वाभाविक गति से अनवरत आगे बढ़ता जाता है, संस्कृत के साथ यही हुआ।
अतः बुन्देली के मानक स्वरूप को स्थापित करना एक संवेदनशील प्रश्न है। इसके मानक स्वरूप को स्थापित करने के जिन आवश्यक तत्वों की तलाश हो, वे इसके अपने ही होना चाहिए। इस दृष्टि से टीकमगढ़ नगर से एक सौ मील अर्द्धव्यास के वृत्त में आने वाली बोली को बुन्देली का मानक रूप मानना उचित होगा क्योंकि इस वृत्त क्षेत्र की बोली में बुन्देली के सभी उपबोली रूपों की विशेषतायें घुली-मिली हैं।
विचारार्थ कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
(1) पूर्वी बुन्देली में उत्तम पुरुष एक वचन के लिए ‘हम’ मध्यम पुरुष के लिए ‘तुम’ और ‘तें’ का प्रयोग होता है। पश्चिमी क्षेत्र में ‘में’ (एकवचन) ‘हम’ (बहुवचन) तथा मध्यम पुरुष के लिए एकवचन में ‘तूँ’ और ‘तुम’ तथा बहुतवचन में ‘तुम’ का प्रयोग होता है। प्रस्तावित क्षेत्र में उत्तम पुरुष एकवचन के लिए ‘में’ और ‘हम’ दोनों का प्रयोग होता है। इनके प्रयोग में भिन्नता अहम्, लघुता अथवा विनम्रता-प्रदर्शन जैसी भी स्थिति हो, उस पर निर्भर करती है। अहम् वाली स्थिति में हम का प्रयोग होता है। बहुवचन के लिए ‘हम औरन’ का प्रयोग होता है। लघुता या विनम्रता की स्थिति में एकवचन के लिए ‘मैं’ तथा ‘हम’ दोनों का चलन है। बहुवचन के लिए ‘हमन’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। मध्यम पुरुष में भी बहुवचन बनाने की यही शैली प्रचलित है।
(2) पूर्वी बुन्देली में वर्तमान कालिक सहायक क्रिया के रूप में ‘आय’ तथा पश्चिमी क्षेत्र में ‘है’ का प्रचलन है। प्रस्तावित क्षेत्र में दोनों का प्रचलन है। जैसे-इतै तौ कछू हैई, उतै काय धरो? इस उदाहरण में ‘है’ तथा ‘आय’ दोनों का प्रयोग हुआ है।
(3) बुन्देली के पूर्वी रूप में दूरवर्ती निश्चयवाची सर्वनाम ‘ऊ’ और इसी के विकारी रूप ‘ओ’ तथा निकटवर्ती में ‘ए’ और ‘ई’ का प्रयोग होता है। पश्चिमी में क्रमशः ‘बा’ और ‘जा’ प्रचलित है। प्रस्तावित क्षेत्र में दोनों के प्रयोग वैकल्पिक नहीं बल्कि भिन्न-भिन्न स्थितियों में रूढ़ है। प्रस्तुत उदाहरणों में उपर्युक्त सभी सर्वनामों का प्रयोग हुआ है।
1. ऊ सें कैदो बौई चलो जाये। ओई ने पैलाँ कईती कै हम चले जेंयँ/जेंहे।
2. जा लुगाई महाँ चण्डालन आ है। बा तौ सूदरी है।
3. ई मोड़ा के मारें नाँक में दम है। एई सें तौ हम इयै क्याऊँ लुआ नइँ जात।
इन थोड़े से उदाहरणों से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में किसी सर्वनाम का प्रयोग एकान्तिक नहीं होता है और न विकल्पनीय है।
(4) पूर्वी बुन्देली में कर्मकारक परसर्ग खों, खाँ और खें का वियोगात्मक प्रयोग होता है। जैसे-राम खों, ऊ खाँ आदि। पश्चिमी में ‘ए’ ‘य’ अथवा ‘य’ का श्लिष्ट प्रयोग होता है। जैसे-रामें किताब लैदो, बाय जान दो। वियोगात्मक विभक्ति ‘को’ का भी कहीं-कहीं प्रयोग होता है। प्रस्तावित क्षेत्र में सर्वनामों के साथ ए अथवा ‘ए’ का श्लिष्ट योगात्मक प्रयोग हमें, तुमें, उऐ, उनें, इऐ होता है। यद्यपि अन्य पुरुष सर्वनामों के साथ वियोगात्मक विभकत ‘खो’ का प्रयोग भी होने लगा है। यथा ई खों, ऊ खो, इन खों आदि। परन्तु यह परिनिष्ठित हिन्दी का नव प्रवर्तित प्रभाव है। मानक बुन्देली में यदि ‘खो’ को अपनाया जाये तो अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि यह मध्यवर्ती रूप है और ‘खाँ’ की अपेक्षा श्रुतिमधुर है।
(5) पूर्वी बुन्देली के अधिकांश भागों में बलवाची ‘ई’ का तथा पश्चिी में ‘ऊ’ का प्रयोग होता है। संदर्भित क्षेत्र में दोनों का प्रयोग कुछ रूढ़ स्थितियों में होता है। मानक रूप में ये दोनों अपनाये जा सकते हैं।
(6) यहाँ तक कि बनाफरी क्षेत्र संदर्भित क्षेत्र से थोड़ा दूर है फिर भी मुलक केरे, मुतकेरे, ग्ललन केरे आदि परिमाणवाची विशेषणों पर बल देने के लिए ‘के’ के बजाय ‘केरे’ का इस्तेमाल किया जाता है जो बनाफरी प्रयोग है।
(7) स्थानवाची सर्वनामों में पूरे बुन्देली क्षेत्र में बहुत विविधता है (जिनका उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है)। संदर्भित क्षेत्र में ‘इतै-उतै’, ‘जितै-कितै’, ‘जाँ-काँ’ का प्रयोग होता है। मानक रूप में इन्हीं का प्रयोग होना उचित है। ये यत्र-तत्र आदि से विकसित होने के कारण अध्ािक कुलीन है और संस्कारवान भी। इनका प्रयोग तुलसी, कबीर, लाल तथा अन्य कवियों ने किया है। जैसे-
‘भोजन करत चपल चित, इत उत अवसर पाई।’ - तुलसी
‘इत तें सब कोउ जात है उत तें कोउ न आय।’ - कबीर
‘जित जित घोड़ा पग धरै, उत उत फतै होय।’ - लाल
‘इत जमना उत नर्मदा इत चम्बल उत टोंस।’ - लाल
(8) इसी तरह परिमाणवाची विशेषणों में भी पूरे बुन्देली क्षेत्र में बहुत विविधता है। भौत, मुतके, कुल्ल, बिलात, गल्लन, भारी आदि शब्द प्रचलित हैं। इनमें से मानक बुन्देले के लिए ‘भौत’ शब्द ग्रहण करने योग्य है। क्योंकि यह शब्द ‘प्रभूत’ या ‘बृहद’ का विकसित रूप है। इसका विकास अभिधामूलक है। इसके ‘बृहद्’ से विकसित होने की संभावना अधिक है क्योंकि बहुत के अर्थ में ‘बड़े’ शब्द का प्रयोग आज भी पाया जाता है। जैसे-तुम तो बड़े अच्छे लगत। उतै बड़े मान्स जुटे ते। शेष शब्दों का विकास लक्षणामूलक है। गल्लन की जड़ें तो फारसी गल्लाह शब्द में खोजी जा सकती हैं।
संदर्भित क्षेत्र में बोली को बुन्देली के मानक रूप में स्वीकार करने का औचित्य यह भी है कि ओरछा का राज्य दीर्घजीवी रहा है। इस कारण राजाश्रय में यहाँ की बोली को विकास करने का अवसर मिला। इसमें साहित्य रचा गया। ग्रियर्सन तथा अन्य सभी विद्वानों ने जिस क्षेत्र में बोली को बुन्देली का परिनिष्ठित रूप माना है, प्रस्तावित क्षेत्र उसी का मध्य भाग है। यद्यपि ओरछा राज्य का बहुत विस्तार हुआ था किन्तु कालान्तर में यह बँटता या टूटता रहा। परिणामस्वरूप राजनैतिक वर्चस्व के अनुक छोटे-बड़े केन्द्र स्थापित हो गये। उनमें वर्चस्व भले ही बुन्देली का रहा और राज-काल में वही चलती रही, लेकिन स्थानीय जन-बोलियों के शब्द समूह, ध्वनि, प्रवृत्तियों और सुर लहर के संघात से उसके उपबोली रूप उभर आये किन्तु केन्द्र ओरछा ही रहा। इस कारण यहाँ की बुन्देली किसी जन-बोली के संक्रमण से अछूती रही है।
एक प्रश्न यह भी विचारणीय है कि ग्रियर्सन ने इटावा, मैनपुरी से छिंदवाड़ा और नागपुर तक फैली हुई जिस बोली को एक रूप में पहचाना उसको बुन्देली नाम ही क्यों दिया? इस प्रश्न का उत्तर यह हो सकता है कि ओरछा के बुन्देला राजाओं की छत्रछाया में जो बोली फल-फूल रही थी, उसी का पूरे क्षेत्र में स्थानीय रंग लिए हुए विस्तार था। तात्पर्य यह कि प्रश्नान्तर्गत क्षेत्र की बोली को ही बुन्देली की मूल प्रकृति के रूप में उसी प्रकार स्वीकार किया जाना चाहिए जिस प्रकार आचार्य वररुचि ने मध्यदेशीय या शौरसैनी प्राकृत को सभी प्राकृतों की मूल प्रकृति माना है।इससे एक लाभ यह भी है कि समस्त क्षेत्रों के बुन्देली भाषियों को इसमें अपनी बोली की झलक मिलेगी।
एक दृष्टिकोण यह भी है कि बुन्देली व्याकरण में बुन्देली शब्दों के साथ ही परिनिष्ठित हिन्दी और संस्कृत के शब्दों को जड़ कर मणिकांचन शैली को अपनाया जाये। इस शैली को अपनाने से बुन्देली का मानक रूप तो उभरता दिखेगा और उसकी सुबोधता का क्षेत्र भी व्यापक होगा, परन्तु बुन्देली की अभिव्यक्ति क्षमता के हास होने की संभावना भी इस प्रयोग में है। अतः इस प्रयोग में सावधानी आवश्यक है। साहित्यिक हिन्दी परिनिष्ठीकरण के चक्कर में बहुत कुछ अपनी विरासत खो बैठी है।
इस प्रकार का प्रयोग अनुवाद कार्यो में किया जा सकता है क्योंकि पुरानी भाषा, विदेशी भाषा या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की प्रवृत्तियों और शब्दों के अर्थ परिवृत्त (माहौल) में अन्तर हो सकता है, जिसे पाटने के लिए हिन्दी, संस्कृत या अति आवश्यक होने पर अन्य भाषाओं के शब्दों का बुन्देली में प्रयोग करना अनुचित और आपत्ति करने योग्य नहीं माना जाना चाहिए।

पुरानी नजाई,
टीकमगढ़ (म0प्र0) पिन- 472001

Tuesday, March 31, 2009

दोहा छन्द का भेदपरक अध्ययन


शोध आलेख / जुलाई-अक्टूबर 08
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प्रवीण कुमार ‘उजाला’



दोहा छन्द अर्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में तेरह-तेरह मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में ग्यारह-ग्यारह मात्राएँ होती हैं। दोहा छन्द ने काव्य साहित्य के प्रत्येक काल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हिन्दी काव्य जगत में दोहा छन्द का एक विशेष महत्व है। दोहे के माध्यम से प्राचीन काव्यकारों ने नीतिपरक उद्भावनायें बड़े ही सटीक माध्यम से की हैं। दोहा छन्द के भेद का वर्णन इस प्रकार है-
(1) भ्रमर - 22 गुरु 4 लघु, कुल 26 वर्ण
‘‘सीता सीतानाथ को, गावौ आठौ जाम।
सव्र्वोच्छा पूरी करैं, औ देवैं विश्राम।’’1
(2) भ्रामर - 21 गुरु 6 लघु, कुल 27 वर्ण
‘‘माधो मेरे ही बसो, राखो मेरी लाज।
कामी क्रोधी लपटी, जानि न छांड़ो काज।’’2
(3) सरभ - 20 गुरु 8 लघु, कुल 28 वर्ण
‘‘हर से दानी कहुं नहीं, दीन्हें केते दान।
कैसे को भाषै तिन्हें, बानी एकै जान।’’3
(4) श्येन/सेन - 19 गुरु 10 लघु, कुल 29 वर्ण
‘‘चंदन, बेला, मौलिश्री, नाभि न लहे कुरंग।
सोंधी सोंधी गंध जो, लोने लोने अंग।’’4
(5) मंडूक - 18 गुरु 12 लघु, कुल 30 वर्ण
‘‘कैसी ऋतु कैसी हवा, बौरे आम बबूल।
कहीं डोलते शूल हैं, कहीं फूलते फूल।’’5
(6) मर्कट - 17 गुरु 14 लघु, कुल 31 वर्ण
‘‘तेरे मेरे प्यार का आज मचा है शोर।
हुआ जागरण चतुर्दिक देख नवेली भोर।’’6
(7) करभ - 16 गुरु 16 लघु, कुल 32 वर्ण
‘‘तुम आत्मा हर देह की, मन के जाननहार।
भूतात्मा कहता तुम्हें, इसीलिये संसार।’’7
(8) नर - 15 गुरु 18 लघु, कुल 33 वर्ण
‘‘डूब रहा जग जलधि में, कैसे पाऊँ कूल।
अर्पित युग पद पù में, यह पूजा के फूल।’’8
(9) मराल/हंस - 14 गुरु 20 लघु, कुल 34 वर्ण
‘‘तुम उलूक बैठे फिरौ, महिलन त्याग कुटीर।
तेरे हिय उपजै कहा, या गरीब की पीर।’’9
(10) मदकल - 13 गुरु 22 लघु, कुल 35 वर्ण
‘‘पालन पोषणहार तुम, लिये सत्व गुण साथ।
अतः ‘भूतभृत्’ नाम है, तब पुराण विख्यात।’’10
(11) पयोधर - 12 गुरु 24 लघु, कुल 36 वर्ण
‘‘तरुणाई पर निज तनिक, मतकर आज गरूर।
धीरे-धीरे उड़ रहा, टिकिया बना कपूर।’’11
(12) चल - 11 गुरु 26 लघु, कुल 37 वर्ण
‘‘पवन संचरण मंद है, सोंधी शीतल गंध।
पनघट-पनघट हो रहे, केसरिया अनुबंध।’’12
(13) वानर - 10 गुरु 28 लघु, कुल 38 वर्ण
‘‘चरण युगल चिन्ता हरण, सकल विभव सुख मूल।
ध्यान धरे जो हो अभय, मिटें ताप त्रय शूल।’’13
(14) त्रिकल - 9 गुरु 30 लघु, कुल 39 वर्ण
‘‘मेंटत विधि के अंक सब, दुख दारित छन माँहि।
सब भरोस तज, गुरु शरण, जो जन निश्छल आँहि।’’14
(15) कच्छ - 8 गुरु 32 लघु, कुल 40 वर्ण
‘‘श्री गुरु के पद कंज युग, भव वारिधि जलयान।
सुमिरि सुमिरि नर तरहिं भव होय तुरत कल्यान।’’15
(16) मच्छ - 7 गुरु 34 लघु, कुल 41 वर्ण
‘‘दीन वचन शुचि नम्रता निश्छल हृदय विशाल।
कमल पत्र-वत् रहत जग, सद्गुरु भक्त दयाल।’’16
(17) शार्दूल - 6 गुरु 36 लघु, कुल 42 वर्ण
‘‘वंदौ पद धरि धरणि शिर, विनय करहुं कर जोरि।
वरणहु रघुवर विशद यश, श्रुति सिघातं निचोरि।’’17
(18) अहिवर - 5 गुरु 38 लघु, कुल 43 वर्ण
‘‘कनक मरण तन मृदुल अति, कुसुम सरिस दरसात
लखि हरि दृग रस छकि रहे, सिरसाई सब बात।’’18
(19) व्याल - 4 गुरु 40 लघु, कुल 44 वर्ण
‘‘हम सन अधम न जग अहै, तुम सन प्रभु नहिं धीर।
चरन सरभ इहि उर गह्यो, हरहु सु हरि भव पीर।’’19
(20) विडाल - 3 गुरु 42 लघु, कुल 45 वर्ण
‘‘विरह सुमिरि सुधि करत नित, हरि तुव चरन निहार।
यह भष जलनिधि तें तुरत, कब प्रभु करिहहु पार।’’20
(21) सुनक/श्वान - 2 गुरु 44 लघु, कुल 46 वर्ण
‘‘तषु गुन अहिपति रटत नित, लहि न सकत तुव अंत।
जग जन तुल पद सरन गहि, किमि गुमि लकहिं अनंत।’’21
(22) इंदुर/उदर - 1 गुरु 46 लघु, कुल 47 वर्ण
‘‘कलुषहरण भवभयहरण, सदा सुजन सुख अयन।
नमहित हरि सुरपुर तजत, धनि धनि सरसिज नयन।’’22
(23) सर्प - सर्व लघु, कुल 48 वर्ण
‘‘अरुण चरण कलिमल हरण, भजतहिं रह कछु भयन।
जिनहिं नषत सुर मुनि सकल, किन भज पयनिधि सयन।’’23
सपुच्छ दोहा - यह सपुच्छ दोहा नामक विषम छन्द, 58, 59, 60, 61 मात्राओं का होता है। दोहे के अन्त में 10, 11, 12, 13 मात्रा का एक पुच्छ संलग्नक जोड़ दिया जाता है।
उदाहरण - 10 मात्रा का पुच्छ
‘‘विमल ज्ञान दाता सुगुरु, करूँ तव चरण ध्यान।
हनुमत पच्चीसी लिखूँ, राम मिलन विज्ञान -
रसायन भक्ति का।’’24
उदाहरण - 11 मात्रा का पुच्छ
‘‘कुरस खड़ी बोली कथन, सरस हृदय की बात।
तुम ही लिखना राम जी, मेरी कहाँ विसात -
सभी बला थक चुके।’’25
उदाहरण - 12 मात्रा का पुच्छ
‘‘जीवन के संघर्ष में जो देता है साथ।
हरीश्याम ’माया’ वही जगन्नाथ है हाथ -
सदा जो साथी संग।’’26
उदाहरण - 13 मात्रा का पुच्छ
‘‘जीवन के संघर्ष में जो देता है साथ।
हरीश्याम ’माया’ वही जगन्नाथ है हाथ -
सदा का साथी संगी।’’27
दोही (मात्रिकार्द्धसम) - इस छन्द के चारों चरण मिलाकर 52 मात्राएँ होती हैं। इसके विषम चरण (1 व 3) में 15 मात्राओं वाले एवं सम (2 व 4) 11 मात्राओं के होते है। अन्त में दोहे की भाँति लघु (।) वर्ण अनिवार्य है।
‘‘जगत नारि जीवन अति दुखी, है विचित्र संसार।
जन्म मिला जिसके उदर से, उस पर अत्याचार।।’’28
दोहा चण्डालिनी - यह दोहे की भाँति लिखा जाता है किन्तु जिस दोहे के प्रथम और तृतीय चरण में से किसी एक जगह जगण (।ऽ।) शब्द आ जाये तो वह दोहा चण्डालिनी होता है।
‘‘अजीत कोई वीर हो, टूट हृदय उदार।
हारा ही वह मान्य है, क्यों कि गया मन हार।’’29
दोहकीय (समभागवत) - 13, 13 मात्राओं के चार चरण तथा सम चरणों (2 व 4) के अन्त में गुरु लघु (ऽ।) वर्ण होने का अनिवार्य नियम है।
‘‘कविजन कोविद जन सभी, जो होते दिव्य चरित्र।
केवल उनका सृजन ही है, जग समाज का मित्र।’’30
दोहरा मात्रिकार्द्धसम - इसके चारों चरण में 46 या 47 मात्राएँ होती हैं। इसके प्रथम विषम में तो कभी तृतीय विषम में तो कभी प्रथम व तृतीय दोनों ही विषम चरणों में 12, 12 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों में 11, 11 मात्राएँ होती हैं।
‘‘देखा एक सपेरा, पाले अनगिन नाग।
सब को वश में राखे, द्वेषादिक अरु राम।।’’31
विदोहा (मात्रिकाद्धसम) - इसके विषम चरणों (1 व 3) में 13, 13 मात्राएँ और सम चरणों (2 व 4) में 10, 10 मात्राएँ, कुल मात्राएँ 46 होती हैं। चरणान्त में लघु वर्ण नहीं होता है किन्तु गुरु वर्ण अनिवार्य होता है,
‘‘राम नाम जिसने लिया, दुख सुख उसे कहाँ।
बस्ती विजन कहीं रहे, सुख सम उसे वहाँ।।’’32

सन्दर्भ ग्रंथ सूची –
1- छन्द प्रभाकर, जगन्नाथ प्रसाद भानु, पृ0 87
2- तदैव, पृ0 87
3- तदैव, पृ0 87
4- मौन की अर्गला, ओम नारायण चतुर्वेदी मंजुल, पृ0 16
5- तदैव, पृ0 16
6- आरजू (त्रैमासिक) अर्श अमृतसरी, अंक 2, 3 वर्ष 3, पृ0 17
7- नित्य पाठ्य स्त्रोत एवं पावन रूपान्तरण, मायाहरीश्याम पारथ, पृ0 36
8- पूजा के फूल, रामस्वरूप खरे, पृ0 1
9- मौन की अर्गला, ओम नारायण चतुर्वेदी मंजुल, पृ0 16
10- नित्य पाठ्य स्त्रोत एवं पावन रूपान्तरण, मायाहरीश्याम पारथ, पृ0 36
11- मौन की अर्गला, ओम नारायण चतुर्वेदी मंजुल, पृ0 16
12- तदैव, पृ0 16
13- पूजा के फूल, रामस्वरूप खरे, पृ0 2
14- तदैव, पृ0 21
15- तदैव, पृ0 2
16- तदैव, पृ0 13
17- छन्द प्रभाकर, जगन्नाथ प्रसाद भानु, पृ0 88
18, 19, 20, 21, 22, 23 - तदैव, पृ0 89
24- नित्य पाठ्य स्त्रोत एवं पावन रूपान्तरण, मायाहरीश्याम पारथ, पृ0 10
25- तदैव, पृ0 10
26- छन्द माया (अप्रकाशित) माया हरीश्याम पारथ
27, 28, 29, 30, 31, 32 तदैव


शोध छात्र हिन्दी साहित्य,
सुशील नगर,
उरई (जालौन) पिन-285001