Thursday, July 15, 2010

बुन्देली काव्य में सामाजिक यथार्थ



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली काव्य में सामाजिक यथार्थ
डॉ0 अवधेश चंसौलिया



बुन्देली भूभाग के अन्तर्गत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के झाँसी, हमीरपुर, जालौन, ललितपुर एवं बाँदा जिले और मध्य प्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, पन्ना, छतरपुर, दमोह, सागर जिले सम्मिलित किये गये हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के ये सभी जिले विकास की दृष्टि से अभी भी पिछड़े हुए हैं। सड़क, जल और बिजली की दृष्टि से ही नहीं अपितु शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र अभी भी विकास से कोसों दूर हैं। आज भी यहाँ पूँजीवादी और सामन्तवादी प्रथा का बोलबाला है। निर्धनता और अभावों के कारण यहाँ के बीहड़ डाकुओं की शरणस्थली बने हैं।
शिक्षा के अभाव के कारण अत्याधुनिक युग में भी यहाँ के लोग अंधविश्वासों, कुरीतियों, परम्पराओं एवं बुराइयों के पोषक हैं। आपसी ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ एवं प्रतिकार की भावना के कारण लोग अपने एवं दूसरों के जीवन को नाटकीय बनाये हुए हैं। निर्धनता को भाग्य मानकर स्वीकार करने वाले ये लोग आगे बढ़ने का प्रयास ही नहीं करते। निर्धनता और अभावग्रस्त जीवन का यह सिलसिला जगनिक काल से ही चला आ रहा है। पृथ्वीराज चौहान एवं महोबा के सम्राट परमाद्रिदेव के युद्ध में बुन्देलखण्ड के किसानों की फसल तो बर्बाद होती ही थी, युद्धों के कारण साधारण जनजीवन भी प्रभावित होता था। जगनिक कहते हैं कि पृथ्वीराज की सात लाख सेना ने महोबे पर आक्रमण कर दिया।
‘‘ऐसो समय परौ महुबे पै विपदा कछू कहीं न जाये।
X X X X
रोबे रैयत चन्देलों की, हा हम कौन देश भग जाये।’’1
ईसुरी के समय भी कामोवेश यही स्थिति थी। युद्ध तो इतने नहीं थे परन्तु प्राकृतिक उत्पात कम नहीं थे-
‘‘पर गये एई साल में ओरे कऊँ भौत कऊँ थोरे,
कैसे जिये गरीब गुसइयां छिके अन्न के दौरे।’’2
इतना ही नहीं कभी फसल को ‘गिरुआ रोग’ लग जाता है तो कभी ओले से पकी पकाई फसल नष्ट हो जाती है। हाँ ईसुरी के अनुसार सम्वत 1956 में जरूर बुन्देलखण्ड में तिली की भरपूर पैदावार हुई थी, लेकिन जिन लोगों ने उस समय तिली बोई थी उन्हीं को लाभ हुआ था। यहाँ आज भी लाखों लोग भूमिहीन हैं। उन्हें तो हमेशा ही अकाल जैसा सामना करना पड़ता है। जो छोटे-छोटे किसान हैं वे प्रकृति के अधीन हैं। सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था अभी तक नहीं हो पायी है। यहाँ का किसान सदैव डरा सहमा और संशयग्रस्त रहता है क्योंकि
‘‘स्यारी में सूखा पर गऔ तो, ऊ में कछू न पाओ।
बीज साव को धरौ चुकावे दानों लैन आओ।’’ 3
उसे ऋण की चिंता तो है ही साथ ही चिंता है रमकुइया की शादी की। छितिया के चलाव को साल भर हो गया, पत्नी को ब्लाउज नहीं बनवा पाया, स्वयं की धुतिया फट गयी है, लड़के को बुखार चढ़ा है, रोटी मिल गयी तो दाल नहीं है और यदि दाल मिल गयी सो रोटी नहीं है, ऐसी करुण कहानी है बुन्देलखण्डियों की। इन सब दुर्दशाओं के बावजूद इन लोगों में गजब का आत्मसंतोष है, स्वाभिमान है-
‘‘अधर दुफर लौं जौ मिल जावै रूखी सूखी खाई।
X X X X
सादा गाँव के जीवन से भरपूर से रहौं’’4
सामन्तशाही कागजों पर तो समाप्त हो गयी लेकिन अब वह नवीन रूप धारण करके और भी विद्रूप और विकराल हो गयी है। मंत्री, नेता, अफसर, पुलिस एवं धनिक वर्ग ये नये युग के सामन्ती चेहरे हैं। ये सब मिलकर आमजन का शोषण कर रहे हैं। ये लोग डकैतों के पोषक हैं। इनके अत्याचारों के कारण ही लोग विद्रोही होकर डाकू बन जाते हैं। रानी लक्ष्मीबाई ने ‘बरजोरा डाकू’ का हृदय परिवर्तित कर अपनी फौज में सम्मिलित कर लिया था और वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा। बिनोवाजी व जयप्रकाशजी ने भी यहाँ के डाकुओं को समाज की धारा में बापस मोड़ने का सराहनीय प्रयास किया लेकिन आधुनिक प्रजातंत्र के जननायक उनसे बूथ कैप्चरिंग कराते हैं, विरोधियों का दमन कराते हैं, उन्हें हथियार प्रदान करते हैं। नेता, अफसर और ठेकेदारों के गठजोड़ ने भ्रष्टाचार को चरम पर पहुँचा दिया है। इस भ्रष्टाचार के कारण बुन्देलखण्ड का विकास जितना और जिस तेजी से होना चाहिए था, नहीं हो रहा है। फलतः अभी भी गरीबी का साम्राज्य है। इसी कारण प्रजातंत्र से लोगों का विश्वास उठ गया-
‘‘प्रजातंत्र धोखो लगै, इंदु कैवे चोखी।
माटी मिलौ सुदेश मर रई जनता भूखी।’’5
इसी तरह-‘‘भूखी सब जनता मरै, नेता गोल मटोल।
चींथ चींथ के देश खों, करतई पोलम पोल।’’6
वर्तमान में मूल्यों का हृस बहुत तेजी से हो रहा है। दहेज की भयावहता जग जाहिर है- ‘‘काट रओ दहेज को बिच्छू, पीड़ित हो रओ सकल समाज।’’7
शोषण और अत्याचार की चक्की में तो यहाँ की जनता युगो-युगों से पीसी जा रही है यथा-
‘‘तुरकन ने तिली सी अकोर लई, गोरन ने गगरी सी बोर लई।
अब अपने भारत के भैंयन ने परजा कों बिरिया सो झोर लई।
दओ उसेय पुलिस की पतीली ने,
लओ उधेर मुंसफी तसीली ने,
लील्हे सब लेत हैं किसानई कों
चींथ खाव जजी ने बकीलों ने।
मका जैसी अड़िया बिचोर लई, सहद की छतनियां सी टोर लई।’’8
डाकूग्रस्त क्षेत्र होने से यहाँ के कवियों का ध्यान इस समस्या की ओर कुछ अधिक ही गया है। यहाँ के लोग सदैव ही बन्दूकों और संगीनों के साये में दहशत भरी जिंदगी जीने पर मजबूर रहे हैं-
‘‘गैल गैल अब सो बिछी है बारूरी रेत
बन्दूकन के गाँव हैं, कारतूस के खेत।
करत डाकुअन कों सदा कारतूस जो सैल,
बेई बनत अब गाँव में मुखिया पंच पटैला।’’9
वर्तमान राजनीति ने समाज को वोटो की खातिर जातियों और वर्गों में विभाजित कर दिया है। चुनावों में इसी कारण हिंसा होने लगी है। एक साथ रहने वाला बुन्देली समाज अब पार्टियों में बंट गया है। बुन्देली कवि ने इस भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है-
‘‘हिरकन लगत हुलास जब, बढ़न लगत है हेत।
वोट बैंक की मिसमिसी रंत भौर कर देत।’’10
नेताओं ने वोट तो लिए परन्तु उनकी आर्थिक बदहाली पर कोई ध्यान नहीं दिया। यहाँ के अनपढ़ और गरीब लोग अपना वोट, केवल एक बोतल देशी शराब में या धोती में दे देते हैं। वे अभी भी भूमिहीन हैं और मजदूरी करने हेतु अभिशप्त हैं -
‘‘भुंसारे से गये खेतन में सइयां करन मजूरी।
एक मेंड़ कोऊँ मोनो होती, इच्छा होती पूरी।’’11
उन्हें मजदूरी भी सरकारी दरों के अनुसार नहीं मिलती, कुछ लोग थोड़ा सा दे देते हैं, तो कुछ लोग यों ही बेगार करा लेते हैं। बेरोजगारी का यह आलम हैं कि -
‘‘बारा-सोरा पास सड़क पै लगे मंजूरी कर रए।’’12
चुनावी घोषणाओं में नेता लोग भूमिहीनों को भूमि देने की लम्बी-लम्बी बातें करते हैं परन्तु सत्ता में आते ही वे सब वायदे भूल जाते हैं। यदि भूमिहीनों को जमीनें मिलती भी हैं, वे बंजर होती हैं या प्रभावशाली लोगों के कब्जे वाली होती हैं। अतः इस तरह उस जमीन का कोई मतलब नहीं होता। भूमिहीनों की इस भावना को कविता में इस तरह व्यक्त किया गया है-
‘‘एक बनी कानून सनत तें सब खों खेती मिल जै,
हम खों मिल जै एक टपरिया करम हमाओ खुल जै।
सिरकारउ की झूठी बातें का विश्वास करूंरी।’’13
बढ़ती हुई मंहगाई भूमिहीनों के लिए कोढ़ में खाज सिद्ध हो रही है, मंहगाई के कारण स्थिति यह हो गयी है कि-
‘‘उतै लगत अब एक रुपइया जितै लगत ती पाई।
काँ की होरी काँ को होरा? कलयुग परौ सबई पै तोरा।
X X X X
दार उधार मुहल्ला भर की, अब नौ नई चुकाई
काँसे लै आवैं तिरकाई।’’14
इस मंहगाई और गरीबी के कारण लोगों में हताशा का भाव घर कर गया है। ऊँच-नीच, छुआ-छूत और असमानता के कारण लोगों में ईर्ष्या, द्वेष, डाह, बैर के भाव जाग्रत हो गये हैं। डाकुओं से मिलकर लोग विरोधियों का अपहरण करा रहे हैं, डकैती डलवा रहे हैं और दूसरे के दुख से प्रसन्न हो रहे हैं जबकि पहले ऐसा नहीं था। अब मूल्यों का हास तेजी से हो रहा है अब वातावरण बहुत विषाक्त हो गया है-
‘‘अब कौनऊ नइँ पूंछतई, इक दूजे की खैर
कुलियन कुलियन में मिलै, द्वेष ईर्ष्या बैर।
फँसे लोभ लालच सबई, नईं इच्छन को अंत
अफसर नेता चोर है, आज देश के संत।’’15
बुन्देलखण्ड में आज भी हरिजन सवर्णों के सामने अपनी खटिया पर नहीं बैठ सकता, उनके समक्ष जूते नहीं पहन सकता। बहुत से गाँवों में यह स्थिति अभी भी है-
‘‘हरिजन जिनको कहत खाट पै अभऊँ न बैठे,
बैठें तो मुखिया कों, देखत तुरतई उठ बैठें,
नई उठें तौं रामइँ जानै कित्ते जूते परे।’’16
पुलिस के अत्याचार ऐसे हैं कि जिनके यहाँ डकैती पड़ती है, पुलिस उसी को पकड़ कर उस पर डकैतों को आश्रय देने का इल्जाम लगाकर बंद कर देती है -
‘‘बा दिन देखी नई गाँव में गई डकैती पर,
जिन पै परी उनई को उल्टे लै गई पुलिस पकर।’’17
यह इस स्वतंत्र भारत के बुन्देलखण्ड की तस्वीर है। यह संयुक्त बुन्देलखण्ड आज भी उसी सामन्ती मानसिकता में जी रहा है। विकास का, शिक्षा का, समानता का यहाँ नामोनिशान नहीं है। इन सब सुविधाओं का लाभ केवल एक वर्ग विशेष तक ही सीमित रह गया है। सामान्य-जन आज भी बदहाल है। बुन्देलखण्ड को स्पेशल पैकेज देकर इसकी समस्यायें नहीं सुलझ सकती। इसकी समस्या का समाधान पृथक बुन्देलखण्ड राज्य बनने पर ही होगा।

संदर्भ-

1. सं0 कैलाश मड़बैया, बुन्देली के प्रतिनिधि-कवि, मनीष प्रकाशन, भोपाल, 1995 पृ0 11 कवि जागनिक
2. सं0 घनश्याम कश्यप, ईसुरी की फागें, शब्द पीठ- इलाहाबाद, 1997 पृ0 132 कवि ईसुरी।
3. सं0 अशोक शर्मा, बुन्देली भाषा और साहित्य, म0प्र0 हि0 ग्रं0 अकादमी, भोपाल 2005, पृ0 85, कवि संतोष सिंह बुंदेला।
4. वही पृष्ठ 88 कवि संतोष सिंह बुंदेला।
5. सं0 श्यामसुन्दर श्रीवास्तव, ठनी साँप नौरा में, सर्वोदय साहित्य संगम मिहौना (भिण्ड) म0प्र0 2004, पृ0 27 कवि रामेश्वर प्रसाद गुप्ता।
6. वही पृ0 27 कवि रामेश्वर प्रसाद गुप्ता।
7. सं0 कैलाश मड़बैया, बुन्देली के प्रतिनिधि कवि, मनीष प्रकाशन भोपाल, 1995 पृ0 65, कवि मुंशीलाल पटैरिया
8. सं0 श्यामसुन्दर श्रीवास्तव, ठनी साँप नौरा में, सर्वोदय साहित्य संगम मिहौना (भिण्ड) म0प्र0 2004 पृ0 23 कवि शिवानन्द मिश्र बुन्देला।
9. वही पृ0 39 कवि रसूल अहमद सागर
10. वही पृ0 39 कवि रसूल अहमद सागर
11. वही पृ0 40 कवि चुन्नीलाल ‘विमल’
12. वही पृ0 40 कवि चुन्नीलाल ‘विमल’
13. वही पृ0 40 कवि चुन्नीलाल ‘विमल’
14. सं0 कैलाश मड़बैया, बुन्देली के प्रतिनिधि कवि मनीष प्रकाशन, भोपाल 1995 पृ0 25 कवि जगदीश सहाय खरे।
15. सं0 श्यामसुन्दर श्रीवास्तव, ठनी साँप नौरा में, सर्वोदय साहित्य संगम, मिहौना (भिण्ड) म0प्र0
16. वही पृ0 46 कवि विजय सिंह पाल।
17. वही पृ0 46 कवि विजय सिंह पाल।

डी0एम0 242, दीनदयाल नगर,
ग्वालियर 474005 म0प्र0

धरोहर / ईसुरी की फागें



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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धरोहर
ईसुरी की फागें
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धरोहर / ईसुरी की फागें
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आऔ को अमरौती खाकें, ई दुनियाँ में आकें।
नंगे गैल पकर गये, धर गये, का करतूत कमाकें।
जर गये, बर गये, धुन्ध लकरियन, धर गये लोग जराकें।
बार बार नईं जनमत ‘ईसुर’, कूख आपनी माँकें।। 1

आगये दिन मरबे के नीरे, चलन जात जे जी रे।
अब बा देह अगन नईं रै गई, हाँत पाँव सब सीरे।
डारन लगे रात हैं नइयाँ, पत्र होत जब पीरे।
जितनी फाग बनावें ‘ईसुर’, गावें पण्डा धीरे।। 2

अपनी बोल समारौ बानी, कौन बड़ी जिन्दगानी।
जेई बानी हौदै बैठारै, जेई चढ़ावै पानी।
जेई बानी रथ पै बैठारै, जेई नरक की खानी।
कहत ‘ईसुरी’ सुन लो भई, जेई जगत्तर जानी।। 3

ऐसो होत नहीं यारी में, दगा दोसदारी में।
चंदन काट बमूर लगाये, केसर की क्यारी में।
चन्दा ऊपर गान परत है, देख लेत थारी में।
‘ईसुर’ कहत निबानै परहै, नई उमर बारी में।। 4

कौ है प्रीत निबाबे बारो, सो मैं एक बिचारो।
मित्र को ऐसे मिलबो चइये, ज्यों कुंजी उर तारो।
जैसें क्षीर में नीर मिलादो, होत कभऊँ न न्यारो।
‘ईसुर’ राम भजन बिन जैसें, होत नहीं निस्तारो।। 5

चौपर है राजन के लानें, जिनै जागीरी खानें।
बड़े भोर सें बिछौ गलीचा, ठान ओई की ठानें।
निस दिन तान लगी चौपर की, मरे जात भैरानें।
कात ‘ईसुरी’ जुर कें बैठे, लवरा कैई सयाने।। 6

जबसें छुई रजऊ की बइयाँ, चैन परत है नइँयाँ।
सूरज जोत परत बेंदी पै, भर भर देत तरइयाँ।
कग्ग सगुन भये मगरे पै, छैला सोऊ अबइयाँ।
कहत ‘ईसुरी’ सुनलो प्यारी, ज्यो पिंजरा की टुइयाँ।। 7

जग में जौलों, राम जिवावै, जे बातें बरकावै।
हाथ पाँव दृग दांत बतीसऊ, सदा ओई तन रावै।
रिन ग्रही ना बनै काऊकौ, ना घर बनों मिटावै।
इतनी बातें रहें ‘ईसुरी’, कुलै दाग ना आवै।। 8

जिदना रजऊ पैरतीं गानो, जिअरा होत बिरानो।
बेंदा बीज दावनी दुर को, पान झलरया कानों।
सरमाला लल्लरी बिचौली, मोरैं हरा सुहानो।
पाँवपोस पैजनियाँ पोरा, ‘ईसुरी’ कौन बखानो।। 9

जो कोउ जोग में भोग जमावै, सो गुनबान कहावै।
सुन्न सिखर सें ऊपर जाकें, आसन अचल जमावै।
धरती में ना आसमान में, अमर मड़ैया छावै।
‘ईसुर’ कात कुटुम अपने सें, आवा गमन मिटावै।। 10

नईयाँ रजऊ तुमारी सानी सब दुनियाँ हम छानी।
सिंघल दीप छान लओ घर-घर, ना पदमिनी दिखानी।
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन, खोज लई रजधानी।
रूपवंत जो तिरियाँ जग में, ते भर सकतीं पानी।
बड़ भागी हैं ओई ‘ईसुरी’ तिनकी तुम ठकुरानी।। 11

हो गई रजऊ बिदा की बेरा, रहे दिना दस तेरा।
तुमरे लानैं करत रहत तें, दिन में दस दस फेरा।
नित नये खेल होत ते जाँ पर, लै गई बिपत बसेरा।
‘ईसुर’ अपँय पिया के संगै, हो जैंहों नौ-तेरा।। 12

मधुकर होत न प्रीत पुरानी, उत्तम मन की जानी।
पथरी आग तजत है नईंयाँ रहै जुगन भर पानी।
जैसें फूल गुलाब पखुरिया, सूकैं अधिक बसानी।
‘ईसुर’ कहत प्रीत उत्तम की, निबहत भर जिंदगानी।। 13

नैना इनके जगत उजारे, हमें देखतन मारे।
भस्मी चढ़ा बनाकें बाबा, लाखन दये किनारे।
धर धर कें काजर की कोरें, ठाँड़े मानुस फारे।
मानुस की की चली ‘ईसुरी’ भये पाखान दरारे।। 14

लोकसंस्कृति और लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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सम्पादकीय
बात दिल की


लोकसंस्कृति और लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य
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किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने लगता है।
बुन्देली संस्कृति के सामने, इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, भाषा-बोली के सामने अपने अस्तित्व का संकट लगातार खड़ा हो रहा है। किसी समय में अपनी आन-बान-शान का प्रतीक रहा बुन्देलखण्ड वर्तमान में गरीबी, बदहाली, पिछड़ेपन के लिए जाना जा रहा है। विद्रूपता यह है कि इसके बाद भी बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने वालों की कमी नहीं है। सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न, स्वाभिमान से ओत-प्रोत, शैक्षणिक क्षेत्र में सफलता के प्रतिमान स्थापित करने वाले इस क्षेत्र की विरासत को पूरी तरह से नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। विचार करना होगा कि इस क्षेत्र में पर्याप्त नदियाँ हैं; वैविध्यपूर्ण उपजाऊ मृदा है; प्रचुर मात्रा में खनिज सम्पदा है; वनाच्छादित हरे-भरे क्षेत्र हैं फिर भी इस क्षेत्र को विकास के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का मुँह ताकना पड़ता है।
संसाधनों की पर्याप्तता के बाद भी क्षेत्र का विकास न होना यदि सरकारों की अरुचि को दर्शाता है तो साथ ही साथ यहां के जनमानस में भी जागरूकता की कमी को प्रदर्शित करता है। किसी भी क्षेत्र, समाज, राज्य, देश के विकास में किसी भी व्यक्ति का योगदान उसी तरह से महत्वपूर्ण होता है जैसे कि उस व्यक्ति का अपने परिवार के विकास में योगदान रहता है। परिवार के विकास के प्रति अरुचि होने से विकासयात्रा बाधित होती है, कुछ ऐसा ही बुन्देलखण्ड के साथ हो रहा है। यहां के निवासी उन्नत अवसरों की तलाश में यहाँ से पलायन कर रहे हैं। युवा पीढ़ी अपने आपको किसी भी रूप में इस क्षेत्र में स्थापित नहीं करना चाहती है। इस कारण से इधर के शैक्षणिक संसाधन, औद्योगिक क्षेत्र, खेत-खलिहान, गाँव आदि बदहाली की मार को सह रहे हैं।
बुन्देलखण्ड के कुछ जोशीले, उत्साही नौजवानों और अनुभवी बुजुर्गों के प्रयासों, प्रदर्शनों, संघर्षों, माँगों आदि के द्वारा बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण हेतु कार्य किया जा रहा है। इस प्रयास के चलते और बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने की मंशा से सरकार ‘पैकेज’ आदि के द्वारा आर्थिक सहायता का झिझकता भरा कदम उठाने लगती हैं। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विरासत को देखते हुए इस तरह के प्रयास खुशी नहीं वरन् क्षोभ पैदा करते हैं। यह सब कहीं न कहीं इस क्षेत्र के जनमानस का अपने क्षेत्र के प्रति स्नेह, अपनत्व, जागरूकता में कमी के कारण ही होता है।
जागरूकता में कमी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर बहुत अधिक है जो नितान्त चिन्ता का विषय होना चाहिए। युवा पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिकता, ऐतिहासिकता से किसी प्रकार का कोई सरोकार नहीं दिखाई देता है। उसे क्षेत्र के लोकसाहित्य, लोककला, लोकगाथा, लोककथा, लोकविश्वास, लोकपर्व आदि के साथ ही साथ इस क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में भी पता करने की आवश्यकता नहीं। किसी क्षेत्र का स्वर्णिम अतीत उसके उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बनता है किन्तु वर्तमान पीढ़ी कोे अतीत को जानने की न तो चाह है और न ही वह इसके भविष्य को उज्ज्वल बनाने को प्रयासरत् है। यहां की बोली-भाषा को अपनाना-बोलना उसे गँवारू और पिछड़ेपन का द्योतक लगता है। इस दोष के शिकार युवा हैं तो बुजुर्गवार भी कम दोषी नहीं हैं जो अपने गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण नहीं कर रहे हैं।
हमें समझना होगा कि संस्कृति का, विरासत का हस्तांतरण किसी भी रूप में सत्ता का, वर्चस्व का हस्तांतरण नहीं होता है। इस प्रकार का हस्तांतरण क्षेत्र की सांस्कृतिकता का, सामाजिकता का विकास ही करता है। यह ध्यान हम सभी को रखना होगा कि संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन मनुष्य पशु समान होता है और बुन्देलखण्ड को हम संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन, बोलीविहीन करके उसकी गौरवगाथा को मिटाते जा रहे हैं। यदि इस दिशा में शीघ्र ही प्रयास न किये गये; वर्तमान पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत से, भाषाई-बोली की मधुरता से परिचित न करवाया गया तो बुन्देलखण्ड को एक शब्द के रूप में केवल शब्दकोश में देख पायेंगे। इसके अलावा हम बुन्देलखण्ड के लोक से सम्बन्धित विविध पक्षों को भी सदा-सदा को विलुप्त कर चुके होंगे। स्थिति बद से बदतर हो इसके पूर्व ही हम सभी को सँभलना होगा, इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करना होगा।
स्पंदन के अंक ‘बुन्देलखण्ड विशेष’ के द्वारा लोकसंस्कृति के कुछ पहलुओं को आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि अंक आपको पसंद आयेगा और आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा।

Thursday, September 17, 2009

अंक-9 नवम्बर 08-फरवरी 09 -- बुन्देलखण्ड विशेष


अंक-9 नवम्बर 08-फरवरी 09 -- बुन्देलखण्ड विशेष
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बात दिल की
भाषाई विकास का भी सोचिए!!

स्वतंत्रता आन्दोलन में बुन्देलखण्ड का योगदान


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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डा0 वीरेन्द्र सिंह यादव


भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की चर्चा विश्व के सबसे बड़े आन्दोलनों में होती है क्योंकि इस आन्दोलन ने अलग-अलग विचारधाराओं और विभिन्न वर्गों के लाखों-लाख लोगों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से सक्रिय किया। इस स्वतंत्रता आन्दोलन की सबसे बड़ी ऐतिहासिक विशेषता यह थी कि इसे बिना किसी क्रांति के नैतिक, राजनीतिक साथ ही विचारधारात्मक तीनों ही स्तरों पर लम्बे जनसंघर्ष के द्वारा चलाया गया। हालाँकि इतिहासकारों के बीच यह बहस का मुद्दा रहा कि यह विद्रोह एक सिपाही बगावत था, राष्ट्रीय आन्दोलन था या सामंती प्रतिक्रिया का प्रस्फुटन मात्र? क्या भारतीय असंतोष को कम करके आंकने के लिये यह अंग्रेज इतिहासकारों की एक साजिश थी?
कारण कुछ भी हों परन्तु इतना तो कहा जा सकता है कि सन् 1857 ई. का विद्रोह उन विभिन्न असंतोषों का परिणाम था जिनसे भारतीय वर्षों से घुटन अनुभव कर रहे थे। सन् 1757 ई. से सन् 1857 ई. के सौ वर्षों में अंग्रेज कम्पनी भारत के विभिन्न क्षेत्रों को अपने राज्य में मिलाती जा रही थी। कम्पनी की भारत में इस गतिविधि से उसके राज्य का तेजी से विस्तार हुआ। फलतः शासन प्रणाली में मूलभूत परिवर्तन हुये। इसके संचित प्रभाव से भारत में सभी वर्गों, रियासतों के राजाओं, सैनिकों, जमींदारों, कृषकों, व्यापारियों, ब्राह्मणों तथा मौलवियों (केवल शहरी पाश्चात्य शिक्षा प्राप्त वर्ग जो अपनी जीविका के लिये कम्पनी पर निर्भर थे) सभी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अंग्रेजों के इन तरीकों ने भारतीय जीवन की शांत धाराओं को आंदोलित होने को विवश कर दिया, जिससे देश के विभिन्न भागों में हलचल पैदा होने लगी। कुलीन और जन-साधारण दोनों ही वर्गों में बढ़ता असंतोष और आशंका ही छोटे-छोटे विद्रोह के रूप में (सन् 1857 ई. के विद्रोह से पहले) वैल्लोर में सन् 1806 ई. में, सन् 1816 ई. में बरेली, सन् 1824 ई. में बैरकपुर, सन् 1831-32 ई. में कोल विप्लव तथा छोटा नागपुर और पलामू में अन्य छोटे विद्रोह, मुस्लिम आन्दोलन जैसे फेराजी उपद्रव-सन् 1831 ई. में बरासत (बंगाल) में सैयद अहमद और उनके शिष्य मीर नासिर अली या टीटो मीर के नेतृत्व में, सन् 1842 ई. में 34वीं रेजिमेंट का विद्रोह, सन् 1849 ई. में फरीदपुर (बंगाल) में दीदू मीर के पथ प्रदर्शन में (सन् 1849 ई, सन् 1851ई., सन् 1852 ई. और सन् 1855 ई. में मोपला विप्लव तथा सन् 1855-1857 ई. का संथाल विद्रोह)। सन् 1849 ई. में सातवीं बंगाल कैवेलरी और 64वीं रेजीमेंट और 22वीं एन.आई. का विद्रोह, सन् 1850 ई. में 66वीं एन.आई. का विद्रोह और सन् 1852 ई. में 38वीं एन.आई. का विद्रोह इत्यादि। इन विद्रोहों के पीछे अनेक राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, प्रशासनिक, सैनिक कारण हो सकते हैं परन्तु इसमें कोई दो राय नहीं कि ये सभी अंग्रेजी शासन की नीतियों के विरूद्ध जनता के दिलों में संचित असन्तोष एवं विदेशी सत्ता के प्रति घृणा का परिणाम था। इस सामान्य विक्षोभ की धीरे-धीरे सुलगती आग सन् 1857 ई. में धधक उठी जिसने अंग्रेजी साम्राज्य की मजबूत बुनियाद की जड़ों को झकझोर (हिला) दिया। सन् 1857 ई. के इस विद्रोह को अंग्रेजी साम्राज्यवादी विचारधारा से प्रभावित इतिहासकारों ने सामंती असंतोष की अभिव्यक्ति मात्र कहा है परन्तु वास्तव में प्रशासनिक, आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में अंग्रेजों की नीतियों ने जो अस्तव्यस्तता एवं असंतोष की भावना ला दी उसकी ही अभिव्यक्ति सामंत सेना और जनता के माध्यम से सन् 1857 ई. की क्रांति, विप्लव या महान विद्रोह या प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में हुई।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की इस चिंगारी ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रगति को बढ़ावा दिया। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन की कहानी भारतीयों द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति के संग्राम का इतिहास है। यह ब्रिटिश सत्ता की गुलामी से मुक्ति पाने के लिये भारतीयों द्वारा संचालित आन्दोलन था। सन् 1857 ई. में ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध भारतीयों द्वारा पहली बार संगठित एवं हथियार बंद लड़ाई ने राष्ट्रीय आन्दोलन के इतिहास में संघर्ष, समझ एवं एकता के बीज बोये। यद्यपि यह विप्लव असफल रहा, परन्तु इसने प्राचीन और सामंतवादी परम्पराओं को तोड़ने में पर्याप्त सहायता पहुँचायी तथा इसके बाद ही भारत आधुनिक स्वतंत्रता संघर्ष आन्दोलन के नये युग में प्रवेश कर सका।
देशव्यापी इस क्रांति का प्रभाव बुन्देलखण्ड की माटी पर भी पड़ा। बुन्देलों की इस वीर बसुन्धरा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महती भूमिका अदा की है क्योंकि वर्तमान में बुन्देलखण्ड के नाम से प्रसिद्ध क्षेत्र का इतिहास अत्यन्त प्राचीन एवं गौरवशाली रहा है। यह भारत के हृदय प्रदेश के रूप में सुविख्यात अपनी स्वतंत्र चेतना के लिये महत्वपूर्ण माना जाता है। बुन्देलखण्ड को चेदि, मध्यप्रदेश, जैजाक-भुक्ति, आटविक, दशार्ण आदि प्राचीन नामों से भी संबोधित किया जाता है। इतिहासकार जयचंद विद्यालंकार ने विन्ध्याचल पर्वत श्रेणी में विस्तृत क्षेत्र को बुन्देलखण्ड के नाम से सम्बोधित किया है। वहीं दूसरी ओर बुन्देलखण्ड की भौतिक शोधों के आधार पर निम्न सीमा निर्धारित की गई है-‘वह क्षेत्र जो उत्तर में यमुना, दक्षिण में विन्ध्य, प्लैटों की श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में चम्बल और दक्षिण-पूर्व में पन्ना व अजयगढ़ श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुन्देलखण्ड के नाम से जाना जाता है।
बुन्देलखण्ड का यह भूखण्ड अपनी अदम्य प्रेरणाओं और स्वतंत्र प्रवृत्तियों के लिये प्राचीन काल से ही विशिष्ट है। मध्यकाल में महाराज छत्रसाल बुन्देला ने इस क्षेत्र के सुयश को आगे बढ़ाया। जिससे इसे बुन्देलखण्ड नाम दिया। चंदेलों और बुंदेलों की संतानों का शौर्य सन् 1857 ई. के स्वतंत्रता संग्राम आन्दोलन में पराक्रम एवं स्वतंत्रता की कामना ज्वलंत रूप से सामने आयी जब झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, नानासाहब और तात्या टोपे के सुयोग्य नेतृत्व में अंग्रेजों से युद्ध करते हुये भारतीय इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय जोड़ा था।
भारत में राष्ट्रीय चेतना पूर्णरूप से सन् 1857 ई. तथा सन् 1921 ई. की अवधि के दौरान पुष्पित हुई और परवर्ती कालीन स्वतंत्रता आन्दोलन जिसे हम राष्ट्रीय आन्दोलन की संज्ञा देते हैं जो सन् 1885 ई. में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के जन्म के साथ ही सुगठित रूप में सामने आया। जिसके नेतृत्व में भारतवासियों ने विदेशी शासन से स्वतंत्रता के लिये लम्बा और ऐतिहासिक संघर्ष किया। इस कालावधि के संघर्ष में बुन्देलखण्ड सक्रिय रूप से भाग ले रहा था। सन् 1905 ई. में बंग भंग के विरुद्ध आन्दोलन में बुन्देलखण्ड ने अपनी जुझारू प्रवृत्ति का परिचय दिया। सन् 1905 ई. से 1911-12 तक और सन् 1921 ई. से सन् 1930-31 ई. तक के आन्दोलनों में क्रान्तिकारी आन्दोलन के स्वर ही अधिक मुखर हुये। जिनमें से पहले में तो कम परन्तु द्वितीय चरण में चन्द्रशेखर आजाद और भगवानदास माहौर जैसे क्रांन्तिकारियों के नेतृत्व में बुन्देलखण्ड ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। बुन्देलखण्ड की इस प्रकृति और प्रवृत्ति की धारा में सन् 1921 ई. के असहयोग आन्दोलन के आह्वान पर अनेक वीर युवक सामने आये। सन् 1928 ई. में साइमन कमीशन के विरोध में और सन् 1930 ई. के सत्याग्रह आन्दोलन में भारी संख्या में बुन्देलखण्ड के शिक्षित युवकों ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी। सन् 1931 ई. से सन् 1940 ई. के मध्य महात्मा गाँधी और पं. जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में बुन्देलखण्ड ने आजादी की राजनीतिक लड़ाई में बड़े उत्साह से भाग लिया, जेल यात्रायें की और पुलिस का दमन सहा। सन् 1942 ई. में भारत छोड़ो आन्दोलन में बुन्देलखण्ड की साधारण जनता ने भी गाँधी जी के आह्वान पर शासन से अहसयोग किया।
राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के महान नेताओं को उनके त्याग एवं बलिदान के लिये आज भी हम याद करते हैं किन्तु वे स्थानीय और आंचलिक नेता, जो स्वतंत्रता आन्दोलन की भागीदारी में राष्ट्रीय नेताओं के सहयोगी रहे एवं उनसे किसी भी स्तर (अर्थ) पर पीछे नहीं रहे, उनके योगदान का आज तक कोई उचित मूल्यांकन करने का प्रयास नहीं किया गया है। जब हम बुन्देलखण्ड के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो यह स्वतः ही स्पष्ट हो जाता है कि अपने अनूठे शौर्य और स्वातन्त्रय प्रेम के कारण विदेशियों के विरुद्ध या राष्ट्रीय आन्दोलन में बुन्देलखण्ड सदैव से ही अग्रणी रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राष्ट्रीय आन्दोलन में बुन्देलखण्ड के योगदान का अद्यतन न तो उचित मूल्यांकन किया गया है और न ही देश की प्रगति में इस क्षेत्र को बराबरी का भागीदारी बनाने की दिशा में कोई प्रयास किया गया। इसके अतिरिक्त बहुत से महत्वपूर्ण तथ्य जिनके मौखिक और अभिलेखीय साक्ष्य अभी उपलब्ध हैं जो लेखबद्ध नहीं किये गये हैं? बुन्देलखण्ड के आन्दोलन एवं स्वतन्त्रता के इतिहास की उसकी प्रकृति, प्रवृत्ति और उसकी गौरवमयी परम्परा का आंकलन करते हुये इस क्षेत्र को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन तथा क्रांतिकारी संगठनों का सम्यक् लेखा-जोखा अभी शोध के क्षेत्र में नहीं हुआ है। स्वतंत्रता आन्दोलन के उन अगणित शूरवीरों को समय के अन्धकार के गर्त से निकालकर प्रकाश में लाना आज की महती आवश्यकता है।

सम्पादक कृतिका एवम वरिष्ठ प्रवक्ता,
हिन्दी विभाग, डी.वी.कालेज, उरई(जालौन)
पिन-285001 उ0प्र0

बुन्देली हाइकु - राजीव नामदेव


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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बुन्देली हायकू
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राजीव नामदेव ’राना लिधौरी’


बुन्देली बानी,
सुनतन लगे हैं।
एनई नौनी।।
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नेता पैला तो,
हाथ पाँव जोरत।
फिर तोरत।।
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पुरा परोस,
हिलमिल रइयो।
गम्म खइयों।।
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रोजइ लगै,
न खटपट नोनी।
सास-बहू की।।
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गुटका खाकै,
बिगरी जा मुइयां।
बनी टुइयां।।

शिवनगर कालोनी,
टीकमगढ़ (म0प्र0)