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Thursday, February 17, 2011

काव्य को कठिनता से मुक्ति चाहिए -- सम्पादकीय



जुलाई-अक्टूबर 10 ---------- वर्ष-5 अंक-2
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बात दिल की
काव्य को कठिनता से मुक्ति चाहिए

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स्पंदन ने अपने विगत चार वर्षों की यात्रा में कई विशेषांकों का प्रकाशन किया है। सम्पादक मण्डल का विचार यह रहता है कि पाठकों को विशेषांक के रूप में कुछ विशेष जानकारी-सामग्री उपलब्ध करवाई जाये। विशेषांकों की इस कड़ी में विचार इस बात के लिए भी बना कि स्पंदन का कोई एक अंक कविता-ग़ज़ल विशेषांक के रूप में भी प्रकाशित किया जाये। आपसी बातचीत और योजना का रूप देकर स्पंदन के वर्तमान अंक को कविता-ग़ज़ल विशेषांक के रूप में प्रकाशित करने पर सहमति बन पाई।
कार्य-योजना बनते ही उस पर कार्य करना शुरू भी हो गया किन्तु एक डर भीतर ही भीतर बना रहा कि क्या पाठक वर्ग स्पंदन के इस अंक को सहजता और स्नेह के साथ स्वीकार करेगा? इस भय का कारण यह था कि इधर साहित्य के क्षेत्र में पाठक वर्ग नित नयी पाठ्य-सामग्री की और नये विमर्श की चाह रखने लगा है। इधर यह भी देखने में आया है कि एक वर्ग-विशेष साहित्य पर कब्जा सा करने की फिराक में है और इनका काम भी सिर्फ और सिर्फ पाठकों को विमर्श के नाम पर दिग्भ्रमित करना है।
इस भय के कारण कार्य को मूर्त रूप देने के साथ-साथ सुधी एवं विज्ञ पाठकों से इस सम्बन्ध में लगातार राय भी ली जाती रही। आप सभी के मिलते प्रोत्साहन और सुझावों के कारण स्पंदन के कविता-ग़ज़ल विशेषांक को आपके सामने इस रूप में लाने का साहस जुटा सके। पाठकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया से यह भी ज्ञात हुआ कि अभी भी आम पाठक वर्ग में काव्य के प्रति मोह भंग की स्थिति पैदा नहीं हुई है। आम जनमानस स्वयं को अभी भी काव्य से अपने आपको जोड़े रखना चाहता है।
काव्य के प्रति मानव का यह लगाव कोई आज का नहीं वरन् सदियों पुराना है। मानव सभ्यता में हावभाव, मुद्राओं की कमी के कारण जब अक्षरों का, शब्दों का जन्म हुआ होगा तो मनुष्य ने काव्य रूप में ही अपनी विचाराभिव्यक्ति की होगी। इसको भी इस रूप में आसानी से समझा जा सकता है कि मनुष्य ने अपने प्रारम्भिक साहित्य की रचना काव्य-रूप में ही की है। पद्य के कई चरण के विकास के बाद साहित्य में गद्य का विकास देखने को मिलता है। काव्य का स्वरूप आम आदमी के जीवन में भी हम घुलामिला देखते हैं। उसने अपने जीवन के प्रत्येक पल को काव्य की मधुरता के साथ जिया है।
हम अपने आसपास आसानी से देखते हैं कि मानव-जीवन का कोई भी कार्य हो उसमें काव्य का समावेश आसानी से हो जाता है। श्रम सम्बन्धी कार्य हों अथवा घर के मांगलिक कार्य, ऋतुओं का स्वागत हो अथवा किसी नये जीवन के आगमन की खुशी सभी में गीतों का, काव्य का मधुर स्वर सुनाई देता है। व्यक्ति के जीवन में काव्य का समावेश उसको ताजगी और स्फूर्ति प्रदान करता है।
काव्य के प्रति मानव की रुचि और उसको अपने जीवन में समाहित करने की भावना के साथ-साथ काव्य-रूप को अपने प्रत्येक कार्य में स्वीकार्य करने की स्थिति ने काव्य को पवित्रता प्रदान की है। अपने आरम्भिक दौर से वर्तमान तक कविता को विभिन्न वादों से होकर गुजरना पड़ा है। कविता की, ग़ज़ल की अपनी यात्रा में उसने कभी कठिनता का तो कभी सरलता का दौर देखा है। इस दौर में कविता में कई तरह के प्रयोगों को भी अपनाया गया। इससे कविता से काव्यत्व गायब सा होता दिखा। छन्दमुक्त की अवधारणा के विकास होने से इसके भीतर से लय की, मधुरता की आत्मा मरती सी दिखी। इसने कविता को आम आदमी से दूर ही किया है।
पद्य रूप का गद्य के रूप में लगातार स्वीकार होते जाना कविता की मूल भावना को नष्ट करने लगा। नयी कविता के नाम पर लगातार तमाम सारे कवियों का जन्म हो गया। इसके उलट ग़ज़ल ने अपने स्वरूप को विकृत नहीं होने दिया बल्कि दुष्यंत कुमार जैसे ग़ज़लकारों ने हिन्दी भाषा में ग़ज़ल का उत्कृष्ट स्वरूप निर्मित किया। छन्दमुक्त कविता, अतुकान्त कविता के नाम पर की जा रही कवितागीरी को आम जनमानस ने सिरे से नकार दिया। इस तरह की कविता की रचना को केवल पुस्तकालयों और प्रकाशकों के मध्य तक सीमित कर दिया है और इसी तरह की कविता ने पुरस्कारों के प्रति एक अंधी दौड़ को जन्म दिया है।
छन्द की, तुक की, लय की बाध्यता का भले ही एक तरह से अस्वीकार कर दिया गया हो किन्तु यह भी याद रखना होगा कि तुलसीदास की रामचरितमानस अपने सरल गेय-रूप के कारण ही जनमानस के मध्य आज भी लोकप्रिय है। कबीर, तुलसी के दोहे, ईसुरी की फागें अपने काव्यत्व और सरलतम रूप के कारण ही आज भी हर छोटे-बड़े को कंठस्थ हैं। नयी कविता के नाम पर एक प्रकार की छद्म आन्दोलन सा खड़ा करने वाले बतायें कि वर्तमान में जो कविता का स्वरूप रचा जा रहा है उसमें से कितना और कौन सा स्वरूप जनमानस के बीच ग्राहय है?
कविता को, ग़ज़ल को उसी रूप में रचा जाना चाहिए जो आम आदमी को उससे जोड़े रखे। सिर्फ लेखक की आत्म-तुष्टि के लिए कविता-ग़ज़ल का रचा जाना उसके साहित्य में वृद्धि तो कर सकता है किन्तु मानव मात्र के मध्य सहज स्वीकार्य नहीं बना सकता है। कविता को, ग़ज़ल को पहले की तरह सरलतम और सहज रूप में ही रचा जाना उसे व्यक्तियों के, पाठकों के नजदीक ले जायेगा अन्यथा की स्थिति में कविता-ग़ज़ल को हम सिर्फ पुस्तकालयों के भीतर सजी पुस्तकों में ही सुरक्षित पायेंगे, आम आदमी-पाठक वर्ग इससे कहीं बहुत दूर होगा। कविता-ग़ज़ल विशेषांक इसी आशा के साथ आपके हाथों में प्रदान करने की कोशिश की जा रही है कि कविता-ग़ज़ल से दूर होते पाठकों-प्रशंसकों को इस ओर पुनः आकृष्ट किया जा सके। शेष तो पाठकों की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट होगा--

Thursday, July 15, 2010

लोकसंस्कृति और लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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सम्पादकीय
बात दिल की


लोकसंस्कृति और लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य
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किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने लगता है।
बुन्देली संस्कृति के सामने, इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, भाषा-बोली के सामने अपने अस्तित्व का संकट लगातार खड़ा हो रहा है। किसी समय में अपनी आन-बान-शान का प्रतीक रहा बुन्देलखण्ड वर्तमान में गरीबी, बदहाली, पिछड़ेपन के लिए जाना जा रहा है। विद्रूपता यह है कि इसके बाद भी बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने वालों की कमी नहीं है। सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न, स्वाभिमान से ओत-प्रोत, शैक्षणिक क्षेत्र में सफलता के प्रतिमान स्थापित करने वाले इस क्षेत्र की विरासत को पूरी तरह से नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। विचार करना होगा कि इस क्षेत्र में पर्याप्त नदियाँ हैं; वैविध्यपूर्ण उपजाऊ मृदा है; प्रचुर मात्रा में खनिज सम्पदा है; वनाच्छादित हरे-भरे क्षेत्र हैं फिर भी इस क्षेत्र को विकास के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का मुँह ताकना पड़ता है।
संसाधनों की पर्याप्तता के बाद भी क्षेत्र का विकास न होना यदि सरकारों की अरुचि को दर्शाता है तो साथ ही साथ यहां के जनमानस में भी जागरूकता की कमी को प्रदर्शित करता है। किसी भी क्षेत्र, समाज, राज्य, देश के विकास में किसी भी व्यक्ति का योगदान उसी तरह से महत्वपूर्ण होता है जैसे कि उस व्यक्ति का अपने परिवार के विकास में योगदान रहता है। परिवार के विकास के प्रति अरुचि होने से विकासयात्रा बाधित होती है, कुछ ऐसा ही बुन्देलखण्ड के साथ हो रहा है। यहां के निवासी उन्नत अवसरों की तलाश में यहाँ से पलायन कर रहे हैं। युवा पीढ़ी अपने आपको किसी भी रूप में इस क्षेत्र में स्थापित नहीं करना चाहती है। इस कारण से इधर के शैक्षणिक संसाधन, औद्योगिक क्षेत्र, खेत-खलिहान, गाँव आदि बदहाली की मार को सह रहे हैं।
बुन्देलखण्ड के कुछ जोशीले, उत्साही नौजवानों और अनुभवी बुजुर्गों के प्रयासों, प्रदर्शनों, संघर्षों, माँगों आदि के द्वारा बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण हेतु कार्य किया जा रहा है। इस प्रयास के चलते और बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने की मंशा से सरकार ‘पैकेज’ आदि के द्वारा आर्थिक सहायता का झिझकता भरा कदम उठाने लगती हैं। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विरासत को देखते हुए इस तरह के प्रयास खुशी नहीं वरन् क्षोभ पैदा करते हैं। यह सब कहीं न कहीं इस क्षेत्र के जनमानस का अपने क्षेत्र के प्रति स्नेह, अपनत्व, जागरूकता में कमी के कारण ही होता है।
जागरूकता में कमी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर बहुत अधिक है जो नितान्त चिन्ता का विषय होना चाहिए। युवा पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिकता, ऐतिहासिकता से किसी प्रकार का कोई सरोकार नहीं दिखाई देता है। उसे क्षेत्र के लोकसाहित्य, लोककला, लोकगाथा, लोककथा, लोकविश्वास, लोकपर्व आदि के साथ ही साथ इस क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में भी पता करने की आवश्यकता नहीं। किसी क्षेत्र का स्वर्णिम अतीत उसके उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बनता है किन्तु वर्तमान पीढ़ी कोे अतीत को जानने की न तो चाह है और न ही वह इसके भविष्य को उज्ज्वल बनाने को प्रयासरत् है। यहां की बोली-भाषा को अपनाना-बोलना उसे गँवारू और पिछड़ेपन का द्योतक लगता है। इस दोष के शिकार युवा हैं तो बुजुर्गवार भी कम दोषी नहीं हैं जो अपने गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण नहीं कर रहे हैं।
हमें समझना होगा कि संस्कृति का, विरासत का हस्तांतरण किसी भी रूप में सत्ता का, वर्चस्व का हस्तांतरण नहीं होता है। इस प्रकार का हस्तांतरण क्षेत्र की सांस्कृतिकता का, सामाजिकता का विकास ही करता है। यह ध्यान हम सभी को रखना होगा कि संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन मनुष्य पशु समान होता है और बुन्देलखण्ड को हम संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन, बोलीविहीन करके उसकी गौरवगाथा को मिटाते जा रहे हैं। यदि इस दिशा में शीघ्र ही प्रयास न किये गये; वर्तमान पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत से, भाषाई-बोली की मधुरता से परिचित न करवाया गया तो बुन्देलखण्ड को एक शब्द के रूप में केवल शब्दकोश में देख पायेंगे। इसके अलावा हम बुन्देलखण्ड के लोक से सम्बन्धित विविध पक्षों को भी सदा-सदा को विलुप्त कर चुके होंगे। स्थिति बद से बदतर हो इसके पूर्व ही हम सभी को सँभलना होगा, इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करना होगा।
स्पंदन के अंक ‘बुन्देलखण्ड विशेष’ के द्वारा लोकसंस्कृति के कुछ पहलुओं को आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि अंक आपको पसंद आयेगा और आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा।

Thursday, September 17, 2009

भाषाई विकास का भी सोचिए!!


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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सम्पादकीय - बात दिल की

किसी भी पत्रिका के लिए ‘सम्पादकीय’ एक अनिवार्य अंग समझी जाती है। सम्पादकीय अपने आप में सम्पूर्ण पत्रिका का स्वरूप निर्धारित करती है, ऐसा समझा जाता है। अनेक ऐसी पत्रिकाओं को देखा गया है जो सम्पादकीय विहीन होने के बाद भी उत्कृष्ट हैं। सम्पादकीय युक्त पत्रिकाओं में कुछ की सम्पादकीय तो प्रभावित करती है तो कुछ सम्पादकीय पत्रिका के स्वरूप से मेल नहीं खाती है। पता चलता है कि पत्रिका का स्वरूप तो साहित्यिक-सांस्कृतिक है और सम्पादकीय में राजनीति, विदेश नीति और युद्ध की चर्चा हो रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि साहित्य क्या है और सम्पादकीय किसी पत्रिका के लिए कितनी अनिवार्य है?
जहाँ तक बात अनिवार्यता की है तो हमारे लिए क्या अनिवार्य है, क्या आवश्यक है यह हम अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर निर्धारित करते हैं। पत्र-पत्रिकाओं के सुधी पाठक सम्पादकीय को पूरे मन से पढ़ते हैं, उसका विश्लेषण करते हैं। कुछ पत्रिकाओं की सम्पादकीय को लेकर अच्छी बहस तक होते देखी है। सम्पादकीय की भाषा-शैली, उसके विचार, भाव-संप्रेषणीयता को लेकर विचार-विमर्श, बहस तक हो जाती है पर भाषा-बोली के सवाल पर हम चुप साध जाते हैं।
भाषा-बोली के विकास के नाम पर, संवर्धन के नाम पर हम दूसरा रास्ता अपनाने लगते हैं। यही कारण है कि आज तक राष्ट्रभाषा हिन्दी को आवश्यक तो समझा गया किन्तु उसकी अनिवार्यता को लेकर सकल प्रयास नहीं किये गये। हिन्दी आज भी वहीं खड़ी अपनी स्वीकार्यता की बाट जोह रही है जहाँ वह स्वाधीनता के दिन थी। हिन्दी भाषा के विकास का मार्ग हमने ‘अंग्रेजी के बिना विकास सम्भव नहीं’, ‘ज्ञान का भंडार अंग्रेजी में ही छिपा है’, उत्कृष्ट पुस्तकें अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं’ जैसे कुतर्कों के सहारे अवरुद्ध कर रखा है। इस प्रकार की मानसिकता के द्वारा हम अंग्रेजी का ही पालन-पोषण कर रहे हैं और हिन्दी तिरस्कृत हो रही है।
हिन्दी भाषा के प्रति इस उदासीन रवैये ने अन्य क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों को भी सामाजिक स्वीकार्यता से वंचित कर रखा है। विशेष रूप से बुन्देली भाषा की बात करें तो स्पष्ट होता है कि आज ठेंठ बुन्देली भाषा में लिखने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। तकनीक विकास, समाज विकास और साहित्यिक विकास जैसी सकारात्मक स्थितियों के बाद भी भाषाई विकास नहीं हो पा रहा है। बुन्देली भाषा, साहित्य का इतिहास कितना समृद्ध रहा है इसे किसी भी उदाहरण द्वारा समझाने की आवश्यकता नहीं है। इस अमूल्य, समृद्ध विरासत के बाद भी आज बुन्देली भाषा में साहित्य सर्जना नगण्य रूप में हो रही है।पुरानी पीढ़ी के जो दो-चार नामचीन लेखक रह गये हैं वे काव्य रूप में ही बुन्देली भाषा का पोषण कर रहे हैं, गद्य का सर्वथा अभाव सा दिखता है। यदि नई पीढ़ी के रचनाकारों की ओर दुष्टि डालें तो वे सामाजिक उपेक्षा, व्यंग्य, उपहास के डर के चलते बुन्देली भाषा में साहित्य रचनाशीलता नहीं दिखा रहे हैं। कतिपय युवा रचनाकार बुन्देली भाषा के प्रेम में वशीभूत होने के कारण यदि साहित्य सर्जना कर भी रहे हैं तो वे समाज के सामने उसे प्रदर्शित नहीं कर रहे हैं।
क्षेत्रीय भाषा-बोली के प्रति उपेक्षा का भाव एकमात्र बुन्देली भाषा के साथ ही नहीं दिख रहा है। ऐसा समझा जाता है कि सम्भवतः यही व्यवहार तमाम क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों के साथ भी अपनाया जाता होगा? विकास की संकल्पना हम तैयार कर रहे हैं, क्षेत्रीयता की बात हम कर रहे हैं, साहित्य-संवर्धन की चर्चा हम करते हैं पर बिना भाषा-बोली के विकास के यह कैसे सम्भव है?
सुधी पाठकजन किसी पत्रिका के लिए जितना अनिवार्य सम्पादकीय को समझते हैं, उतनी ही अनिवार्यता भाषा और बोली के साथ भी रखें तो क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों का भी विकास होगा; राष्ट्रभाषा हिन्दी का भी विकास होगा। भाषाई संस्कृति-विकास के लिए स्वयं हमें जागरूक होना होगा, सचेत रहना होगा, उसकी अनिवार्यता को समझना होगा।

Monday, March 30, 2009

सार्थक प्रयास करना होगा


बात दिल की / जुलाई-अक्टूबर 08
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/सम्पादकीय


वर्तमान में साहित्यिक क्षेत्र दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श, साहित्य पुनर्लेखन, वर्तमान-भूत-भविष्य आदि की पड़ताल जैसे मुद्दों पर लगातार चर्चा कर रहा है; उपन्यास, कहानी, कविता आदि क्षेत्रों में नित नये प्रयोग किये जा रहे हैं.....और भी बहुत कुछ हो रहा है जो साहित्य के क्षेत्र में हलचल बनाये हुए है। इस सबके बाद भी बाल साहित्य में एक शून्य बिखरा हुआ है। वर्तमान में बाल साहित्य के नाम पर जो भी कार्य हो रहा है वह लगभग न के बराबर ही कहा जायेगा।
यदि बाल साहित्य के इतिहास पर नजर डालें तो ज्ञात होगा कि इस विधा में रचनात्मक कार्य भारतेन्दु युग से ही प्रारम्भ हो गया था किन्तु यह यदा-कदा रचनाओं के रूप में ही हुआ। इस कारण से उनका समीक्षात्मक अध्ययन सम्भव न हो सका। सही मायनों में देखा जाये तो सन् 1952 में ज्योत्सना द्विवेदी के प्रकाशित ग्रन्थ ‘हिन्दी किशोर साहित्य’ ने बाल एवं किशोर साहित्य को समग्र रूप से रेखांकित किया। इस ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद एकाएक बाल साहित्य पर कार्य करने वाले प्रकाश में आ गये। निरंकार देव ‘रोतक’, आनंद प्रकाश जैन, हरिकृष्ण देवसरे, सत्यकाम विद्यालंकार ने सन् 1961 से लेकर सन् 1968 के मध्य बाल साहित्य पर उत्कृष्ट कार्य किया। इसके बाद बाल पत्रिकाओं के रूप में प्रकाशित होतीं ‘शिशु’, ‘बालसखा’, ‘बालक’, ‘वानर’, खिलौना’ आदि ने बाल साहित्य को समृद्ध बनाने का कार्य किया। इनके माध्यम से बाल साहित्य की कहानियों, कविताओं एवं अन्य रचनाओं की समीक्षा सम्बन्धी कार्य भी सम्भव हुआ। सन् 1968 में हरिकृष्ण देवसरे द्वारा जबलपुर विश्वविद्यालय से बाल साहित्य पर प्रथम पी-एच0 डी0 उपाधि हासिल करने के बाद कई अन्य ख्यात साहित्यकारों द्वारा हिन्दी बाल साहित्य में शोध कार्य एवं शोध प्रबन्धों को प्रकाश में लाने से लगा कि इस क्षेत्र को शिक्षा सम्बन्धी क्षेत्र में भी स्वीकार्यता प्राप्त हो रही है।
इस तरह के स्वर्णिम दौर के बाद भी एकाएक ऐसा लगने लगा है कि बाल साहित्य समाप्त हो गया है। बच्चों को केन्द्र बिन्दु बना कर प्रकाशित हो रहीं अनेक पत्रिकाएँ काल कलवित हो गयीं। देश के प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के लिए किसी तरह का स्थान अब देखने को नहीं मिलता है (एक-दो पत्र-पत्रिकाओं को अपवाद स्वरूप छोड़कर)। यहाँ अन्य किसी भी चर्चा के यह विचारणीय होना चाहिए कि बाल साहित्य एकाएक मृतप्राय सा क्यों हो गया? वह अपनी समृद्ध विरासत को सँभाल पाने में अक्षम क्यों रहा? क्या अब बाल साहित्य का कोई भविष्य शेष नहीं रह गया है? आधुनिकता में रचे-बसे परिदृश्य में क्या बाल साहित्य अर्थहीन हो गया है? इनके अतिरिक्त और भी ऐसे प्रश्न हैं जो चुनौती के रूप में सामने खड़े हैं। समाधान क्या और कैसे हो इस पर चर्चा के पूर्व यह जानना भी आवश्यक है कि बाल साहित्य को उपयोगी बनाने हेतु क्या किया गया? बच्चों को पुस्तक पाठन हेतु क्या प्रेरित किया गया? प्रतिष्ठित समीक्षक ब्रैसी सैंडर्स का कहना है कि ‘कोई काम इतना कठिन नहीं है जितना बच्चों के लिए लिखना। बच्चों के लिए लिखने के बाद कोई काम इतना कठिन नहीं जितना बच्चों की पुस्तकों के बारे में लिखना।’ देखा जाये तो यह एक वाक्य ही सारी स्थिति को साफ करता दिखता है। बच्चों के अनुकूल लिखना हमेशा से दुःसाध्य रहा है। बच्चे रूप, रंग, गंध, स्वर, रस, स्पर्श, दृश्य आदि से किसी न किसी रूप में कुछ न कुछ सीखते रहते हैं। ऐसे में बाल साहित्य के नाम पर कुछ भी लिख देना बाल साहित्य की उपयोगिता को समाप्त करता है। शायद यही कारण रहा है कि साहित्य के दिग्गज साहित्यकारों में शामिल आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डा0 नगेन्द्र जैसे लोगों ने अपने ऐतिहासिकता प्रमाणित करते ग्रन्थों में बाल साहित्य की चर्चा भी नहीं की है।
बाल मनोविज्ञान के अनुरूप लिखने की असाधारण कल्पना-शक्ति के अभाव के अतिरिक्त बाल पाठकों का साहित्य के प्रति रुचि न लेना भी बाल साहित्य के ह्रास का एक प्रमुख कारण समझा जा सकता है। यह स्थिति वर्तमान में बाल साहित्य को क्षति पहुँचा रही है, भविष्य में सम्पूर्ण साहित्य जगत् को क्षतिग्रस्त करेगी क्योंकि आज का बालक ही कल को साहित्य का पाठक बनेगा। इसके बाद भी पूरी तरह हम लोग ही जिम्मेवार हैं जिन्होंने अपने बच्चों में साहित्य पठन-पाठन के प्रति रुचि जाग्रत नहीं की; उनका पठन-पाठन मात्र स्कूली पाठ्यक्रम को पूरा करने तक सीमित कर दिया; बन्दूकों, मशीनगनों जैसे खिलौने और हिंसात्मक वीडियो गेम के शौक का पोषण कर बच्चों को साहित्य से बहुत ही दूर कर दिया।
इसके बाद भी यदि प्रयास किये जायें तो कुछ सम्भावनायें अभी भी शेष दिखतीं हैं। बाल साहित्य के नाम पर पुस्तकों का प्रकाशन मात्र पुस्तकालयों से गणित बैठाने के लिए न हो। बाल साहित्यार्थ एक मंच का निर्माण हो जो बाल साहित्य के प्रकाशन और समीक्षा हेतु कार्य करे। प्रकाशकों को लाभ-हानि के गणित से बाहर आकर बच्चों के भविष्य हेतु बाल साहित्य के प्रकाशन में सक्रिय होना पड़ेगा। साहित्यकारों को भी इस ओर अपनी लेखनी को मोड़ना होगा पर यह विचार कर कि बच्चों के लिए कुछ भी लिख देना ही बाल साहित्य नहीं।
आने वाले कल के लिए साहित्यकारों, पाठकों की एक पौध को हम तभी पैदा कर पायेंगे जब हम इसका उत्तरदायित्व समझेंगे। बाल साहित्य के विकास से ही बाल मन में पैठ बना चुकी इलेक्ट्रानिक संसाधनों की मायावी दुनिया, हिंसा, सेक्स, विकृति को निकाल सकेंगे; बस एक प्रयास हम सबको मिल कर करना होगा।
‘स्पंदन’ की ओर से एक छोटा सा प्रयास किया जा रहा है कितना सफल रहा कितना असफल, यह आप सुधी पाठकों पर......प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा-

Wednesday, January 28, 2009

साहित्यकार हाशिए पर ?

साहित्यकार हाशिए पर ?

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‘स्पंदन’ का प्रवेशांक आपके हाथों में सुशोभित है, आशा है आगे भी पल्लवित पुष्पित होता रहेगा। साहित्यिक पत्रिकाओं की गौरवशाली, समृद्ध परम्परा के बीच कई स्थापित पत्रिकाओं के अस्तित्व को समाप्त होते देखा है; अनेक पत्रिकाओं को अस्तित्व में आते देखा है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से खड़ा होता है कि ‘साहित्य और संस्कृति की रचनाशीलता के रेखांकन’ की क्या आवश्यकता आन पड़ी, वह भी तब जबकि साहित्यिक पत्रिकाओं की व्यापक उपस्थिति है। साथ ही यह भी कि क्या ‘स्पंदन’ स्वाभाविक रूप से अपनी उपस्थिति सिद्ध कर पायेगी ? यहाँ साहित्य और संस्कृति की रचनाशीलता के रेखांकन के प्रवेशांक के माध्यम से कुछ बात दिल की रखना है -
प्रथम तो यह कि बड़े शहरों से प्रकाशित होती बड़ी-नामी पत्रिकायें नामी और स्थापित साहित्यकारों (रचनाकार नहीं) की ओर दौड़ती हैं। ऐसे में क्षेत्रीय स्तर के रचनाकार मात्र रचना करते ही रह जाते हैं और उनकी प्रतिभा एक क्षेत्र विशेष तक ही सीमित रह जाती है। यह दो टूक स्वीकारोक्ति है कि ‘स्पंदन’ के द्वारा बुन्देलखण्ड की और देश के अन्य भागों की ऐसी रचनाशील प्रतिभा को प्रकाशन का अवसर प्रदान करना है जिन्हें नामी पत्रिकायें हेय दृष्टि से देखती हैं।

दूसरे विडम्बना यह है कि देश का हर दूसरा तीसरा व्यक्ति स्वयं को साहित्यकार बताता है, परन्तु असल में साहित्यकार है कौन अभी तक यह परिभाषित (मेरी समझ से) नहीं हो सका है। कभी-कभी फिल्मी और क्रिकेट सितारों की अपार लोकप्रियता देखकर स्थापित साहित्यकारों को मानसिक कष्ट होता है कि देश में साहित्यकार हाशिए पर क्यों है ? हाल ही में स्व. श्री हरिवंश राय ‘बच्चन’ की स्मृति में लखनऊ में आयोजित काव्य-गोष्ठी में प्रख्यात व्यंग्य कवि अशोक चक्रधर जी ‘बच्चन जी’ का विशालकाय चित्र देखकर विस्मय से स्वीकारते हैं कि उन्होंने पहली बार किसी साहित्यकार का इतना बड़ा चित्र देखा हैं। क्या ‘बच्चन जी’ का विशालकाय चित्र उनके महानायक पुत्र अमिताभ की प्रतिच्छाया नहीं कही जायेगी ? इसी स्थान पर आकर स्थापित रचनाकार (साहित्यकार नहीं) सोचें कि वे लोग हाशिए पर क्यों हैं ?
नामी रचनाकारों द्वारा स्वयं को बड़ा साहित्यकार सिद्ध करना, नवोदित रचनाकारों की उपेक्षा करना, छोटी और क्षेत्रीय साहित्यिक पत्रिकाओं को रचनात्मक सहयोग न देना, नये रचनाकारों की रचनाओं को बिना पढ़े कूड़ा-करकट घोषित करना, कहीं न कहीं रचनाधर्मिता के क्षेत्र में खेमेबन्दी को जन्म देता है। एक छोटा सा फिल्मी कलाकार ग्रामीण अंचलों में भी पहचाना जाता है पर देश के वर्तमान स्थापित साहित्यकारों को बड़े शहरों के अधिसंख्यक लोग भी नहीं जानते हैं। स्थापित और नामी रचनाकारों को न जानने और न पहचानने का कारण इन रचनाकारों का क्षेत्रीय स्तर की पत्रिकाओं में लेखन से बचते रहना है। जो दो एक स्थापित रचनाकारों के नाम क्षेत्रीय स्तर की पत्रिकाओं में आते भी हैं, वे किसी न किसी की जुगाड़ के सहारे, किसी न किसी के ‘थ्रू’। ऐसे में ज्यादातर लोगों की पहुँच से दूर इन रचनाकारों के सामने पहचान का, अस्तित्व का संकट पैदा होगा ही।

तीसरे यह कि क्षेत्रीय स्तर पर जो पत्रिकायें (स्वयंभू साहित्यकारों की भाषा में लघु पत्रिकायें) अस्तित्व में आई भी हैं उन्हें अपनी क्षेत्रीयता को त्याग कर अखिल भारतीय स्तर पर खड़ा होने की घुट्टी पिलाई जाती है; अन्य पत्रिकाओं से कुछ अलग कर दिखाने का उपदेश दिया जाता है, परिणामतः उनकी दशा धोबी के कुत्ते सरीखी हो जाती है। अखिल भारतीय स्तर पर पहचान बनाने की जद्दोजहद में वे क्षेत्रीय एवं नये रचनाकारों को विस्मृत कर देती हैं और स्थापित रचनाकारों का रचनात्मक सहयोग भी प्राप्त नहीं कर पाती हैं। स्पष्ट है कि ऐसे में पत्रिका के सामने अस्तित्व को मिटाने के अतिरिक्त कोई दूसरा रास्ता नहीं होता है।
किसी भी रचनाकार अथवा पत्रिका का अस्तित्व पाठकों पर निर्भर करता है। एक रचनाकार अच्छे रचनाकार के रूप में पहचाना जाये; लोग उसे साहित्यकार समझें; उनकी रचनाओं को आत्मसात् करें; उसको ग्राम-अंचल तक भी लोग पहचानें, वही रचनाकार स्थापित है वर्ना हाशिए पर तो समस्त रचनाकार पड़े हैं। मात्र गालियों भरी रचना कर, किलष्टता का प्रयोग कर, अपने नाम के सहारे प्रकाशनों की संख्या बढ़ाकर, प्रायोजित पुरस्कार अथवा सम्मान पाकर कोई रचनाकार साहित्यकार नहीं हो जाता। उसका पाठक कहाँ है ? जन-जन के हृदयंगम हुई रचना और रचनाकार ही साहित्य और साहित्यकार है। कबीर का फक्कड़पन, सूरदास की भक्ति, मीराबाई के भजन, तुलसी की रामचरित मानस क्यों वर्षों बाद भी घर-घर में स्थान प्राप्त किये हैं, ग्रामीण जनों के भी हृदय में विराजमान है ? यदि रचनाकार यही समझ लें तो उसके भीतर छिपा साहित्यकार कभी भी हाशिए पर नहीं रहेगा; साहित्यिक पत्रिकाओं के ऊपर कभी भी अस्तित्व का संकट नहीं गहरायेगा। खैर .............. बात दिल की थी सो कह दी।
‘स्पंदन’ की कालावधि कितनी है, परिधि कितनी है यह तो पाठकों और रचनाकारों पर निर्भर है। हमारा प्रयास कर्म करना है; अपने लोगों को अपने लोगों के बीच तक पहुँचाना है। प्रख्यात हिन्दी गज़लकार दुष्यन्त कुमार के शब्दों में-
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
शेष भविष्य के गर्भ मे छिपा है। प्रतिक्रियाओं सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।

शुभकामनाओं सहित