Thursday, September 17, 2009

बुन्देली का मानकीकरण


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख
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डा0 कैलाश बिहारी द्विवेदी


बुन्देली भाषी क्षेत्र विस्तृत है। इसके विस्तार के सम्बन्ध में डा0 एम. पी. जैसवाल ने कुछ रोचक तथ्य दिये हैं-
1-बुन्देली का क्षेत्र पश्चिमी हिन्दी के लगभग आधे क्षेत्र में फैला हुआ है।
2-खड़ी बोली, ब्रज और कन्नौजी के सम्मिलित क्षेत्र के बराबर बुन्देली क्षेत्र है।
3-यूरोप के स्विटजरलैण्ड और बैलजियम के सम्मिलित क्षेत्र के बराबर बुन्देली क्षेत्र है।
बुन्देली उत्तर प्रदेश के छः जिलों -झाँसी, ललितपुर, महोबा, उरई (जालौन) हमीरपुर तथा बाँदा और मध्य प्रदेश के लगभग बाईस जिलों-टीकमगढ. छतरपुर, पन्ना, सागर, दमोह, सतना, की नागौद तहसील, जबलपुर की मुड़बारा (कटनी) तहसील छोड़कर नरसिंहपुर, मण्डला, सिवनी, रायसेन, भोपाल, होशंगाबाद, विदिशा, गुना, मुरैना, भिण्ड़, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, सीहौर जिलें का कुछ भाग तथा बालाघाट और छिन्दबाड़ा के कुछ भागों में बोली जाती हैं।
भाषाई क्षेत्रों की सीमा राजनैतिक सीमाओं की तरह बिल्कुल निश्चित तो होती नहीं है। दो भाषाओं या बोलियों के बीच एक संक्रमणशील क्ष्ेत्र होता है। इसमें दोनों बोलियों की झलक रहती है। प्रमुखतः शब्द समूह मिश्रित रहता है। उदाहरणार्थ सतना जिले की बोली को बुन्देली भाषी बघेली कहते हैं और बघेली भाषी बुन्दलहाई बघेली कहते हैं। इस कारण उपर्युक्त जिलों में से ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, गुना आदि दूसरी बोलियों से लगने वाले जिलों की बुन्देली पर निकटवर्ती बोलियों का प्रभाव है।
इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश के आगरा, इटावा और मैनपुरी जिलों में भी काफी बुन्देली भाषी हैं। ग्रियर्सन ने सन् 1891 की जनसंख्या के अनुसार इनकी संख्या 313000 लिखी थी। इसके विच्छिन्न रूप म0प्र0 के बैतूल तथा महाराष्ट्र के भण्डारा, अमरावती और चान्दा जिलों में पाये जाते हैं। ग्रियर्सन ने नागपुरी हिन्दी को भी बुन्देली के अन्तर्गत माना है।
बुन्देली की भाषिक इकाई का क्षेत्रफल लगभग 183479 वर्ग किमी0 है। सम्पूर्ण बुन्देली क्षेत्र की बोली को एक नाम न मिल पाने का मुख्य कारण है इसका बुन्देली नाम। यह नाम बुन्देला क्षत्रियों से जुड़ा है। इस कारण जो क्षेत्र बुन्देला राज्यों के बाहर थे, उन्हें अपनी बोली को बुन्देली कहने में ऐतराज रहा। इस मानसिकता के कारण इसके छोटे-छोटे क्षेत्रों की बोली के लिए मरैठी, डँगई, चैरासी की बोली, मालए की बोली, सगरयाऊ, गढ़ा की बोली, खटोला की बोली, लुदयाऊ या रठोंय (जिसको बाद मे ग्रियर्सन ने क्रमशः लुधाँती और रठौरा कहा), पवारी, भदौरी, तवरधारी, बनाफरी, लोधी, कुम्हारी, कोष्ठी, चमारी, गावली आदि जातियों या स्थानों के आधार पर नाम चलते रहे। डा0 कृष्णलाल हंश ने ऐसे बहुत सारे नामों का उल्लेख किया है परन्तु वास्तविकता यह है कि मोटे तौर पर इसके दो ही रूप हैं-एक पूर्वी दूसरी पश्चिमी। पूर्वी का क्षेत्र विस्तार पश्चिमी से लगभग दोगुना है। पूर्वी पर नव प्रवर्तन का प्रभाव कम है। जबकि दिल्ली से दक्षिण के सैनिक अभियानों का मार्ग होने तथा वहाँ की उपजाऊ धरती होने के कारण दिल्ली के शासकों की लुब्ध दृष्टि बुन्देली के पश्चिमी क्षेत्र पर सदा लगी रही। इस कारण वह बार-बार आक्रमणों का शिकार होता रहा और उनके अधीन भी रहा। अतएव दिल्ली-मेरठ के आसपास की कौरवी बोली के संघात से उसमें नव प्रवर्तन अधिक हुआ। इस क्षेत्र पर गैर बुन्देली शासन जो स्वतंत्रता पूर्व तक रहा, वह भी नव प्रवर्तन का एक कारण है।
सर्वप्रथम सन् 1894 से 1933 तक ग्रियर्सन ने जब भारतीय भाषाओं का व्यापक सर्वे कराया तब भाषाई तत्वों के आधार पर इस सम्पूर्ण क्षेत्र के उपबोलीगत रूपों में एकसूत्रता की तलाश कर उनके समग्र रूप को बुन्देली के रूप में मान्यता किया।
बोलियों के छोटे या बड़े उपबोली रूपों के विकसित होने के कारण हैं-
(1) घने जंगलों, नदियों, पहाड़ों आदि प्राकृतिक बाधाओं का होना, जिससे बोलीगत आदान-प्रदान स्वतंत्रतापूर्वक और बारम्बार नहीं हो पाता है।
(2) राजनैतिक एक सूत्रता का अभाव।
(3) समाजैतिहासिक प्रभाव आक्रमणकारियों की भाषा के संघात से बोलियों में संकरता पैदा होती है और राजनैतिक उथल-पुथल भरे अशान्त वातावरण में साहित्य सृजन न हो पाने के कारण बोलियों का मानक रूप नहीं उभर पाता है। बुन्देली के साथ ये सभी कारण जुड़े हुए हैं।
इनके प्रभाव से बुन्देली के स्वरूप में जो विविधता है, वह निम्न प्रकार हैं-
(1) बुन्देली भाषी क्षेत्र के कई अन्य बोली क्षेत्रों से घिरे होने के कारण इसका वाक्यगत बलाघात सुर लहर और अंशतः शब्द समूह प्रभावित हुआ है।
(2) हकार प्रयोग की न्यूनाधिकता पायी जाती है।
(3) रकार लोप की प्रवृत्ति और उसकी विभिन्न पद्वतियों से रकार कहीं स्वरीकृत होता है। जैसे-अटारी-अटाई, कहीं अग्रध्यनि में द्वित्व हो जाता है जैसे -करलो, कल्लो, धर दो धद्दो। रकार लोप की न्यूनाधिकता बोलने वालों के बौद्धिक स्तर पर निर्भर करती है।
(4) महाप्रणत्व की न्यूनाधिकता-जैसे बनाफरी और लुघांती के कुछ क्षेत्रों में महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति अधिक पायी जाती है। हकार बहुलता इसी का एक अंग है। बुन्देली के अन्य क्षेत्रों में, सगरयाऊ को छोड़कर अल्पप्राणीकरण की प्रवृत्ति है। दूसरी प्रवृत्ति है महाप्राणत्व के शब्दगत अपशरण की। जैसे स्तम्भ-थामों, रकम्भ-खास, वृहद्-भौत।
(5) कृषि सम्बन्धी क्षेत्रीय और अतिक्षेत्रीय शब्दों का प्रचलन पाया जाता है।
(6) सर्वनामों में कुछ अधिक भिन्नता पायी जाती है। जैसे-स्थानवाची सर्वनामों में इतै-उतै, नायँ-मायँ, ह्याँ-हाँ, हिनाँ-हुनाँ, झाँ-भाँ आदि रूप पाये जाते हैं। पुरुषवाची सर्वनामों में उत्तम पुरुष एकवचन में ‘मैं, ‘हम’ बहुवचन में ‘हम औरें’ और ‘हमन’ रूप पाये जाते हैं। मध्यम पुरुष में ‘तूँ, तें’ और तुम तथा बहुवचन में ‘तुम औरें’ और ‘तुमन’ शब्दों का प्रयोग होता है। निश्चयवाची सर्वनामों में दूरवर्ती ‘ऊ,ओ और बा’ तीन रूप प्रचलित हैं। निकटवर्ती में ‘ए, ई और जा’ प्रचलित है।
(7) बहुवचन बनाने के लिए ‘न’ और ‘ओं’ परसगों का प्रयोग होता है। जैसे मोड़ा-मोड़न तथा मोड़ा-मोंड़ों।
(8) बलवाची प्रत्यय ऊ तथा ई का प्रयोग होता है और अधिक बल देने के लिए कहीं-कहीं ‘आ’ का प्रयोग भी किया जाता है। जैसे-हमइँआ गये ते। इस उदाहरण में हम के साथ ‘ई’ और ‘आ’ का दुहरा बल लगा है। शब्द पर अधिक बल देने की एक और भी पद्वति है जिसे तत्स्थानी बलवाची कहा जा सकता है। जैसे सबरौ-सब्बरौ-बब्बरौई, तनक-तन्नक-तन्नकऊ, निठुँअँइँ-निठ्टुँअँइँ। प्रथम दो उदाहरणों में दुहरा बल लगा है। तीसरे का पहला रूप भी बलयुक्त है। उस पर भी दुहरा बल दिया गया है।
आजकल शिक्षा और संचार माध्यमों के प्रसार तथा यातायात के साधनों में वृद्धि के कारण जनसामान्य में नकली और दिखावटी जीवन जीने की ललक पैदा हो रही है। इससे लोगों के मन में लोक भाषा और संस्कृति के प्रति एक हीन भावना घर करती जा रही है फिर भी सरकार, विश्वविद्यालय और बुद्धिजीवी, जो भविष्यचेता हैं तथा यह जान रहे हैं कि इस ऊहापोह भरे भौतिकवादी युग में लोकभाषा, साहित्य, कला, संस्कृति, परम्परा आदि सम्पूर्ण लोक-विरासत शीघ्र ही विच्छिन्न होकर एक संक्रमण शून्य अन्तराल पैदा करने वाली है, के प्रयत्न और प्रोत्साहन से लोक साहित्य और संस्कृति पर किये जाने वाले काम को कुछ महत्व मिलने लगा है। अतएव उसके संरक्षण और संवर्धन की प्रेरणा लोगों में पैदा हो रही है। इस कारण आज यह आवश्यक हो गया है कि बुन्देली का एक परिनिष्ठित या मानक रूप स्थापित हो, ताकि बुन्देली साहित्य के संवर्द्धन के लिए एक व्यापक आधार बने।
भाषा के विकास की गति स्वाभाविक होती है। यदि उसकी गति से अधिक छेड़-छाड़ की जाये तो नव स्थापित रूप प्रवाह में तैरते हुए हलके पदार्थ की तरह एक किनारे जा लगता है और प्रवाह स्वाभाविक गति से अनवरत आगे बढ़ता जाता है, संस्कृत के साथ यही हुआ।
अतः बुन्देली के मानक स्वरूप को स्थापित करना एक संवेदनशील प्रश्न है। इसके मानक स्वरूप को स्थापित करने के जिन आवश्यक तत्वों की तलाश हो, वे इसके अपने ही होना चाहिए। इस दृष्टि से टीकमगढ़ नगर से एक सौ मील अर्द्धव्यास के वृत्त में आने वाली बोली को बुन्देली का मानक रूप मानना उचित होगा क्योंकि इस वृत्त क्षेत्र की बोली में बुन्देली के सभी उपबोली रूपों की विशेषतायें घुली-मिली हैं।
विचारार्थ कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-
(1) पूर्वी बुन्देली में उत्तम पुरुष एक वचन के लिए ‘हम’ मध्यम पुरुष के लिए ‘तुम’ और ‘तें’ का प्रयोग होता है। पश्चिमी क्षेत्र में ‘में’ (एकवचन) ‘हम’ (बहुवचन) तथा मध्यम पुरुष के लिए एकवचन में ‘तूँ’ और ‘तुम’ तथा बहुतवचन में ‘तुम’ का प्रयोग होता है। प्रस्तावित क्षेत्र में उत्तम पुरुष एकवचन के लिए ‘में’ और ‘हम’ दोनों का प्रयोग होता है। इनके प्रयोग में भिन्नता अहम्, लघुता अथवा विनम्रता-प्रदर्शन जैसी भी स्थिति हो, उस पर निर्भर करती है। अहम् वाली स्थिति में हम का प्रयोग होता है। बहुवचन के लिए ‘हम औरन’ का प्रयोग होता है। लघुता या विनम्रता की स्थिति में एकवचन के लिए ‘मैं’ तथा ‘हम’ दोनों का चलन है। बहुवचन के लिए ‘हमन’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। मध्यम पुरुष में भी बहुवचन बनाने की यही शैली प्रचलित है।
(2) पूर्वी बुन्देली में वर्तमान कालिक सहायक क्रिया के रूप में ‘आय’ तथा पश्चिमी क्षेत्र में ‘है’ का प्रचलन है। प्रस्तावित क्षेत्र में दोनों का प्रचलन है। जैसे-इतै तौ कछू हैई, उतै काय धरो? इस उदाहरण में ‘है’ तथा ‘आय’ दोनों का प्रयोग हुआ है।
(3) बुन्देली के पूर्वी रूप में दूरवर्ती निश्चयवाची सर्वनाम ‘ऊ’ और इसी के विकारी रूप ‘ओ’ तथा निकटवर्ती में ‘ए’ और ‘ई’ का प्रयोग होता है। पश्चिमी में क्रमशः ‘बा’ और ‘जा’ प्रचलित है। प्रस्तावित क्षेत्र में दोनों के प्रयोग वैकल्पिक नहीं बल्कि भिन्न-भिन्न स्थितियों में रूढ़ है। प्रस्तुत उदाहरणों में उपर्युक्त सभी सर्वनामों का प्रयोग हुआ है।
1. ऊ सें कैदो बौई चलो जाये। ओई ने पैलाँ कईती कै हम चले जेंयँ/जेंहे।
2. जा लुगाई महाँ चण्डालन आ है। बा तौ सूदरी है।
3. ई मोड़ा के मारें नाँक में दम है। एई सें तौ हम इयै क्याऊँ लुआ नइँ जात।
इन थोड़े से उदाहरणों से स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में किसी सर्वनाम का प्रयोग एकान्तिक नहीं होता है और न विकल्पनीय है।
(4) पूर्वी बुन्देली में कर्मकारक परसर्ग खों, खाँ और खें का वियोगात्मक प्रयोग होता है। जैसे-राम खों, ऊ खाँ आदि। पश्चिमी में ‘ए’ ‘य’ अथवा ‘य’ का श्लिष्ट प्रयोग होता है। जैसे-रामें किताब लैदो, बाय जान दो। वियोगात्मक विभक्ति ‘को’ का भी कहीं-कहीं प्रयोग होता है। प्रस्तावित क्षेत्र में सर्वनामों के साथ ए अथवा ‘ए’ का श्लिष्ट योगात्मक प्रयोग हमें, तुमें, उऐ, उनें, इऐ होता है। यद्यपि अन्य पुरुष सर्वनामों के साथ वियोगात्मक विभकत ‘खो’ का प्रयोग भी होने लगा है। यथा ई खों, ऊ खो, इन खों आदि। परन्तु यह परिनिष्ठित हिन्दी का नव प्रवर्तित प्रभाव है। मानक बुन्देली में यदि ‘खो’ को अपनाया जाये तो अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि यह मध्यवर्ती रूप है और ‘खाँ’ की अपेक्षा श्रुतिमधुर है।
(5) पूर्वी बुन्देली के अधिकांश भागों में बलवाची ‘ई’ का तथा पश्चिी में ‘ऊ’ का प्रयोग होता है। संदर्भित क्षेत्र में दोनों का प्रयोग कुछ रूढ़ स्थितियों में होता है। मानक रूप में ये दोनों अपनाये जा सकते हैं।
(6) यहाँ तक कि बनाफरी क्षेत्र संदर्भित क्षेत्र से थोड़ा दूर है फिर भी मुलक केरे, मुतकेरे, ग्ललन केरे आदि परिमाणवाची विशेषणों पर बल देने के लिए ‘के’ के बजाय ‘केरे’ का इस्तेमाल किया जाता है जो बनाफरी प्रयोग है।
(7) स्थानवाची सर्वनामों में पूरे बुन्देली क्षेत्र में बहुत विविधता है (जिनका उल्लेख पूर्व में किया जा चुका है)। संदर्भित क्षेत्र में ‘इतै-उतै’, ‘जितै-कितै’, ‘जाँ-काँ’ का प्रयोग होता है। मानक रूप में इन्हीं का प्रयोग होना उचित है। ये यत्र-तत्र आदि से विकसित होने के कारण अध्ािक कुलीन है और संस्कारवान भी। इनका प्रयोग तुलसी, कबीर, लाल तथा अन्य कवियों ने किया है। जैसे-
‘भोजन करत चपल चित, इत उत अवसर पाई।’ - तुलसी
‘इत तें सब कोउ जात है उत तें कोउ न आय।’ - कबीर
‘जित जित घोड़ा पग धरै, उत उत फतै होय।’ - लाल
‘इत जमना उत नर्मदा इत चम्बल उत टोंस।’ - लाल
(8) इसी तरह परिमाणवाची विशेषणों में भी पूरे बुन्देली क्षेत्र में बहुत विविधता है। भौत, मुतके, कुल्ल, बिलात, गल्लन, भारी आदि शब्द प्रचलित हैं। इनमें से मानक बुन्देले के लिए ‘भौत’ शब्द ग्रहण करने योग्य है। क्योंकि यह शब्द ‘प्रभूत’ या ‘बृहद’ का विकसित रूप है। इसका विकास अभिधामूलक है। इसके ‘बृहद्’ से विकसित होने की संभावना अधिक है क्योंकि बहुत के अर्थ में ‘बड़े’ शब्द का प्रयोग आज भी पाया जाता है। जैसे-तुम तो बड़े अच्छे लगत। उतै बड़े मान्स जुटे ते। शेष शब्दों का विकास लक्षणामूलक है। गल्लन की जड़ें तो फारसी गल्लाह शब्द में खोजी जा सकती हैं।
संदर्भित क्षेत्र में बोली को बुन्देली के मानक रूप में स्वीकार करने का औचित्य यह भी है कि ओरछा का राज्य दीर्घजीवी रहा है। इस कारण राजाश्रय में यहाँ की बोली को विकास करने का अवसर मिला। इसमें साहित्य रचा गया। ग्रियर्सन तथा अन्य सभी विद्वानों ने जिस क्षेत्र में बोली को बुन्देली का परिनिष्ठित रूप माना है, प्रस्तावित क्षेत्र उसी का मध्य भाग है। यद्यपि ओरछा राज्य का बहुत विस्तार हुआ था किन्तु कालान्तर में यह बँटता या टूटता रहा। परिणामस्वरूप राजनैतिक वर्चस्व के अनुक छोटे-बड़े केन्द्र स्थापित हो गये। उनमें वर्चस्व भले ही बुन्देली का रहा और राज-काल में वही चलती रही, लेकिन स्थानीय जन-बोलियों के शब्द समूह, ध्वनि, प्रवृत्तियों और सुर लहर के संघात से उसके उपबोली रूप उभर आये किन्तु केन्द्र ओरछा ही रहा। इस कारण यहाँ की बुन्देली किसी जन-बोली के संक्रमण से अछूती रही है।
एक प्रश्न यह भी विचारणीय है कि ग्रियर्सन ने इटावा, मैनपुरी से छिंदवाड़ा और नागपुर तक फैली हुई जिस बोली को एक रूप में पहचाना उसको बुन्देली नाम ही क्यों दिया? इस प्रश्न का उत्तर यह हो सकता है कि ओरछा के बुन्देला राजाओं की छत्रछाया में जो बोली फल-फूल रही थी, उसी का पूरे क्षेत्र में स्थानीय रंग लिए हुए विस्तार था। तात्पर्य यह कि प्रश्नान्तर्गत क्षेत्र की बोली को ही बुन्देली की मूल प्रकृति के रूप में उसी प्रकार स्वीकार किया जाना चाहिए जिस प्रकार आचार्य वररुचि ने मध्यदेशीय या शौरसैनी प्राकृत को सभी प्राकृतों की मूल प्रकृति माना है।इससे एक लाभ यह भी है कि समस्त क्षेत्रों के बुन्देली भाषियों को इसमें अपनी बोली की झलक मिलेगी।
एक दृष्टिकोण यह भी है कि बुन्देली व्याकरण में बुन्देली शब्दों के साथ ही परिनिष्ठित हिन्दी और संस्कृत के शब्दों को जड़ कर मणिकांचन शैली को अपनाया जाये। इस शैली को अपनाने से बुन्देली का मानक रूप तो उभरता दिखेगा और उसकी सुबोधता का क्षेत्र भी व्यापक होगा, परन्तु बुन्देली की अभिव्यक्ति क्षमता के हास होने की संभावना भी इस प्रयोग में है। अतः इस प्रयोग में सावधानी आवश्यक है। साहित्यिक हिन्दी परिनिष्ठीकरण के चक्कर में बहुत कुछ अपनी विरासत खो बैठी है।
इस प्रकार का प्रयोग अनुवाद कार्यो में किया जा सकता है क्योंकि पुरानी भाषा, विदेशी भाषा या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की प्रवृत्तियों और शब्दों के अर्थ परिवृत्त (माहौल) में अन्तर हो सकता है, जिसे पाटने के लिए हिन्दी, संस्कृत या अति आवश्यक होने पर अन्य भाषाओं के शब्दों का बुन्देली में प्रयोग करना अनुचित और आपत्ति करने योग्य नहीं माना जाना चाहिए।

पुरानी नजाई,
टीकमगढ़ (म0प्र0) पिन- 472001

भाषाई विकास का भी सोचिए!!


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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सम्पादकीय - बात दिल की

किसी भी पत्रिका के लिए ‘सम्पादकीय’ एक अनिवार्य अंग समझी जाती है। सम्पादकीय अपने आप में सम्पूर्ण पत्रिका का स्वरूप निर्धारित करती है, ऐसा समझा जाता है। अनेक ऐसी पत्रिकाओं को देखा गया है जो सम्पादकीय विहीन होने के बाद भी उत्कृष्ट हैं। सम्पादकीय युक्त पत्रिकाओं में कुछ की सम्पादकीय तो प्रभावित करती है तो कुछ सम्पादकीय पत्रिका के स्वरूप से मेल नहीं खाती है। पता चलता है कि पत्रिका का स्वरूप तो साहित्यिक-सांस्कृतिक है और सम्पादकीय में राजनीति, विदेश नीति और युद्ध की चर्चा हो रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि साहित्य क्या है और सम्पादकीय किसी पत्रिका के लिए कितनी अनिवार्य है?
जहाँ तक बात अनिवार्यता की है तो हमारे लिए क्या अनिवार्य है, क्या आवश्यक है यह हम अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर निर्धारित करते हैं। पत्र-पत्रिकाओं के सुधी पाठक सम्पादकीय को पूरे मन से पढ़ते हैं, उसका विश्लेषण करते हैं। कुछ पत्रिकाओं की सम्पादकीय को लेकर अच्छी बहस तक होते देखी है। सम्पादकीय की भाषा-शैली, उसके विचार, भाव-संप्रेषणीयता को लेकर विचार-विमर्श, बहस तक हो जाती है पर भाषा-बोली के सवाल पर हम चुप साध जाते हैं।
भाषा-बोली के विकास के नाम पर, संवर्धन के नाम पर हम दूसरा रास्ता अपनाने लगते हैं। यही कारण है कि आज तक राष्ट्रभाषा हिन्दी को आवश्यक तो समझा गया किन्तु उसकी अनिवार्यता को लेकर सकल प्रयास नहीं किये गये। हिन्दी आज भी वहीं खड़ी अपनी स्वीकार्यता की बाट जोह रही है जहाँ वह स्वाधीनता के दिन थी। हिन्दी भाषा के विकास का मार्ग हमने ‘अंग्रेजी के बिना विकास सम्भव नहीं’, ‘ज्ञान का भंडार अंग्रेजी में ही छिपा है’, उत्कृष्ट पुस्तकें अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं’ जैसे कुतर्कों के सहारे अवरुद्ध कर रखा है। इस प्रकार की मानसिकता के द्वारा हम अंग्रेजी का ही पालन-पोषण कर रहे हैं और हिन्दी तिरस्कृत हो रही है।
हिन्दी भाषा के प्रति इस उदासीन रवैये ने अन्य क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों को भी सामाजिक स्वीकार्यता से वंचित कर रखा है। विशेष रूप से बुन्देली भाषा की बात करें तो स्पष्ट होता है कि आज ठेंठ बुन्देली भाषा में लिखने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। तकनीक विकास, समाज विकास और साहित्यिक विकास जैसी सकारात्मक स्थितियों के बाद भी भाषाई विकास नहीं हो पा रहा है। बुन्देली भाषा, साहित्य का इतिहास कितना समृद्ध रहा है इसे किसी भी उदाहरण द्वारा समझाने की आवश्यकता नहीं है। इस अमूल्य, समृद्ध विरासत के बाद भी आज बुन्देली भाषा में साहित्य सर्जना नगण्य रूप में हो रही है।पुरानी पीढ़ी के जो दो-चार नामचीन लेखक रह गये हैं वे काव्य रूप में ही बुन्देली भाषा का पोषण कर रहे हैं, गद्य का सर्वथा अभाव सा दिखता है। यदि नई पीढ़ी के रचनाकारों की ओर दुष्टि डालें तो वे सामाजिक उपेक्षा, व्यंग्य, उपहास के डर के चलते बुन्देली भाषा में साहित्य रचनाशीलता नहीं दिखा रहे हैं। कतिपय युवा रचनाकार बुन्देली भाषा के प्रेम में वशीभूत होने के कारण यदि साहित्य सर्जना कर भी रहे हैं तो वे समाज के सामने उसे प्रदर्शित नहीं कर रहे हैं।
क्षेत्रीय भाषा-बोली के प्रति उपेक्षा का भाव एकमात्र बुन्देली भाषा के साथ ही नहीं दिख रहा है। ऐसा समझा जाता है कि सम्भवतः यही व्यवहार तमाम क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों के साथ भी अपनाया जाता होगा? विकास की संकल्पना हम तैयार कर रहे हैं, क्षेत्रीयता की बात हम कर रहे हैं, साहित्य-संवर्धन की चर्चा हम करते हैं पर बिना भाषा-बोली के विकास के यह कैसे सम्भव है?
सुधी पाठकजन किसी पत्रिका के लिए जितना अनिवार्य सम्पादकीय को समझते हैं, उतनी ही अनिवार्यता भाषा और बोली के साथ भी रखें तो क्षेत्रीय भाषाओं-बोलियों का भी विकास होगा; राष्ट्रभाषा हिन्दी का भी विकास होगा। भाषाई संस्कृति-विकास के लिए स्वयं हमें जागरूक होना होगा, सचेत रहना होगा, उसकी अनिवार्यता को समझना होगा।

मुखर स्वर - डा0 सुरेन्द्र नायक


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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मुखर स्वर
डा0 सुरेन्द्र नायक


‘स्पंदन’ जुलाई-अक्टूबर 08 अंक पढ़ते हुए सुखद आश्चर्य हुआ कि उरई जैसे कस्बे से ऐसी उत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका का प्रकाशन हो रहा है। पत्रिकाओं की भीड़ में ’स्पंदन’ अपनी एक अलग पहचान बनाने की ओर अग्रसर है। इसके सामग्री चयन में उत्तरोत्तर विकास जारी है। आशा करता हूँ कि भविष्य में भी इस विकास क्रम को आगे बढ़ाते हुए एवं रचना चयन में प्रखर मौलिकता, बौद्धिकता, समसामयिकता एवं तटस्थ सम्बद्धता का परिचय देते हुए किसी भी पूर्वाग्रह या दबाव को दरकिनार रखा जायेगा।
साहित्यिक पत्रिका निकालना अदम्य जीवट का काम है जिसमें वैचारिक प्रतिबद्धता, स्तरीय सामग्री एवं संसाधन जुटाने की चुनौती का निरन्तर सामना करना पड़ता है। सामान्यतः पत्रिका प्रकाशन वर्ष दर वर्ष घाटे का सौदा है। इसीलिए साहित्यिक पत्रिकायें लघुजीवी होती हैं। पत्रिका की आवृत्ति या जीवनकाल महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण ये है कि पत्रिका ने ऐसी कितनी नयी प्रतिभाओं को प्रोत्साहित किया है; जिनका लेखन वर्तमान समय में संचरण करता हुआ भी काल का संक्रमण करता हो और जो कालान्तर में साहित्यिक क्षितिज को आलोकित करे। महत्वपूर्ण ये भी है कि पत्रिका ने कौन सी मौलिक, अप्रकाशित, अछूती, अनुपलब्ध, विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण सामग्री प्रस्तुत की है जिसके लिए उसका भविष्य में उल्लेख किया जायेगा। आम पाठक पत्रिका पढ़ता है ताकि उसे आज की वैश्विक संस्कृति एवं पूंजीवाद के खूनी पंजों से लहूलुहान मानवता एवं जटिल से जटिलतम होते जा रहे पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक एवं सामरिक समीकरणों से जीवन मूल्यों और संवेदनाओं पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने में सहायता मिले। मेरे जैसा सामान्य पाठक पत्रिका से वर्ग संघर्ष, वर्ण संघर्ष, धार्मिक उन्माद, आतंकवाद, नारी स्वतत्रंता, दलित चेतना जैसे विषयों पर भी मुखर अभिव्यक्ति एवं चिंतन की अपेक्षा करता है। ऐसा लगता है कि संपादक ने कतिपय दबाव में कुछ अतीतजीवी रचनायें एवं स्तम्भ समायोजित किये हैं जिनमें न युगबोध है और न ही समकालीन साहित्य एवं समाज का परिदृश्य है।
विरासत एवं परम्परा का सम्मान करना हमारा नैतिक दायित्व है फिर भी अगर कोई पूर्वाग्रह न हो तो धरोहर कहानी का स्तम्भ नितांत अनावश्यक है। प्रबुद्ध पाठक प्रेमचन्द्र, प्रसाद, निराला, जैनेन्द्र, अज्ञेय, मुक्तिबोध, नागार्जुन जैसे विराट नक्षत्रों के व्यक्तित्व एवं कृतित्व के प्रकाश में ही आगे बढ़ते हैं। ऐसी विभूतियों का सुपरिचित साहित्य छापने से पाठकों का पैसा बर्बाद होता है और पत्रिका के पन्ने। विशेष अवसर पर इनके अनछुये प्रसंग, संस्मरण, डायरी आदि का प्रकाशन अवश्य स्वागत योग्य है। जैसे 2008 में रामधारी सिंह दिनकर की जन्म शताब्दी थी, उन पर कुछ विशेष सामग्री श्रद्धा सुमन के रूप में छपनी चाहिए थी। प्रगतिशील कवियों की त्रयी ’केदार त्रिलोचन नागार्जुन’ की अंतिम कड़ी त्रिलोचन पिछले वर्ष ही बिखरी है। इनकी श्रद्धांजलि के रूप में इन पर विशेषांक या विशेष सामग्री का भरपूर स्वागत होता। इस संदर्भ में कुछ माह पूर्व ही निःशेष प्रभा खेतान को भी विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए। ये नारीवादी लेखन की एक पुरोधा रहीं हैं, श्रद्धांजलि स्वरूप इन पर विशेष सामग्री सहित नारीवादी लेखन विशेषांक निकाला जा सकता है।
रूपाली दास तिस्ता का ललित निबंध ‘आत्म संतुष्टि’ भावनात्मक रिश्तों की अनिवार्यता एवं गरिमा के बारे में सहज शब्दों में बहुत कुछ कह जाता है। यही भावनात्मक रिश्ते जीवन मूल्यों को उदात्तता प्रदान करते हुए मानव जीवन को पूर्णता, संतुष्टि और सार्थकता प्रदान करते हैं। डा0 ब्रजेश कुमार की कविता ’अभिव्यक्ति’ में जिजीविषा का चरम है जो विषमतम परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति आस्था को डिगने नहीं देता है। कीर्ति शेष युवा कवि हेमंत की कविता ’वह नन्हा’ बाल मजदूरी के अभिशाप का सटीक और यथार्थ चित्रण है। इसको पढ़कर मन में क्षोभ भी जागता है और आक्रोश भी; मन विचलित भी होता है और उद्वेलित भी। सामग्री के अभाव में किसी स्थापित कवि की कविता जैसे केदार नाथ अग्रवाल की ’बासंती हवा’ को स्थान दिया जा सकता था। इससे केन तट के प्रगतिशील सूफी कवि को श्रद्धांजलि हो जाती और बुन्देलखण्ड से प्रकाशित पत्रिका अपनी माटी के कर्ज से भी ऋण मुक्त हो जाती। सुधा भार्गव की ’बाल डायरी के कुछ पन्ने’ मन को छू गयी। इसमें माँ के प्यार को तरसते बच्चे की कोमल संवेदनाओं को बहुत मार्मिक ढंग से उकेरा गया है। इतनी अच्छी रचना लेखन के लिए सुधा भार्गव को बधाई। डा0 मधु संधु की कहानी ’संगणक’ शहरी परिवेश को लेकर लिखी गयी है। कहानी समसामयिक है और बहुत अच्छी बन पड़ी है। निर्मल कौर संधू का संस्मरण ’बचपन की मीठी यादें’ रोचक लगा।
कृष्ण कुमार यादव, डा0 हरि सिंह और चरण सिंह जादौन के आलेख पठनीय हैं। इनमें बाल लेखन की समस्याओं के बारे में कई तरह के सुझाव दिये गये हैं। आखिर इन सुझावों को कौन कार्यान्वित करेगा? आज की पीढ़ी का नया लेखक तो इंटरनेट से सामग्री डाउनलोड करता है। इसके बाद उसका लिप्यांतरण और थोड़ी सी फेर बदल करता है, लो हो गयी रचना तैयार। अगर ऐसा न भी हो तो भी आज का युवा लेखक कलम पकड़ते ही वैश्वीकरण और वैश्विक संस्कृति से ही लेखन की शुरूआत करता है। जिसमें मनुष्य सिरे से गायब रहता है। मनुष्य, मानवीय मूल्य, संवेदना, परिवार, समाज, प्रेम जैसे तत्व तो साहित्य की परिधि से लगभग निष्कासित ही हो चुके हैं। ऐसे में बाल साहित्य कहाँ ठहरेगा? बचपन और संस्कार बचाने की किसको चिन्ता है? इसके लिए हमें बंगाली भाषा के साहित्यकारों से शिक्षा लेनी चाहिए। बंगाली भाषा में परम्परा है कि साहित्यकार सबसे पहले बच्चों को संस्कारित करने के लिए बाल साहित्य लिखे और बाद में वह अन्य पाठक वर्ग के लिए लिखे।
सम्पादकीय पढ़ने से लगता है कि सम्पादक महोदय बाल साहित्य के भविष्य के प्रति काफी आशंकित हैं। काल चक्र, पूंजीवाद और वैश्विक संस्कृति का प्रभाव तो आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, सामरिक, फिल्म, साहित्य आदि हर क्षेत्र पर पड़ा है। दुनिया तो हमेशा ही बाजार से कमोवेश प्रभावित होती रही है लेकिन बाजारवाद आज जैसा हावी कभी नहीं रहा। ऐसे में बच्चे और बाल साहित्य इससे अछूते कैसे रह सकते हैं? आज का बच्चा प्रेमचन्द्र की ’ईदगाह’ के जमाने का भोला भाला बालक नहीं है और न ही उन्नीसवीं, बीसवीं शताब्दी की तरह कोरी स्लेट। जिसे परियों, जादूगरों, राजा-रानी, शेर-लोमड़ी की कहानी से भरमाया जा सके। आज का बच्चा पूर्ण जिज्ञासु होता है और तर्क की कसौटी पर कसकर ही कोई बात मानने को तैयार होता है। आज संवेदना, सहनशीलता, पारम्परिक रिश्तों की गरमाहट, साहस, वीरता, नैतिकता जैसे उदात्त जीवन-मूल्य बुजुर्गों के ही खून में शामिल नहीं हैं फिर ये गुण बच्चों की प्राथमिकता कैसे बन सकते हैं? अब आम वयस्क की भांति बच्चे भी क्रिकेट स्टार, फिल्म स्टार, अरबपति बनने के सपने देखते हैं। इस सुनियोजित व्यवस्था और सपनों की विरासत बच्चों को हमने ही तो सौंपी है फिर मूल्यों के क्षरण का स्यापा क्यों? नयी सदी के यक्ष प्रश्न तो हमारे ही खड़े किये हुए हैं फिर इनके उत्तर और समाधान कौन तलाशेगा? आज इक्कीसवीं सदी का बाल साहित्य कम्प्यूटर, इंटरनेट, रेडियो, टीवी, फिल्म, बाल पत्रिका आदि के माध्यम से कई आयामों में रचा जा रहा है और प्रसारित हो रहा है। अनेक बाल कथाकार, बाल कवि तथा बाल रचनाकार भी तैयार हो रहे हैं। यहाँ गीतिका सिंह, सुरम्य शर्मा, नूपुर शर्मा के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। जिन्होंने बाल्यकाल में ही बाल कहानियाँ और बाल कविता संकलन दिये हैं। बाल साहित्य के उत्थान के लिए अनेक सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थायें सराहनीय काम कर रही हैं। बाल साहित्य की विविध रोचक पत्रिकायें भी अच्छी सामग्री एवं साज सज्जा के साथ छप रहीं हैं। भारतीय ज्ञानपीठ ट्रस्ट की मासिक पत्रिका ’नया ज्ञानोदय’ एवं कई अन्य प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने विगत कुछ वर्षों में ही बाल साहित्य पर विशेषांक निकाले हैं। ऐसे में बाल साहित्य का परिदृश्य निराशाजनक नहीं कहा जा सकता बल्कि उसका स्वरूप आज के बच्चों की अपेक्षाओं एवं परिवेश के अनुसार बदल रहा है। बाजारवाद के भीषण आक्रमण के बावजूद सैकड़ों बाल साहित्यकार अपने ताप और संवेदना का सार्थक प्रयोग करके बाल साहित्य के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्ति प्रदान कर रहे हैं।
अतीतजीवी बाल साहित्यकारों से ये अपेक्षा अनुचित नहीं कही जा सकती है कि वे आज के परिवेश, आवश्यकता और मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर साहित्य रचना करें ताकि वह आज के जागरूक बच्चों के लिए ग्राह्य एवं उपयोगी हो। जो लेखन वर्तमान में संदर्भ से कटा हुआ है और भविष्य में छलांग नहीं लगा रहा है, वह लेखन निरर्थक है; सिर्फ येन केन प्रकारेण छपने से यह मूल्यवान नहीं हो सकता।

गीताश्रम के सामने, अजनारी रोड
नया रामनगर उरई जालौन) पिन-285001




Tuesday, March 31, 2009

अंक-8 जुलाई-अक्टूबर 2008


अंक - 8 जुलाई-अक्टूबर 2008
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बात दिल की
सार्थक प्रयास करना होगा
धरोहर कहानी
ईदगाह/प्रेमचन्द
आलेख
बाल साहित्यःदशा और दिशा/कृष्ण कुमार यादव
बाल साहित्य की यात्रा/डा0 हरि सिंह
बाल साहित्य और उसकी प्रासंगिकता/चरण सिंह जादौन
संस्मरण
बचपन की मीठी यादें/निर्मल कौर संधू
कहानी
सच्चे साथी/कुसुमांजलि शर्मा
मैं अकेला/शामलाल कौशल
संगणक/डा0 मधु संधू
लघुकथा
भिखारी बालक/ओमप्रकाश ‘मंजुल’
कवरेज कम्पलीट/डा0 पूरन सिंह
फोड़ा/कमल चोपड़ा
उल्लू कौन?/विष्णु कुमार चतुर्वेदी
काव्य-प्रसून
सूरज उगाना चाहता हूँ/डा0 मोहन ‘आनन्द’
हाइकु/कुन्दन पाटिल
अब भारत की बात करो/दीपावली/हितेश कुमार शर्मा
शिक्षा/प्रकृति की बारात/अंजु दुआ जैमिनी
विशेष
बाल डायरी के कुछ पन्ने/सुधा भार्गव
दोहा छन्द का भेदपरक अध्ययन/प्रवीण कुमार सक्सेना ‘उजाला’
लग कोना
आत्म-संतुष्टि/रूपाली दास ‘तिस्ता’
युवा स्वर
वह नन्हा/हेमंत

बचपन की मीठी यादें

संस्मरण / जुलाई-अक्टूबर 08
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निर्मल कौर संधू




वो भी कितने अच्छे दिन थे, जब हमारा बचपन था। उन दिनों बाबू जी जोधपुर जंकशन में गार्ड की पदवी पर थे। मैं कक्षा चार में थी। नई क्लासें शुरू होने वाली थी। मैं माँ से रोज नई क्लास की किताबे मंगवाने को कहती। कई बच्चे किताबें कापियाँ ले भी आए थे। आखिर नई क्लासों की पढ़ाई शुरू हो गई। हम छै भाई बहन थे, चार बहनें व दो भाई। सभी सरकारी स्कूल में पढ़ते थे। जब मैं नई किताबें लेने की जिद करने लगी तो माँ ने सिर पर हाथ फेरते हुए कहा कि ‘आज तेरे बाबू जी किताबें जरूर लेकर आएंगे, क्योंकि परसो वो बीकानेर ट्रेन लेकर गए हैं। वहाँ किताबों वाला दुकानदार तेरे बाबू जी का दोस्त है।’ माँ बाबू जी वाली टेªन आज कितने बजे आएगी’, मैंने माँ से पूछा।
माँ ने कहा ‘रात को ग्यारह बजे स्टेशन टेªन आकर रुकती है, तेरे बाबू जी को स्टेशन मास्टर के रूम में जाकर रजिस्टर पर साइन करके घर आते-आते साढ़े ग्यारह बजेंगे ही। तुम सो जाना और सुबह नई किताबें स्कूल ले जाना।’ मुझे बहुत खुशी हुई। मैं पढ़ने की बहुत शौकीन थी। सदा क्लास में फस्र्ट आती थी। सभी लोग यानी बहिनें भाई सो गये थे मगर मेरी आँखों में नींद नहीं थी। बार-बार करवटें बदलती आखिर माँ ने डाँटा ‘सोती क्यों नहीं, सुबह स्कूल नहीं जाना क्या? देर से सोकर जल्दी कैसे उठोगी।’ मैं चुपचाप आँखे मूँदकर सोने का प्रयास करने लगी मगर असफल रही। कुछ देर बाद मुझे माँ के हल्के हल्के खर्राटे सुनाई पड़ते और कुछ ही देर बाद माँ उठकर घड़ी देखने लग जाती। माँ की आँख फिर लग गई पर अभी दरवाजे पर थाप सुनाई दी। माँ उठी पर मैंने जल्दी से दरवाजे के बीचोबीच में लगा सांकल खोला व पूछा, ‘बाबूजी मेरी किताबें लाए?’ ‘हाँ सबकी लाया हूँ। जाओ सो जाओ सुबह लेना।’ आखिर मैं सो गई। सुबह जल्दी ही आँख फिर खुल गई। तब माँ सिगड़ी सुलगा रही थी। मैं धीरे से उठी और किताबें ढूँढने लगी। मेरी नजर एक बड़े से बंडल पर पड़ी। मैंने कैंची से किताबों पर बंधा सुतली का धागा काट डाला और जल्दी-जल्दी चैथी क्लास की किताबें अलग करने लगी। मुझे उन कोरे कागज पर लिखे सवाल, कविता, इतिहास, भूगोल, हिन्दी किताबों की महक बहुत भा रही थी जो आज भी महसूस करती हूँ। मैंने जल्दी-जल्दी अपनी किताबें व कापियाँ समेटी और माँ ने बाबू जी की पुरानी पैंट में से मजबूत मजबूत कपड़ा निकाल कर हम बहनों के जो बस्ते घर में सिले थे, उस बस्ते में अपनी किताबें कापियाँ सजा कर डाल दीं।
इस बात को आज भी याद करके एक मीठी सिरहन पूरे तन पर दौड़ जाती है। इसी तरह अपने बचपन की एक बात को तो जब भी याद करती हूँ तो हँसे बिना नहीं रह पाती। मुझे याद है उन दिनों सन् 1955 में जब पन्द्रह अगस्त या छब्बीस जनवरी का दिन होता तो हमें हर एक बच्चे को चार-चार लड्डू स्कूल से मिलते थे। एक बार हम सभी भाई बहन अपने अपने लड्डू घर ले आए। मैं मीठा खाने की बहुत शौकीन थी। सभी ने लड्डू लाकर माँ को दिये मगर मैंने घर में, गुसलखाने में घुसकर चारों बड़े-बड़े लड्डू खा लिये तब कमरे में आई। माँ ने पूछा ‘तेरे लड्डू कहाँ है बेटी? सभी दो-दो लड्डू खा रहे हैं।’ मैने फट से जबाव दिया ‘तभी तो मैंने चारों खा लिए हैं।’ लेकिन एक घंटे बाद मेरा पेट खराब हो गया था। अब तो सभी ने मेरा जो मजाक बनाया कि बस पूछो नहीं।
इसके कुछ दिन की ही बात थी मैंने स्कूल में जाने से पहले माँ से आँख चुरा कर आम के अचार की बर्नी से जल्दी जल्दी हाथ से ही एक खाली रोटी के डिब्बे में अचार भर लिया और जल्दी से बस्ते में छुपा लिया। जब मैं स्कूल पहुँची तो सभी बच्चे हँसने लगे। मैंने जल्दी से कंधे से बस्ता उतारा और देखा अचार का तेल नुचड़ नुचड़ कर मेरे बस्ते और पीछे से कमीज को तेल से भिगा चुका है। असल में वो अचार मैं अपने साथ पढ़ने वाली एक चपरासी की बेटी ‘नारंगी’ को देने के लिए लायी थी। हुआ यह था कि इस बात के एक दिन पहले मैंने जब अपना परांठा अचार के साथ उसे खाने को दिया तो उसे बहुत स्वादिष्ट लगा। मैंने उसे अचार देने का वादा किया था। उस दिन माँ से डाँट तो पड़ी थी पर आज ये डाँट मीठी डाँट लगती है।
मुझे बचपन से ही गाने व नाचने का बड़ा शौक था। जब भी किसी के घर शादी, ब्याह या उत्सव आदि होता तो राजस्थान में कई दिनों पहले ही गीत गाए जाते हैं। मैंने उस समय की सभी हिट फिल्मों के गीत याद कर लिए थे। मैं शादी वाले घर में माँ से छुपकर जाती और कह आती कि मैं खूब नाचूँगी और गाऊँगी भी लेकिन आप मेरी माँ को कह आना कि निर्मल को जरूर साथ लाना। किसी कार्यक्रम में जाने, नाचने, गाने पर माँ हमें कह देती है अभी तुम लोगों के पढ़ाई करने के दिन हैं, गीत गाने के नहीं। मैं मन मार कर रह जाती पर गीत गाने की इसी लगन ने मुझे गीतकार और कहानीकार बना दिया। बहुत साल पहले बाबूजी और फिर माँ भी सितारों में शामिल हों गईं पर आज भी बचपन की यादें, माँ-बाबूजी का प्यार, मीठी डाँट, नसीहतें सभी कुछ आँखों को नम कर जातीं हैं।



224 बसन्त एवेन्यू,
अमृतसर-143001 (पंजाब)

बाल डायरी के कुछ पन्ने

विशेष / जुलाई-अक्टूबर 08
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सुधा भार्गव



माँ आप सुबह सात बजे ही अपने आफिस के लिए घर से निकल पड़ती हो। केवल चाय पी पाती हो। लौटती हो बहुत थकी हुई। मुझे आप पर बहुत तरस आता है। जी चाहता है भाग-भाग कर आपके काम करूँ। लेकिन कर नहीं पाता। करूँ कैसे? जानता ही नहीं उन्हें करना। कल मेरा गृह कार्य कराते समय आप बहुत झल्ला रहीं थीं। मैंने सोचा आपके आने से पहले सुलेख तो लिख ही सकता हूँ। बहुत ध्यान से धीरे-धीरे लिखा। घर में आपके घुसते ही मैं इतराते बोला था ‘मैंने अपना गृह-कार्य खत्म कर लिया। देखो....माँ!’
‘क्या माँ...माँ की रट लगा रखी है। एक मिनट तो साँस लेने दे।’ गुलाब सा खिला मेरा चेहरा मुर्झा गया। मैं गुमसुम बैठ गया ....शायद मनाने आओ....नहीं आईं। चाय पीने के बाद सो गईं। शाम को उठीं। उस समय मैं खेलने बाहर जा रहा था। आपने मुझे रोक लिया। ‘कहाँ चले नवाब, लाओ, जरा देखूँ क्या किया है?’
सुलेख पर नजर पड़ते ही तमतमा उठीं-‘अरे! यह क्या? ज्यादातर शब्द लाइन से बाहर निकले हैं। कोई अक्षर छोटा है कोई बड़ा। कितनी बार कहा है कि ठीक से लिखा कर पर नहीं, ना सुनने की तो कसम खा रखी है।’ मुझे डाँट कर तुम चली गईं। मेरी सारी खुशियाँ भी अपने साथ ले गईं। माँ, आप दुनिया में पहले आईं मैं बाद में आया। आपके हाथ बड़े-बड़े हैं मेरे छोटे-छोटे हैं। तुम्हें लिखने का जो अनुभव है वह मुझे नहीं। क्यों आशा करती हो कि मैं आपकी तरह मोती से अक्षर बनाऊँ। मुझे कुछ समय दो और अभ्यास करने दो।

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मैं एक-एक दिन उँगलियों पर गिनता रहता हूँ सोमवार, मंगल, बुध, ब्रहस्पति, शुक्र; शनिवार पर आकर रुक जाता हूँ। शनिवार को आपकी छुट्टी होती है। आज भी तो शनिवार है। आपके साथ बाहर घूमने जाऊँगा, अपनी मनपंसद आइसक्रीम खाऊँगा। खुशी के मारे हवा में उड़ा जा रहा हूँ। ओह यह क्या हुआ? आपकी तो किटी पार्टी निकल आई। आपको तो जाना ही पड़ेगा। लेकिन पार्टी तो 3 बजे से शुरू है। आप कहाँ हो? माँ-माँ....।
दिव्या से मालूम हुआ आप बाजार गई हो साड़ी खरीदने। साड़ी.....साड़ी से तो आपकी दो अलमारियाँ भरी पड़ी हैं। पापा ने एक बार टोक दिया था-‘जब भी कहीं जाती हो नई साड़ी खरीदती हो। एक साड़ी दो बार भी पहन सकती हो।’ आपने छूटते ही कहा-‘आप नहीं समझेंगे यह मेरी शान का सवाल है। फिर मैं कमाती हूँ तो अपने ऊपर खर्च भी कर सकती हूँ। आपको बुरा क्यों लगने लगा।’ पापा बहुत कम आपके मामले में बोलते हैं और बोलते हैं तो इसी तरह आप उन्हें चुप करा देती हो।
माँ, पापा भी तो धन कमाकर लाते हैं वे तो अपने पर कभी इतना खर्च नहीं करते हैं। वे सबका ध्यान रखते हैं और आप केवल अपना।
आप दो बजे लौटकर आईं। जल्दी-जल्दी तैयार होकर बोलीं-‘तुम्हें मिसेज सिन्हा के घर छोड़ देती हूँ। लौटते समय ले लूँगी।’
‘माँ, मैंने खाना भी नहीं खाया।’
‘क्यों नहीं खाया। एक दिन अपने आप खा लेता तो क्या हो जाता? दिव्या से ले लेता। अब तो वह चली गई। मुझे देर हो रही है। ऐसा कर बिस्कुट का पैकिट ले और आंटी के यहाँ खा लेना। आलू चिप्स भी हैं। पेट तो भर ही जायेगा।’
सिन्हा आंटी ने गर्म-गर्म फुल्के बना कर दिये। मैंने पेट भर कर खाया। वे बोली-‘खाने के समय बिस्कुट नहीं खाओ। बाद में खाना।’ उनकी बात ठीक लगी। मैं सो गया। सोकर उठा तो दूध का गिलास लिए खड़ी थीं। उनके प्यार में मैं नहा गया और गटगट दूध पी गया।
मैंने एक बार भी माँ को याद नहीं किया। जब तक आप नहीं आईं मैं सिन्हा आंटी के बेटे पप्पू के साथ खेलता रहा। आप आईं तो सोचा क्यों आ गईं और देर से आतीं तो अच्छा था?
घर पहुँचकर आपने मुझे दूध दिया। मेरे पेट में जगह ही नहीं थी। बड़े आश्चर्य से बोलीं-‘बिस्कुट खाने के बाद भूख नहीं लगी।’ ‘आंटी ने दाल रोटी खिलाई और दूध भी पिला दिया’, मेरे यह कहते ही आप गुस्सा हो उठीं।
‘नदीदा कहीं का, तुझे तो हम कुछ खाने को नहीं देते, टूट पड़ा भुख्खड़ की तरह सूखी रोटी पर। खाया तो खाया दूध भी पीकर आ गया। मिसेज सिन्हा भी क्या सोचती होगी हम तेरा ख्याल नहीं रखते।’
तुमने जितनी दुनिया देखी है उतनी मैंने नहीं। आप क्या सोचती हैं दूसरा क्या सोचता है मैं नहीं जानता। जो मेरा मन कहता है वह मैं कर लेता हूं। मुझे अपनी इच्छा के बारे में पहले से बता दिया करो मैं वही कर लिया करूंगा।


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यह दुनिया मुझे अद्भुत लगती है। रात में तारे चमकते देखकर मैं खुशी से खूब उछलता हूं। उन्हें पकड़ने की कोशिश करता हूं पर मेरे हाथ नहीं आते। दिन में तो न जाने वे कहाँ छिप जाते हैं। ढूँढते-दूँढते थक जाता हूँ। आपसे मैंने एक बार इनके बारे में पूछा भी था। हँसकर बोलीं-‘मैं फोन करके पूछ लूँगी वे कहाँ हैं?’ आज तक नहीं पूछा। पूछा भी होगा तो भूल गईं हो। स्कूल के बगीचे में लाल नीले पीले फूल खिले हैं। मैंने यह भी प्रश्न पूछा था आपसे-‘हम लाल पीले नीले क्यों नहीं होते?’ गम्भीरता से आपने जवाब दिया-‘इसका उत्तर तो भगवान ही दे सकते है। उसने ही हम सबको बनाया है। उसे भी फोन करना पड़ेगा।’
कुछ दिनों बाद मैंने फिर पूछा-‘माँ फोन किया था?’ ‘अरे फोन नहीं हो पाया। भगवान तो आकाश में रहते हें वहाँ की टेलीफोन लाइन खराब है।’
मुझे लगा मेरी बातों के लिए आपके पास समय नहीं। कुछ दिनों की ही बात है फिर तो मैं बड़ा हो जाऊँगा। जब तक छोटा हूं, मुझे अपना कुछ समय दे दो। दुनिया के रहस्य मेरे दिगाम में खलबली मचा देते हैं जो सोने नहीं देते। उनके बारे में बताकर मेरी जिज्ञासा शांत कर दो।


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माँ अक्सर आप सात बजे तक घर आ जाती है। आज तो रात के नौ बज गये। शायद आपके आफिस में मीटिंग थी। पापा टर्की गये हैं। आप भी बाहर, पापा भी बाहर। पापा यह नौकरी छोड़ क्यों नहीं देते। एक महीने में 20 दिन अमेरिका, इटली न जाने कहाँ-कहाँ जाते रहते हैं। आपके पास मेरे लिए समय नहीं। पापा अवश्य मेरे साथ गप्पबाजी करेंगे। मुझे बाजार से मेरी इच्छा के जूते, टाफियाँ दिलायेंगे। एक बार आपने शायद पापा से कहा भी था-‘बाहर जाने से अच्छा है अपने देश की ही नौकरी।’
पापा तो भड़क उठे-‘तुम नौकरी क्यों नहीं छोड़ देती। घर को कुशलता से चलाना भी बहुत बड़ा काम है। तुम्हें कितना पैसा चाहिए? मैं दूँगा। घर को बर्बाद होने से बचा लो।’ पापा की आवाज रोनी सी हो गई थी। मैं बहुत घबरा गया। पापा से लिपट गया। पापा ने गोदी में लेकर मुझे चूम लिया। समझ में नहीं आया पापा मेरी तरह रोये रोये क्यों हो गये? वे तो मेरी तरह छोटे नहीं है फिर भी कोई बात मिलती है हम दोनों की।
समय काटे नहीं कट रहा है। हवा से पर्दा भी हिलता है तो लगता है आप आ गईं। टी0वी0 देखते देखते दस बार नींद के झोंके ले चुका हूँ। वीडियो गेम खेला, मनपसन्द चाकलेट, केक भी खा लिया। आलू चिप्स के तो दो पैकिट खत्म कर दिये। डिनर हो गया समझो। सोना भी चाहता हूँ और नहीं भी। नींद का समय है नींद तो आयेगी पर आपसे बात नहीं हो पायेगी। कितनी देर से आपका चेहरा देखने को तरस रहा हूँ। सुबह उठकर वही भागदौड़। काम की भागदौड़ नहीं रहती। आपके मोबाइल टेलीफोन की भागदौड़ रहती है। नानी से आप बहुत देर तक बातें करती हो। कभी सोचा आप मेरी माँ हो। मेरा दिल भी आपके सामने खुल जाना चाहता है। माँ की खुशबू चाहता है। चाहता हूँ आप मेरे बालों में अपनी सुन्दर उंगलियाँ घुमाओ और मैं गहरी नींद में खो जाऊँ। मुझे अलग कमरे में सुलाती हो ताकि स्वस्थ रहूँ। ठीक ही सोचती हो मगर इस मन का क्या करूँ। रात में नींद खुलने पर बाथरूम जाता हूँ। नींद उचट जाती है। डर लगता है। किसी कोने जंगली बिल्ली नजर आती है। कहीं साँप देखता हूँ। काश आपकी गोद में छिप जाता। एक दिन आपके कमरे का दरवाजा खड़खड़ा दिया था तो मुझे ऐसा दुत्कार दिया जैसे गली के कुत्ते को भगाते हैं। लगता है मन से जरूर बीमार हो जाऊँगा।


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आज रात मौसी-मौसा जी मिलने आये थे। मैं गुमसुम बैठा उनकी बातें सुन रहा था। मैंने सोचा मुझे भी कुछ कहना चाहिए वर्ना मौसी समझेगी मैं गूँगा हूँ। मैंने डरते-डरते कहा ‘मौसी आप एक बात बतायेंगी-हवाई जहाज जमीन पर भी दौड़ता है हवा में भी उड़ता है। चिड़िया धरती पर फुदकती है आकाश में उड़ती है, तितली फूलों पर बैठती है और पंख फैलाये उड़ान भरती है मैं केवल जमीन पर चलता हूं उनकी तरह उड़ क्यों नहीं सकता?’
‘बेटे, तुम्हारे पंख नहीं हैं’
‘क्यों नहीं हैं?’
‘कितनी बार कहा है बड़े जब बाते करें तो बीच में नहीं बोलना चाहिए। फालतू की बात मत करो और जाओ अपने कमरे में।’
बड़ी बेरहमी से माँ तुमने मेरा गला घोंट दिया। तुम मुझसे ज्यादा शक्तिशाली हो। मुझ कमजोर ने घुटने टेक दिये। आँसुओं को संभालता वहाँ से उठ गया। मेरा भी तो सबसे मिलने का मन करता है। सबके साथ हँसने को व्याकुल रहता हूँ। अनुशासन ही सिखाना है तो आप प्यार से समझा देतीं। इस तरह मेरा अपमान करने की क्या जरूरत है। मेरी भी कोई इज्जत है। छोटा हूँ तो क्या हुआ? महसूस तो उसी तरह से करता हूँ जैसे आप करती हैं। मैं आपसे अच्छा व्यवहार करूँ इसके लिए आपको भी शिष्ट होना पड़ेगा।

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दादी माँ बताती हैं कि आप रोज मंदिर जाती थीं। भगवान से कहती थीं कि मुझे एक गुड्डा चाहिए। उसने गुड्डे के रूप में मुझे भेज दिया। उस समय मेरे दाँत नहीं थे, चल-फिर नहीं सकता था। आप मुझे दूध पिलातीं, नहलातीं, गोदी में लिए लिए घूमतीं। धीरे-धीरे दाँत निकल आये, चलने-फिरने लगा। खाना भी खुद खा लेता हूं। पर मां यह सब धीरे-धीरे ही तो हुआ। अभी तो मुझे बहुत कुछ सीखना है। आपको धैर्य तो रखना ही पड़ेगा। क्यों जल्दी-जल्दी अपनी आवाज कड़वी कर लेती हो? लगता है मुझसे तंग आ गई हो, पर मेरा क्या कसूर? मैं खुद आपके पास नहीं आया बल्कि बुलाया गया। मैं तो भगवान का दिया उपहार हूँ। इसकी देखभाल तो करनी ही पड़ेगी। चाहे खुश होकर करो, चाहे दुखी होकर। खुश होकर करोगी तो मैं भी खुश रहूँगा। दुखी होकर करोगी तो मुरझा जाऊँगा। प्यार भरी छुअन, प्यार भरी निगाहें तो मैं शुरू से ही समझता हूँ।

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Spring Seeds,
17/20 Ambalipura Village,
Bellandur Gate, Sarjapura Road,
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