Friday, July 16, 2010

बुन्देली लोकगीतों में लयात्मक नाद-सौन्दर्य --- डॉ0 वीणा श्रीवास्तव



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली लोकगीतों में लयात्मक नाद-सौन्दर्य
डॉ0 वीणा श्रीवास्तव



नाद ब्रह्म है, ब्रह्म ही जीव है। जीवन में सभी कुछ लय के अन्तर्गत निहित है। बिना लय या गति से सब कुछ निर्जीव है।
विराट प्रकृति लय, ताल, छंद पर नर्तन करती गतिमान है। मनुष्य जीवन संगीतमय हैं। संगीत की इस चतुर्दिक परिव्याप्ति में वाद्य का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि वाद्य की अनुपस्थिति में गायन तथा नृत्य क्रियायें प्रायः पंगु हो जाती हैं। सच तो यह है कि संगीत के इन अवयवों में वाद्य का प्रादुर्भाव हुआ होगा।आदि मानव ने जब बादलों की गम्भीर गड़गड़ाहट, वर्षा की बूंदों की झमझमाहट, तेज हवाओं की सनसनाहट तथा समुद्री लहरों की छपछपाहट आदि सुनी होगी तब ध्वन्यानुकरण पर उसने अपनी तालियों को, लकड़ी अथवा पत्थर के टुकड़ों को बजाया होगा, उस ध्वनि में तन्मय होकर गुनगुनाया होगा तथा प्रसन्न होकर नाचने लगा होगा।
लोक संगीत में लोकवाद्यों की प्राचीनता तथा लोकप्रियता स्वयं सिद्ध है। डमरू देवाधिदेव भगवान शिव की पहचान है। विष्णु शंखधारी हैं। प्रजापति ब्रह्मा ढोल के निर्माता हैं। मुरली कृष्ण की पर्याय है। वाग्देवी वीणापाणि हैं। नारद वीणा, करताल वादक हैं। महाभारत के महासमर का प्रतिदिन आरम्भ तथा अन्त शंख-ध्वनि से किया जाता था फलतः वाद्यों की चिरन्तन धारा अनादिकाल से चली आ रही है और इसका आविष्कार तथा विकास लोक जीवन में ही हुआ है।
लोक जन जीवन सीधा सादा सरल, सहज भाव से एवं निश्चल रूप से गतिमान या प्रवाहित होता रहता है। लोकमन के जीवन से जुड़ी हुई प्रत्येक स्थिति-परिस्थिति उसके कार्य-विचार यहाँ तक कि प्रकृति भी उसके मन-मस्तिष्क को उद्वेलित करती रहती है और यह सब किसी न किसी रूप से उसे प्रभावित भी करती है, इसीलिए जब मानव निश्चिन्त होकर कुछ गाता-गुनगुनाता है तो उसके गीतों में स्वतः ही यह सब समाहित हो जाता है। वह कभी मिलन के गीत गाता है, तो कभी विरह के, कभी शृंगार के तो कभी आध्यात्म के, कभी सावन-वर्षा तो कभी बसंत के, कभी उत्सवों के तो कभी त्योहारों के, कभी-झरनों व नदियों की बात तो कभी विन्ध्य पहाड़ियों का शौर्य न जाने कितने ही प्रसंग उसके गीतों की बानगी हुआ करते हैं।
लयात्मकता इन सभी की विशेषता है और इस लय से नाद-सौन्दर्य को द्विगुणित करते हैं लोकवाद्य।
बुन्देलखण्ड अपने लोकगीतों, लोकवाद्यों तथा लोकनृत्यों के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहाँ लोकवाद्यों का प्रयोग लोकगीतों, नृत्यों में संगत देने तथा स्वतंत्र रूप से वादन के लिए किया जाता है। लोकनायक स्वरों को सम बनाने, गीतों को तन्मयता से गाने, गायन के बीच साँस भरने (भाव) तथा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध करने के लिए लोकवाद्यों का उपयोग करते हैं।
लोकसंगीत सहज एवं प्रकृतितः होता है। इसमें स्वर और ताल प्रधान न होकर लय तथा धुन प्रधान होती है। यह शास्त्रीयता के बन्धन को स्वीकार नहीं करता। यही स्थिति लोकवाद्यों की भी है। लोकजन बाह्याडम्बरहीन बजाने की दृष्टि से उपेक्षित तथा सहज उपलब्ध वस्तुओं से ही बजाने का कार्य ले लेता है। यहाँ तुम्बी से बीन, गोल तुम्बे से इकतारा, बांस, नरकुल से बांसुरी, आम की गुठली से पपीहा, ताड़ या बरगद के पत्तों से पिपहरी आदि बना लिये जाते हैं। यहाँ तक कि थाली, लोटा, कटोरा, सूप, चालन, चिमटा, घड़ा, मटका, ताली एवं चुटकी आदि सभी वाद्य के रूप में प्रयुक्त किये जाते हैं। जहाँ चक्की की घरघराहट तथा चूड़ियों की खनखनाहट के समवेत स्वर में गाती बुन्देली बालाओं की धुनें अन्तर्मन को स्पर्श कर लेती हैं, वहीं ढेकी, ऊखल-मूसल की धमक तथा चूड़ियों की खनक के बीच गाए जाने वाले गीत किसी अन्य वाद्य यंत्र की अपेक्षा नहीं रखते हैं। जलाशयों से पानी लाते जाते समय स्त्रियों के पैर की पैंजनी तथा बिछुआ की रुनझुन की ध्वनि ही उनके गीतों में वाद्ययंत्र होते हैं।
पुत्र जन्मोत्सव की खुशी का इज़हार वे थाली बजाकर कर लेती हैं। ग्र्रामीणजन बैलों के गले में बँधी घंटी, घुँघरू तथा उनके खुरों की टपटपाहट की लय, ढेकली चलाने वाले पानी की सरसराहट तथा ढेकली की चरचराहट, तेल या रस पेरने वाले कोल्हू की मचमचाहट, नाविक के पतवार की छपछपाहट तथा धोबी के कपड़े धोने से उत्पन्न ध्वनि की लय पर मस्ती से गीत गाते देखे सुने जाते हैं। इसके अतिरिक्त बुन्देली लोकवाद्यों में मुख्य रूप से ढोलक, ढप, ढाक, ढपली, मृदंग, अलगोजा, रमतूला, तुरही, शहनाई, बाँसुरी, मंजीरा, झाँझ, करताल, लोटा, चिमटा, एकतारा, केंकडिया, तम्बूरा एवं सारंगी आदि वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। इनमें से कुछ तो स्वतंत्र वाद्य के रूप में प्रयुक्त किए जाते हैं और अधिकतर लोकगीतों, लोकगाथाओं एवं लोकनृत्यों के साथ संगत के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। इन सभी के साथ प्रयुक्त संगत वाद्यों का नाद-सौन्दर्य लोकगीतों आदि में चार चाँद लगा देता है।
बुन्देलखण्ड के लोकजीवन में गीतों के अनुरूप काल, स्थान एवं जाति के अनुसार भी वाद्यों का प्रयोग किया जाता है। कुछ तो वाद्य ऐसे हैं जिनका प्रयोग स्थान विशेष तथा समय विशेष पर ही किया जाता है। उदाहरण के तौर पर ‘गोटें’ (लोकगीत का एक प्रकार) प्रत्येक समय, काल तथा स्थान पर नहीं गाई जातीं। यह भादौं महीने की चौथ को देव-चबूतरे पर ‘ढाक-वाद्य’ के साथ पूजा के समय ही गाई जाती हैं।
कहना न होगा कि बुन्देली लोक जीवन में हमें वाद्यों के मुख्य दो स्वरूप मिलते हैं-प्रथम मनुष्य की क्रियायें वाद्य का स्वरूप धारण कर लेती हैं जैसे ढेकली चलाने से उत्पन्न ध्वनि या चकिया की घरर-घरर की ध्वनि। इन क्रियागत ध्वनियों को हम क्रिया-वाद्य का नाम दे सकते हैं। दूसरे प्रकार के वाद्यों को हम वाद्यों के स्वरूप से ही सामने लाते हैं, उदाहरण के लिए ढोलक, ढाक, मंजीरा आदि।
प्रत्येक क्रिया-वाद्य का अपना एक स्वर होता है जिसको आधार स्वर मानकर बुन्देली जन अनायास गीत गाने लगते हैं। इन सरल एवं सहज ग्रामीणजन को तो स्वर और लय का ज्ञान ही नहीं होता परन्तु प्रकृति एवं पीढ़ियाँ इनके मानस, हृदय एवं संस्कारों में कब प्रवेश कर जाती हैं पता ही नहीं चलता। चक्की चलाते समय, बैलों की चाल पर उनके गले में बँधी घंटी की लय पर, धोबी के कपड़े धोने की आवाज की लय आदि पर बुन्देली जन लोकगीत गाते हैं। जब इसे ग्रामीणजन नियमित लय में बाँध लेते हैं तब इन लोकगीतों का लयात्मक नाद-सौन्दर्य देखते ही बनता है।
‘चक्की’ का लोकवाद्य के रूप में प्रयोग कितना सार्थक है, इसका उदाहरण एक जनश्रुति के रूप में मुझे मिला है-
बुन्देलखण्ड के पन्ना राज्य के राजा अमान सिंह एक बार भेष बदलकर अपने राज्य में प्रजा के हाल-चाल लेने के उद्देश्य से घूमने निकले। एक महिला अपने घर में चक्की चला रही थी साथ ही गा भी रही थी-‘‘ढुंढवा दियो राजा अमान हमाई खेलत बेंदी गिर गई।’’
राजा ने सुना, उन्हें वह गीत बहुत पसन्द आया। राजा ने उस मकान के बाहर एक चिन्ह बनाया और वापस चले आए। सबेरे उन्होंने अपने सिपाही भेजे और कहा कि जिस मकान पर ऐसा चिन्ह बना हो, उस घर की महिला को ले आओ। सिपाही तुरन्त गए और यह मानकर कि इस महिला ने जरूर कोई अपराध किया है, उसे जबरन पकड़ कर ले आए। महिला आते ही गिड़गिड़ाने लगी, बोली ‘‘मराज, हमसैं का गलती भई जो हमैं पकरवा लओ।’’ राजा बोले, ‘‘बाई हमनैं तुमै पकरवाओ? अरे हमनै तो तुमै बुलाओ तो। खैर! इन सिपाइयन सें तो हम बाद खां निपटैं। और बाई गलती तो तुमसैं भई हय। पैलें जा बताइए तैं रातैं का गा रई ती?’’ ‘‘मराज, हम तो फाग गा रए ते।’’ ‘‘अरे फागैं तो हमने बौत सुनी, फागैं तो ऐसी नई गाई जात। जे कितै की है?’’ ‘‘मराज, जा डिड़खरयाऊ फाग आय। एक दायं आपकै इतैं सैं चैतुआ चैत काटबे हमाए उतै ‘उबौरा’ गाँव गए ते। हमाओ आदमी हतो नईं सो हमनै जाय राख लओ और बई के संगैं हम इतै आ गए। जा फाग हमाए उतई ‘बीजौरबाघाट’ के ओरईं की हय, उतई जाको जनम भओ।’’ महाराज बोले ‘‘तो जा बता, तैं हमाओ नाँव लै के काय गा रई ती।’’ ‘‘आंहां मराज! हम आप खों नाँव लै के काय खां गा रए ते।’’ ‘‘काय हमईं तो राजा अमान सिंह हैं।’’ ‘‘मराज, हमैं का पता, हम तो अपएं आदमी खों नाँव लय रए ते। हमाए आदमी को नाँव ‘अमना’ है हमने बाय थोड़ो नैक सुदार लओ और अपएं आदमी से सैंया, बलमा, राजा कत हईं हैं, सो बोई हम गा रए ते।’’
राजा मन ही मन उसके गाने से प्रसन्न तो थे ही और यह बात वह महिला भी समझ रही थी। राजा बोले, ‘‘तोय सजा तो मिलहै।’’ वह बोली, ‘‘ठीकई है मराज, तो जौन सजा दैनी होय हमें मंजूर हय।’’ राजा बोले, ‘‘जौन फाग तैं रातें गा रई ती, बई फिर सैं सुनाउनै परहै। महिला बोली, ‘‘ठीक है मराज तो हमाईयु एक सर्त है-चकिया मंगाउनी परहै, तबही हम गा सगत।’’ राजा बोले, ‘‘काय, का बिना चकिया के तैं नईं गा सकत?’’ ‘‘आंहां मराज, चकिया तो मँगाउनैइ परहै।’’ राजा ने तुरन्त चक्की व अनाज मँगवाया। एक पिछोरा की आड़ की गई। फिर उसने चक्की के स्वर और लय पर वही फाग राजा को सुनाई। राजा बहुत प्रसन्न हुए बोले, ‘‘बाई हम तुमाए गाबैं से बहुतईं खुस हैं। तुम हमाई प्रजा हो, बताओ तुमाई बैंदी काए की हती, हम बाय ढुँढबाबैं की कोसिस करहैं।’’ महिला सहज हो बोली, ‘‘मराज हमाईं बैंदी तो लाख की हती।’’ राजा बोले, ‘‘ठीक है बाई तुम पन्द्रह दिन बाद आइयो हम तुमाईं बैंदी ढुँढवा दैंहैं।’’
पन्द्रह दिनों बाद राजा ने महिला को स्वयं बुलवाया और कहा, ‘‘बाई! हमनै तुमाई बैंदी ढुँढबाबै की बहुतई कोसिस करी। तुमाईं बा लाख की बैंदी तो मिली नहीं, हमने ‘सवा लाख’ की बनवा दई।’’ और राजा ने सवा तोले सोने की बैंदी जिसमें बीच में ‘हीरा’ जड़ा था तथा हीरे के चारों ओर ‘पन्ना’ की रवार लगी थी, उस महिला को भेंट की।

रीडर एवं विभागाध्यक्ष, संगीत,
दयानन्द वैदिक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, उरई

बुन्देली बाल लोक साहित्य में मामुलिया --- डॉ0 हरीमोहन पुरवार



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली बाल लोक साहित्य में मामुलिया
डॉ0 हरीमोहन पुरवार



ज्येष्ठ की तपती दोपहर और उसके बाद असाढ की उमसभरी सड़ी गर्मी, परिवार, समाज के वातावरण को कुछ ऐसा गरमा देती है कि सब कुछ उजड़ा सा हो जाता है और फिर श्रावण में वर्षा की फुहार से सभी का मन-मयूर नृत्य करने लगता है। वर्षा आई और बुन्देलखण्ड की पथरीली भूमि में हँसी-खुशी की एक ऐसी सरिता प्रवाहित होती है जिसकी निर्मल शान्त धारा में परिवार एवं समाज रसमय मधुर एवं प्रेम से सराबोर हो, निर्मल, स्वच्छ वातावरण का सृजन करती है। इसी निर्मल स्वच्छ वातावरण के सृजन में अपनी विशिष्ट भूमिका निभाता बुन्देली ललनाओं का सुप्रिय खेल ‘मामुलिया’ प्रारम्भ हो जाता है।
‘मामुलिया’ के इस खेल में बालिकायें बेर अथवा बबूल की एक कँटीली टहनी लेती हैं और उसे किसी लीप-पोत कर स्वच्छ पवित्र किये हुए स्थान पर रखती है। इस कँटीली टहनी से ही ‘मामुलिया’ की स्थापना होती है और उस समय सभी बालिकायें समवेत् स्वर में गाती हैं-
‘‘छिटक मोरी मामुलिया
मामुलिया के दो दो फूल, छिटक मोरी मामुलिया।
कहाँ लगा दऊं मामुलिया, छिटक मोरी मामुलिया।
अंगना लगा दऊं मामुलिया, छिटक मोरी मामुलिया।’’
कँटीली टहनी की स्थापना के बाद उसका अलंकरण किया जाता है। उस टहनी पर जितने भी काँटे होते हैं उन सब पर तरह-तरह के फूल लगाये जाते हैं और देखते ही देखते उस कँटीली टहनी का कँटीलापन समाप्त हो जाता है और वहाँ मन मोहने वाले विभिन्न प्रकार के पुष्पों की अलौकिक छटा बिखर जाती है। मामुलिया के अंलकरण के समय सभी बालिकायें फूल सजाते गाती हैं-
‘‘ल्याइयो ल्याइयो रतन जड़े फूल, सजइयो मोरी मामुलिया
ल्याइयो गेंदा हजारी के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो चम्पा चमेली के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो घिया तुरैया के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।
ल्याइयो सदा सुहागन के फूल, सजइयो मोरी मामुलिया।’’
जब मामुलिया सज जाती है फिर रोरी अक्षत चन्दन से उसका पूजन किया जाता है। सभी बालिकायें बारी-बारी से जल छिड़क कर, प्रसाद चढ़ाकर पूजन करती हैं और मिलकर गाती हैं-
‘‘चीकनी मामुलिया के चीकने पतौआ
बरा तरें लागली अथैया
कै बारी भौजी, बरा तरें लागी अथैया
मीठी कचरिया के मीठे जो बीजा
मीठे ससुर जू के बोल
कै बारी भौजी, मीठे ससुर जी के बोल
करई कचरिया के करए जो बीजा
करये सासू के बोल
कै बारी भौजी, करये सासू के बोल।’’
पूजन के पश्चात फिर मामुलिया की परिक्रमा करते हुए बालिकायें गाती हैं-
‘‘चली चकौटी चली मकौटी, चंदन चौका करियो लाल
ऊ चौका में बैठे बीरन भइया, पागड़िया लटकावैं लाल
उन पागड़ियन के फूल मुरत हैं, बीनत हैं भौजइयां लाल
झिलमिल झिलमिल दिया बरत है, परखत है भौजइयां लाल
एक रुपइया खोंटो कड़ गओ, मार भगाई भौजइयां लाल।’’
और परिक्रमा करते हुए मामुलिया को हाथ में उठाकर फिर नृत्य प्रारम्भ हो जाता है और लोकवाणी का प्रस्फुटन बालिकाओं की बोली में मुखरित हो उठता है-
‘‘मामुल दाई मामुल दाई
दूध भात ने खायें
बतुरी के धोखे
बिनौरा चबायें।’’
मामुलिया नृत्य के समय कई गीत गाये जाते हैं। एक बानगी इस प्रकार भी है -
‘‘नानों पीसों उड़ उड़ जाय
मोटो पीसों कोऊ न खाय
नई तिली कै तेल, तिलनियां लो लो लो
नये हंडा कौ भात, बननियां लो लो लो।’’
मामुलिया के खेल की समाप्ति के बाद उसे तालाब, पोखर अथवा नदी में विसर्जित करने के लिए सब लड़कियाँ जाती हैं और जल में प्रवाहित करते समय गाती हैं-
‘‘जरै ई छाबी तला कौ पानी रे
मोरी मामुलिया उजर गई।’’
इन पंक्तियों में भारतीय वेदान्त का सार तत्त्व निहित है। जीवन जल के समान है जिसमें नहाकर मामुलिया रूपी आत्मा और अधिक निखर उठती है। मामुलिया विसर्जन के पश्चात सभी लड़कियाँ अपने-अपने घरों को बापस लौटते हुए गाती जाती हैं-
‘‘चंदा के आसपास, गौओं की रास
चंदा के आसपास, मुतियन की रास
बिटिया खेले सब सब रात
चंदा राम राम लेव
सूरज राम राम लेव
हम घरैं चलें।’’
और ये लड़कियाँ आपस में विदाई के समय भी ठिठोली करते हुए गाती हैं-
‘‘चूँ चूँ चिरइयां, बन की बिलैया
ताते ताते माड़े, सीरे सीरे घैला
सो जाओ री चिरैंया
उठो उठो री चिरैंया
तुमाये दद्दा लड़ुआ ल्याये।’’
मामुलिया देखने में बड़ा सहज और साधारण सा खेल दिखता है परन्तु इस खेल का मनोविज्ञान अति सुन्दर है। इस खेल के माध्यम से लड़कियों को जो शिक्षा दी जाती है वह लड़कियों के जीवन को सुखी बनाने एवं समाज में आनन्द की सरिता बहाने का कार्य करती है।
परिवार में, समाज में नित, निरन्तर नयी नयी कठिनाईयाँ, मुश्किलें, परेशानियाँ, उलझने आदि आती रहती हैं। इन सबको काँटों की संज्ञा यदि दे दी जाये तो हम पाते हैं कि मामुलिया में प्रत्येक काँटे को पुष्प द्वारा सजाया जाता है अर्थात् स्त्री अपने व्यवहार, कर्म, आदि से परिवार व समाज की सभी कँटीली समस्याओं को पुष्परूपी समाधानों द्वारा सजाकर, सुखमय, आनन्दमय वातावरण की सृष्टि करती है।
इसी मामुलिया का एक अन्य विश्लेषण भी दर्शनीय है। जब कन्या का विवाह होता है तब उसे यह शिक्षा दी जाती है कि -
‘‘सम्राज्ञी श्चशुरे भव सम्राज्ञी श्रृश्वां भव।
ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषुं।’’
वधू! तुम घर में सास, ससुर, ननद और देवर सबके हृदय की महारनी बनो। सबको अपने प्रेम, सेवा और सद्व्यवहार से जीत लो।
मामुलिया सजाना, मामुलिया सजाने का भाव मन में होना और सजावट का कृत्य करना, यही प्रेम, सेवा और सद्व्यवहार की शिक्षा प्रदान करता है। मनुस्मृति में यही व्यवस्था दी गई है-
‘‘अन्योन्यस्याव्यभीचारा भवेदामरणान्तिकः।
एष धर्मः समासेन ज्ञेयः स्त्री पुसंयो परः।।
अर्थात् स्त्री पुरुष मरणपर्यन्त धर्म, अर्थ आदि में परस्पर अभिन्न होकर रहे। यह स्त्री-पुरुष का श्रेष्ठ धर्म संक्षेप में जानना चाहिए और यही मामुलिया का स्वरूप है। मामुलिया का सत्त्व वास्तव में बड़ा ही प्रेरणास्पद है। इसके विषय में कहा जाता है-
‘‘बीन बीन फुलवा लगाई बड़ी रास
उड़ गये फुलवा रै गई बास।’’
मामुलिया मात्र एक खेल ही नहीं है वह तो सम्पूर्ण सामाजिक अनुष्ठान है। तभी तो कहा गया जाता है-
‘‘मौत में मुसकाबो सिखाबै
सिसकावै सैं छुटकारो गुआवै
जौ मामुलिया कौ अनुस्टान।’’
मामुलिया का भौतिक स्वरूप भी दर्शनीय है। आजकल शहरों के बड़े बड़े ड्राईगरूमों में ‘मामुलिया’ एक सजावट का साधन बनी दिखलाई पड़ती है परन्तु बुन्देली भावनाओं के अनुरूप मानव का प्रकृति के साथ तारतम्य के अनुपम कड़ी के रूप में मामुलिया की प्रतिष्ठा आज भी माननीय है। फूलों को कोटों के ऊपर सजाने की विश्वप्रसिद्ध जापानी कला ‘इकेबाना’ शायद इसी मामुलिया का परिमार्जित स्वरूप है।
इन्हीं सब बातों से मामुलिया का खेल सभी खेलों में सिरमौर हो जाता है। बुन्देली कवि माध्ाौशुक्ल मनोज सागर ने तो यहाँ तक कहा है-
‘‘मामुलिया तोरे आज हिमालय की चिट्टानें दिरकीं
देश की आजादी ने जिन पै खून की बूँदैं छिरकीं
देश की जनता चली बरसने, बदरा वन के मामुलिया
दुश्मन के सिर पै ओरे बन, टपक चली मोरी मामुलिया
मामुलिया तोरे आ गये लिबौआ, ढुड़क चली मोरी मामुलिया।’’
और मामुलिया केवल बालिकाओं के मनोरंजन का साधन ही नहीं बनती बल्कि वह तो समस्त मानव-समाज के लिए प्रेरणा का कारण बनती है।

निदेशक बुन्देलखण्ड संग्रहालय,
बलदाऊ चौक, उरई जालौन

बुन्देलखण्ड का लोकसाहित्य -- अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देलखण्ड का लोकसाहित्य
अयोध्याप्रसाद गुप्त ‘कुमुद’



बुन्देलखण्ड में लोक साहित्य की समृद्ध वाचिक परम्परा है। बुन्देली भाषा की रचनाओं का इतिहास लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। इस सहस्त्राब्दी के कालखण्ड में लोक साहित्य की विभिन्न विधाओं का सृजन और विकास हुआ है। मूल रचनाकारों द्वारा रचा गया साहित्य अपनी प्रासंगिकता तथा लोकाभिरुचि के कारण लोककंठ में बसकर लोक की थाती बनता गया। काल के प्रवाह में लोक की सीमाओं और परिवर्तित परिस्थितियों के परिणामस्वरूप मूलरचना में परिवर्तन होते रहे। इसी लिए विभिन्न स्थानों पर एक की रचना के अनेक पाठान्तर मिलते हैं। लोक साहित्य की इस वैविध्यपूर्ण विरासत में लोकगीत, लोकगाथायें, लोककथायें एवं लोकसुभाषित (लोकोक्तियाँ अर्थात कहावतें, मुहावरे तथा बुझौअल अर्थात पहेलियाँ) सम्मिलित हैं।
लोकगीत
जनमानस अपना उल्लास और कसक लोक गीतों कें माध्यम से व्यक्त करता है। सौन्दर्य, मधुरता, करुणा और वेदना से सराबोर ये गीत सैकड़ों वर्षों की परम्परा में जनमन में इतने बस गये हैं कि किसी को इन गीतों में ‘उत्स’ का पता नहीं होता है। यदि किसी गीत का रचनाकार ज्ञात होता है तो उसे लोकगीत की श्रेणी में परिगणित नहीं किया जाता है।
इन गीतों का लोकत्व यह है कि इनकी अपनी विशिष्टि धुनें यमुना से नर्मदा तक और चम्बल से टौंस तक सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में एक जैसी गायी जाती रही हैं, गायी जाती हैं, और गायी जाती रहेंगी। स्थान दूरी पर होने वाले भाषागत या उच्चारणगत परिवर्तनों के अलावा उनमें कोई विशेष अन्तर नहीं होता है। स्वर, रागरागिनी वही रहती है, केन्द्रीय भाव वही हैं, एक दो पंक्तियों को छोड़कर गीत ज्यों के त्यों मिलते हैं।
यह गीत लिखित में कम, वाचिक परम्परा में अधिक हैं। इस क्षेत्र में सर्वेक्षण करते समय मुझे यह सुखद आश्चर्य हुआ कि यह गीत उन महिलाओं के कंठों में सबसे अधिक सुरक्षित हैं, जिन्होंने न तो पोथी पढ़कर अक्षर ज्ञान पाया और न जो कागज का एक अक्षर बाँच सकती हैं परन्तु उनमें स्मरण शक्ति गजब की है। उन्होंने परम्परा से इसे सुना, सुनकर यदि किया और वे अपनी पीढ़ियों को देने को तैयार हैं किन्तु आज के कथित शिक्षाधारी युवक/युवतियाँ इस सांस्कृतिक विरासत को ग्रहण करने से कतरा रहे हैं। इस विलुप्तोन्मुखी विरासत को जितने शीघ्र लिपिबद्ध, स्वरबद्ध तथा अन्य तरीकों से संरक्षित किया जा सके वह लोक संस्कृति के हित में है।
बुन्देलखण्ड में घर-घर होने वाले पारिवारिक समारोह तथा मांगलिक आयोजन इन्हीं गीतों और संगीत के साथ आयोजित होते हैं। हृदय की कोमल भावनायें इन गीतों में सहजता के साथ व्यक्त हुई हैं। इस क्षेत्र में प्राप्त लोकगीतों को निम्न कोटि में विभाजित किया जा सकता है -
1 देवी देवताओं के पूजा विषयक गीत
2. संस्कार गीत

3. बालक/बालिकाओं के क्रीड़ात्मक उपासना गीत

4. ऋतु विषयक गीत

5. शृंगार गीत

6. श्रमदान गीत

7. जातियों के गीत

8. शौर्य /प्रशस्ति गीत

9. स्फुटगीत


देवी-देवताओं के पूजा विषयक गीत
बुन्देलखण्ड आस्था और भक्ति का प्रदेश है। यहाँ आदर्शों के प्रति आस्था ने लाला हरदौल जैसे मनुष्य को देवत्य प्रदान किया है। विष पीकर भी भावज के चरित्र की निष्कलंकता उन्होंने प्रमाणित की, बहिन की याचना की रक्षा की और इसने उन्हें अमरत्व दिया। हरदौल यहाँ के लोकदेवता हैं। गीत हर विवाह का मांगलिक कार्य में गाये जाते हैं। हनुमान जी पवन के पुत्र हैं, आँधी-अंधड़ से विनाश को रोकने वाले हैं, उनकी निर्विध्नता के प्रति यह आस्था लोकगीतों में मुखरित हुई है। राम और कृष्ण तो यहाँ घर-घर बसे हैं। हर कार्य अवसर पर उनकी पूजा का विधान है, उनके जीवन का अनुरक्षण है। कार्तिक-स्नान पर्व में महिलायें उनके चरित्र विषयक गीत प्रभात बेला में झुण्डों में निकलकर गाती है।
महिषमर्दिनी माँ दुर्गा तथा शारदा यहाँ की अधिष्ठात्री हैं। महिषासुर को लोकभाषा में मइखासुर या मइकासुर भी कहते हैं। उनका मर्दन करने वाली माँ यहाँ विपत्तियों से रक्षा के लिए विशेष पूज्य हैं। देवी के प्रति यह आस्था ‘अचरियों’ में व्यक्त होती हैं। अचरियाँ धुनों के आधार पर छह प्रकार की मिलती हैं। झूला की अचरी, शब्द बानी, (भजन) डंगइया, अमान, जिकड़ी तथा माँ वाली अचरी। शारदीय तथा बासंतिक दोनों नवरात्रियों में हर गाँव नगर अचरियों के इस मंगल गायन से भक्तिमय हो जाता है।
अचरियाँ केवल दुर्गा माँ की ही नहीं, सीता माँ, राधाजू, कालका माँ और उनके आगे चलने वाले भैरव बाबा की भी मिलतीं हैं। इसी क्रम में लांगुरिया गीत आते हैं।
शक्ति पूजा में ‘माई का मार्ग’ पूजने का विधान है। इस पूजा में शक्ति और गणेश के ‘मायले’ गाये जाते हैं। कारसदेव की गोटें भी पशुरक्षा की पूजा में कथा के रूप में गाई जाती हैं। इन गीतों पर पुरुषों तथा महिलाओं का समान अधिकार है। ‘कार्तिक गीत’ केवल महिलायें गाती हैं। गोटें केवल पुरुष गाते हैं।

संस्कार गीत
बुन्देलखण्ड का लोक जीवन सुसंस्कृत है। हिन्दू शास्त्रों में वर्णित सभी संस्कार यहाँ विधिविधानपूर्वक करके जातक (व्यक्ति) को संस्कारित किया जाता है। यह मांगलिक संस्कार संगीत की लय और ताल पर लोकगीतों के साथ होते हैं। संस्कार निम्नलिखित हैं-
1 गर्भाधान संस्कार
2 पुंसवन संस्कार

3 सीमन्तोन्नयन (सीमन्त संस्कार)
4 जातकर्म संस्कार

5 नामकरण संस्कार
6 निष्क्रमण संस्कार

7. अन्नप्राशन संस्कार
8. चूड़ाकर्म संस्कार

9. वेदारंभ संस्कार
10. उपनयन संस्कार

11. कर्णवेधन संस्कार
12. समावर्तन संस्कार

13. विवाह संस्कार
14. वानप्रस्थ संस्कार

15. संन्यास संस्कार
16. अन्त्येष्टि संस्कार


उक्त संस्कारों में प्रथम तीन जन्म-पूर्व के हैं। अतः इनके अन्तर्गत माता का संस्कार किया जाता है। शेष संस्कार जन्मोपरान्त जातक के किये जाते हैं। किसी माता की कितनी भी संतानें हों, उसका संस्कार प्रथम संतान होने के पूर्व होता है। परवर्ती संतानों के होने पर माता के यह संस्कार नहीं कराये जाते हैं। इन सभी संस्कारों के अवसर पर अनेक प्रकार के लोकगीत गाये जाते हैं। यह गीत प्रायः महिलायें गातीं हैं। अन्य लोकवाद्यों के साथ ढोलक का प्रयोग प्रचुरता के साथ होता है।
महत्वपूर्ण तथ्य है कि इस क्षेत्र में राम और कृष्ण का प्रभाव इतना व्यापक है कि अधिकांश संस्कार राम-सीता और राधा-कृष्ण के जीवन प्रसंगों पर आधारित हैं। हर परिवार में जन्मा बालक ‘राम’ या ‘नंदलाल’ होता है और कौशल्या या जशोदा की कोख से जन्मता सा लगता है। उसके जन्म पर वही उल्लास और हर्ष पाया जाता है जो कभी अवध और ब्रज में छाया था। यह कहा जा सकता है कि इन संस्कारों में लोक-गायन के क्षणों में बुन्देली धरती पर ब्रज और अवध उतर आता है।
अनेक संस्कार कर्मकाण्डी पण्डितों के बजाय कोकिलकण्ठी महिलाओं के पावन स्वरों से अभिसिंचित होते हैं। आश्चर्य यह है कि इन गीतों के गायन में रुचि रखने वाली महिलायें और पुरुष निरक्षर या अल्पशिक्षित हैं किन्तु यह लोकगीत उनकी स्मृतियों में इस तरह बस गये हैं कि पढ़े लिखे व्यक्तियों की स्मरण शक्ति पराजित हो जाती है। आप सिर्फ उनके तार छेड़ दीजिए फिर उनके बोल अपने आप फूट पड़ेंगे। स्मृतियों की यह अविचल और लोक व्याप्त परम्परा ही लोक संस्कृति को जीवित रखे हैं। इन संस्कारों गीतों में आधार-विधान भी व्यक्त होता चलता है।

बालक-बालिकाओं के क्रीड़ात्मक-उपासना गीत
बालक-बालिकाओं में प्रारम्भिक अवस्था में ही जीवन-यात्रा की दीर्घकालिक तैयारी, कला और संगीत के प्रति अभिरुचि सौन्दर्य बोध का विकास, संघर्ष के साथ भी मृदुल समरसता एवं समृद्धि का समन्वय तथा जीवन के अनेक भावी कार्यों के क्रीड़ात्मक ढंग से प्रशिक्षण की भावना से कुछ खेल बुन्देली लोक जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन गये हैं। इनमें अकती तथा सुआटा विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
अकती, अक्षय तृतीया के रूप में पूरे देश में पूजित है किन्तु उस दिन बुन्देली बालक-बालिकाओं द्वारा कलात्मक ढंग से बनाई गई पुतरा पुतरियाँ सौन्दर्य बोध, सृजन-क्षमता, कलाप्रियता का अद्भुत उदाहरण है। आजकल ‘डॉल मेकिंग आर्ट’ का फैशन आ रहा है किन्तु बुन्देलखण्ड में यह कला युगों-युगों से विकसित हो चुकी है। इस अवसर पर अक्ती के गीत गाये जाते हैं-वे विवाहोन्मुख कुमारियों की सलज्जता, शालीनता तथा प्रिय के प्रति सर्वाधिक अनुराग का प्रतिबिम्बन करते हैं।
सुआटा एक दीर्घकालिक क्रीड़ात्मक उपासना विधान है। यह भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन पूर्णिमा तक चलता है। मामुलिया, नौरता सुआटा, टेसू तथा झिंझिया के पाँच अंगों से समन्वित यह खेल बालकों में उनकी कल्पनाशीलता विकसित करने, प्रकृति के प्रति अनुराग उत्पन्न करने, सौन्दर्य बोध तथा कला प्रेम बढ़ाने का उपक्रम है। बेर की कँटीली टहनी को भी नारी के रूप में सजाने का प्रयास-जापान के इकेबाना की शैली का है। इसमें काँटे, फल और फूल संघर्ष, सृजनात्मक उपलब्धि तथा अनुरागात्मक माध्यम का प्रतीक है। एक ओर यह खेल प्राचीन कथा पर आधारित है, जिसका पुष्ट ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता है, दूसरी ओर यह अंधविश्वासों में जकड़ी मान्यताओं की ओर संकेत करता है। यह बुन्देलखण्ड का विशिष्ट लोकोत्सव है। इसमें लोकगाथात्मक तथा सामान्य, दोनों प्रकार के गीत मिलते हैं।

ऋतु विषयक गीत
लोक जीवन में हर मौसम का अपना आनन्द है...बरसात, जाड़ा, फगुनाई भरा बसंत या ग्रीष्म; हर माह के अपने त्यौहार हैं, अपने सुख-दुख हैं। सावन तो बहिनों का माह है, बहिनों के लिए भाई की प्रतीक्षा का माह। बहिन की हर टकटकी भाई के आने की बाट जोहती है। घर के बाहर या बाग बगीचों में झूलों पर पैंगें मारती बहिनों को भी अपना परदेश में रहना अखरता है। वे भाई के आगमन की प्रतीक्षा करती हैं।
फागुन प्रेम का उत्कर्ष काल है। बसंत की बहार, फगुनाई का मौसम एक विशेष भावोद्रेक करता है। बुन्देलखण्ड में हर स्थान पर फागें और रसिया गाने का रिवाज है। यह फागें शृंगार और आध्यात्मिकता का अद्भुत काव्य हैं। फागें छन्दयाऊ, खड़ी तथा चौकड़ी तीन कोटियों में विभक्त होती हैं। इन संवेदनाओं से जुड़े गीत मनोरम होते हैं।

शृंगार गीत
बुन्देलखण्ड के लोक साहित्य में शृंगार की समृद्ध परम्परा है। मनोभावों की सरस अभिव्यक्ति इन गीतों में हुई है। ये गीत तन्मयता का अद्भुत उदाहरण हैं। बुन्देली बालायें अपने प्रिय के साथ इतनी तन्मय हैं कि उन्हें ‘भुनसारे चिरैयों’ का बोलना प्रेम में व्यवधान लगता है।
नारी नहीं चाहती है कि उसका प्रिय किसी और को चाहे। कुँए पर, बाग में, चौपर में वह हर स्थान पर प्रिय के साथ रहना चाहती है। वह तो ढिंमरिया और मलिनियाँ तक बनने को तैयार है। पारस्परिक समर्पण का कैसा भावपूर्ण संयोग है-‘नजरिया मोई सों लगइयों।’
प्रेम आर्थिक सीमायें नहीं देखता। वह गरीब है तो क्या हुआ? वह अपने पति को संदेश भेजना चाहती है। कागज, स्याही और कलम नहीं तो छिंगुरिया को कलम बनाकर संदेश भेजने को व्याकुल रहती है। उसकी इच्छा है कि वह भी ‘लिखदऊं दो दस बोल’। प्रेयसी कितनी आशावान और मानिनी है उसे प्रिय के आगमन से खेतों में दूबा हरी होती दिखती है, रीते कुँआ भरते नजर आते हैं। यह प्रतीक विलक्षण है। वह मोतियों का चौक पूरकर और स्वर्ण कलश की मांगलिकता के साथ प्रिय का स्वागत करने को उत्सुक है।
यहाँ की नारी अपने पति को परेशान नहीं देखना चाहती है। चाहे वह अपनी लाखों की इज्जत गिरवी रख दे किन्तु सीधेपन के कारण कोई उसके पति को परेशान न करे। यह बुंदेली बाला का आदर्श ‘जो ररिया हमसे कर लेऔ’ गीत में व्यक्त हुआ। नायिका प्रिय के लिए जो खेत में कृषि कार्य कर रहा है, कलेवा लेकर जाती है किन्तु उसकी तन्मयता इतनी है कि उसे कलेवा देखने की फुरसत नहीं। यहाँ नायिका की अधीरता दृष्टव्य होती है।
बुन्देलखण्ड में महिलायें बाँहों में ‘गोदना’ गुदवाकर तथा हाथों में मेंहदी रचाकर सौन्दर्य वृद्धि करती हैं। गोदना गुदवाने में बड़ी पीड़ा होती है किन्तु सुन्दर बनने की ललक उन्हें यह करने को भी मानसिक रूप से तैयार करती है। इस पीड़ा को कम करने में गुदना गीत सहायक होते हैं।

श्रम के गीत
व्यक्ति चाहे हल चलायें, बुआई करें, फसल काटें, कोल्हू में तेल पेरंे या चक्की पीसें, इन क्षणों में उसकी तन्मयता के लिए गीत सहायक होते हैं। स्वरलहरी में तन्मय होकर वह अपनी थकान भूल जाता है। इन्हीं व्यस्त क्षणों में, खेती में, कटाई या अन्य कृषि कार्य करते समय, बिलवारी तथा दिनरी और महिलाओं द्वारा चक्की पीसते समय ‘जंतसार’ के गीत लोकजीवन में रच-बस गये हैं। इनकी अपनी धुनें हैं और अपनी संगीतात्मकता।

जातियों के गीत
विभिन्न जातियों, विशेषकर अति पिछड़ी जातियों में विभिन्न अवसरों पर गाये जाने वाले अपने लोकगीत तथा उनकी लोकधुनें हैं। उन्हें उनके जातिगत गीत या गारी के नाम से जानते हैं। यथा-ढिमरियाऊ गारी, कछियाऊ गारी, धुवियाऊ गारी, गड़रियाऊ गारी, कहरवा (कहार गीत) आदि। इन जातियों के लोग प्रायः अपने पारम्परिक लोकगीतों, गोटें आदि को न तो लिपिबद्ध करने देते हैं और न उन्हें रिकॉर्ड करने देते हैं। सर्वेक्षकों द्वारा आग्रह करने के बावजूद उसे लिपिबद्ध कराने को तैयार नहीं होते हैं। उनकी मान्यता है कि ऐसा करने से कारसदेव नाराज हो जायेंगे किन्तु उन्हीं जातियों के शिक्षित या शोधोन्मुख युवक-युवतियों के माध्यम से वे गीत प्रकाश में आ रहे हैं।

शौर्य/प्रशस्तिगीत
समकालीन महापुरुषों ऐतिहासिक पात्रों, आंचलिक ख्याति के व्यक्तियों की प्रशंसा में अथवा उनके शौर्य को बखानते हुए अनेक गीत मिलते हैं। यह गीत शौर्यपरक होने पर रासो परम्परा में गिने जाते हैं। राछरे तथा पंवारे बुन्देलखण्ड में गाये जाने वाले ऐसे ही लोकगीत हैं। इनमें कथात्मक गीतों को तकनीकी दृष्टि से लोकगाथा की श्रेणी में गिना जाता है।

स्फुट गीत
इसके अतिरिक्त विविध विषयों पर जो गीत मिलते हैं उन्हें इस श्रेणी में रखा जा सकता है।

लोकगाथायें
लोक जीवन में लोकगाथायें बड़े प्रेम और तन्मयता से गाईं तथा सुनीं जाती हैं। ये कथापरक गीत होते हैं। इनमें कहानी गीत के माध्यम से आगे बढ़ती है। इस प्रकार लोकगाथाओं को इतिवृत्तात्मक लोक काव्य कहा जा सकता है। इनका आकार सामान्य लोकगीतों से अधिक बड़ा होता है। अनेक लोकगाथायें तो महाकाव्य की भाँति 600-700 पृष्ठों में मिलती हैं। आल्हा बुन्देलखण्ड में गायी जाने वाली सर्वप्रिय लोकगाथा है। जगनिक ने जब आल्हखण्ड लिखा होगा तब वह सीमित पृष्ठों का रहा होगा किन्तु समय की गति के साथ गायकों ने उसमें क्षेपक जोड़कर उसे इतना विस्तृत कर दिया कि खेमराज श्रीकृष्ण दास द्वारा प्रकाशित आल्हखण्ड 940 पृष्ठों में छपा है किन्तु बुन्देलखण्ड क्षेत्र में गाया जाने वाला आल्हा उससे भी बृहत् है। इसमें आल्हा ऊदल द्वारा लड़ी गई 52 लड़ाइयों की विस्तृत कहानी है। बरसात के दिनों में कृषि कार्य से निश्चिन्त होकर ग्रामवासी हर गाँव में आल्हा गाते सुनते मिल जायेंगे। कई लोकगाथायें छोटे आकार में भी मिलती हैं।
बुन्देलखण्ड की प्रमुख लोकगाथाओं में, अमान सिंह की राछरा, प्रान सिंह का राछरा, जागी का राछरा, भरथरी, सरवन गाथा, सीताबनवास, सुरहिन गाथा, हरिश्चन्द्र गाथा, सन्तवसन्त की गाथा, रमैनी आदि चालीस से अधिक लोकगाथायें प्राप्त होती हैं।

लोककथायें
लोक कथायें लोक जीवन का अभिन्न अंग है। घर के भीतर बूढ़ी महिलायें या मातायें परिवार के बच्चों को रात में कहानियाँ सुनाती हैं। घर के बाहर चौपालों मंे अग्नि जलाकर अलाव के सामने कहानियाँ सुनाने की परम्परा है। प्रत्येक व्रत, त्योहार या पूजन के समय पंडित जी या परिवार की वरिष्ठ महिलाओं द्वारा कहानियाँ कही जातीं हैं। यह सभी कहानियाँ लोक कथा के रूप में जानी जाती हैं। इनमें पौराणिक प्रसंगों से लेकर उपदेशपरक तथा मनोरंजक कथानक होता है। कई कथायें तिलस्म या रोमांच से भरपूर होती है। अनेक में लड़ाइयों का विवरण होता है। अधिकांश में समाज कल्याण का जीवंत चित्र बड़ी स्वाभाविकता के साथ बखाना जाता है।
इस क्षेत्र की लोक कथाओं के संकलन तथा अध्ययन से इस क्षेत्र के सामाजिक परिवेश का पूरा चित्र समझा जा सकता है। व्रतकथाओं का विषय प्रायः यह होता है कि अमुक ने यह व्रत किया तो उसे क्या लाभ हुआ? अमुक ने नहीं किया तो उसे क्या कष्ट सहना पड़ा? इस प्रकार वे कथा सुनने वालों को व्रत तथा धार्मिक आचरणों के प्रति आकृष्ट करने वाले होते हैं। घर के भीतर बच्चों को सुनाई जाने वाली या अलाव पर कही जाने वाली लोक कथाओं की विशेषता यह है कि उनमें मर्यादित शब्दावली में ज्ञानवर्द्धक सामग्री प्रचुर मात्रा में मिलती है। कहानियों के अंत में लोकमंगल की भावना इन शब्दों में व्यक्त होती है -
‘जैसी भगवान ने इनकी सुनी, तैसी सबकी सुनै’, ‘सबकौ भलौ करै’, ‘सुख में रख्खै’ और ‘दूधन भरौ, पूतन फरौ’ आदि। इन लोककथाओं को कहने के पूर्व उनकी भूमिका भी बड़े रोचक ढंग से प्रस्तुत की जाती है।

लोकसुभाषित
लोकोक्तियाँ
बुन्देलखण्ड निवासियों का वाग्चातुर्य यहाँ प्रचलित लोकोक्तियों, मुहावरों तथा बुझौअलों (पहेलियों) में झलकता है। किसी भी सुन्दर कथन के लिए सूक्ति या सुभाषित शब्द का प्रयोग मिलता है। जब यह सूक्ति या सुभाषित लोकव्याप्त होकर जन-जन में प्रचलित हो तो उसे ‘लोकोक्ति’ कहते हैं। इन लोकोक्तियाँ की सबसे बड़ी विशेषता संक्षिप्तता होती है, जिसमें बड़ी से बड़ी बात को कम शब्दों में कहने का सामर्थ्य है। इनमें गागर में सागर भरा है।
यह कहावतें ग्राम्य-कथन या ग्राम्य-साहित्य नहीं हैं। यह लोकजीवन का नीतिशास्त्र हैं। यह संसार के नीतिसाहित्य का विशिष्ट अध्याय हैं। विश्व-वाड़गमय में जिन सूत्रों को प्रेरक, अनुकरणीय तथा उद्धरणीय माना गया है, उनका सार प्रकारान्तर से इनमें मिल जायेगा। समान अनुभव से प्रसूत इन कहावतों से अधिकांश सूत्र सार्वभौमिक सत्य होते हैं। कुछ सूत्र स्थानीय या आंचलिक वैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते हैं।
यह कहावतें जनमानस के लिए आलोक स्तम्भ हैं। इनके प्रकाश में हम जीवन के कठिन क्षणों में लोकानुभव से मार्गदर्शन प्राप्त कर सफलता का मार्ग ढूढते हैं। यह वह चिनगारी है जिनमें अनन्त ऊष्मा है जो जनमानस को मति, गति और शक्ति प्रदान करती है। हम किसी भी प्रसंग की चर्चा छेड़ दें, उससे जुड़ी कहावतें लोगों की जुबान पर आ जाती हैं। यही इनकी लोकव्याप्ति का प्रमाण है। इन्हें पढ़कर इनके गढ़ने वालों की सूझबूझ, सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता तथा वाक्विदग्धता पर आश्चर्य होता है। वे सचमुच जीवनदृष्टा थे।
यह कहावतें नदी के उन अनगढ़ शिलाखण्डों की तरह हैं जो युग युगान्तर काल के प्रवाह में थपेड़े खा-खाकर शालिग्राम बन शिवत्व को प्राप्त करते हैं। इनमें लोक का बेडौलपन है, छन्दों की शास्त्रीयता नहीं है तथापि इनमें काव्य का सा सहज प्रवाह है, वे सहज स्मरणीय हैं।

बुझौअल
सांकेतिक ढंग से रहस्यात्मक बात कहना तथा दूसरे से पूछना और सही अर्थ जानना, यह बुन्देली में बुझौअल कहलाता है। बुझौअल बूझने (पूछना) से बना है। यह संस्कृति के प्रहेलिया शब्द का पर्यायवाची है। हिन्दी या अन्य लोकभाषाओं में इसे पहेली भी कहते हैं।

मुहावरे
वाक्य को आकर्षक एवं चुस्त बनाने के लिए विलक्षण अर्थपरक वाक्यांश प्रयोग करते हैं, यह मुहावरे कहलाते हैं। मुहावरेदार भाषा का प्रयोग व्यक्ति की विद्वता तथा वाग्चातुर्य का प्रतीक है। यह वाक्य का अंश होता है, अतः इसका स्वतंत्र प्रयोग नहीं किया जा सकता है किन्तु किसी वाक्य में यथोचित स्थान पर रख देने से उसका अर्थ महत्व बढ़ जाता है। बुन्देली लोकजीवन में मुहावरों का प्रयोग बहुतायत में होता है।
इस प्रकार बुन्देलखण्ड का लोक साहित्य बहुआयामी है तथा हमें इसमें बुन्देलखण्ड की संस्कृति के विविध पक्षों की झलक देखने को मिलती है। सांस्कृतिक अनुशीलन हेतु यह महत्वपूर्ण आधारभूत सामग्री है।

मण्डपम्, राठ रोड, उरई (जालौन)

Thursday, July 15, 2010

बुन्देली काव्य में सामाजिक यथार्थ



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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आलेख --- बुन्देली काव्य में सामाजिक यथार्थ
डॉ0 अवधेश चंसौलिया



बुन्देली भूभाग के अन्तर्गत विशेष रूप से उत्तर प्रदेश के झाँसी, हमीरपुर, जालौन, ललितपुर एवं बाँदा जिले और मध्य प्रदेश के दतिया, टीकमगढ़, पन्ना, छतरपुर, दमोह, सागर जिले सम्मिलित किये गये हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के ये सभी जिले विकास की दृष्टि से अभी भी पिछड़े हुए हैं। सड़क, जल और बिजली की दृष्टि से ही नहीं अपितु शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक दृष्टि से भी यह क्षेत्र अभी भी विकास से कोसों दूर हैं। आज भी यहाँ पूँजीवादी और सामन्तवादी प्रथा का बोलबाला है। निर्धनता और अभावों के कारण यहाँ के बीहड़ डाकुओं की शरणस्थली बने हैं।
शिक्षा के अभाव के कारण अत्याधुनिक युग में भी यहाँ के लोग अंधविश्वासों, कुरीतियों, परम्पराओं एवं बुराइयों के पोषक हैं। आपसी ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ एवं प्रतिकार की भावना के कारण लोग अपने एवं दूसरों के जीवन को नाटकीय बनाये हुए हैं। निर्धनता को भाग्य मानकर स्वीकार करने वाले ये लोग आगे बढ़ने का प्रयास ही नहीं करते। निर्धनता और अभावग्रस्त जीवन का यह सिलसिला जगनिक काल से ही चला आ रहा है। पृथ्वीराज चौहान एवं महोबा के सम्राट परमाद्रिदेव के युद्ध में बुन्देलखण्ड के किसानों की फसल तो बर्बाद होती ही थी, युद्धों के कारण साधारण जनजीवन भी प्रभावित होता था। जगनिक कहते हैं कि पृथ्वीराज की सात लाख सेना ने महोबे पर आक्रमण कर दिया।
‘‘ऐसो समय परौ महुबे पै विपदा कछू कहीं न जाये।
X X X X
रोबे रैयत चन्देलों की, हा हम कौन देश भग जाये।’’1
ईसुरी के समय भी कामोवेश यही स्थिति थी। युद्ध तो इतने नहीं थे परन्तु प्राकृतिक उत्पात कम नहीं थे-
‘‘पर गये एई साल में ओरे कऊँ भौत कऊँ थोरे,
कैसे जिये गरीब गुसइयां छिके अन्न के दौरे।’’2
इतना ही नहीं कभी फसल को ‘गिरुआ रोग’ लग जाता है तो कभी ओले से पकी पकाई फसल नष्ट हो जाती है। हाँ ईसुरी के अनुसार सम्वत 1956 में जरूर बुन्देलखण्ड में तिली की भरपूर पैदावार हुई थी, लेकिन जिन लोगों ने उस समय तिली बोई थी उन्हीं को लाभ हुआ था। यहाँ आज भी लाखों लोग भूमिहीन हैं। उन्हें तो हमेशा ही अकाल जैसा सामना करना पड़ता है। जो छोटे-छोटे किसान हैं वे प्रकृति के अधीन हैं। सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था अभी तक नहीं हो पायी है। यहाँ का किसान सदैव डरा सहमा और संशयग्रस्त रहता है क्योंकि
‘‘स्यारी में सूखा पर गऔ तो, ऊ में कछू न पाओ।
बीज साव को धरौ चुकावे दानों लैन आओ।’’ 3
उसे ऋण की चिंता तो है ही साथ ही चिंता है रमकुइया की शादी की। छितिया के चलाव को साल भर हो गया, पत्नी को ब्लाउज नहीं बनवा पाया, स्वयं की धुतिया फट गयी है, लड़के को बुखार चढ़ा है, रोटी मिल गयी तो दाल नहीं है और यदि दाल मिल गयी सो रोटी नहीं है, ऐसी करुण कहानी है बुन्देलखण्डियों की। इन सब दुर्दशाओं के बावजूद इन लोगों में गजब का आत्मसंतोष है, स्वाभिमान है-
‘‘अधर दुफर लौं जौ मिल जावै रूखी सूखी खाई।
X X X X
सादा गाँव के जीवन से भरपूर से रहौं’’4
सामन्तशाही कागजों पर तो समाप्त हो गयी लेकिन अब वह नवीन रूप धारण करके और भी विद्रूप और विकराल हो गयी है। मंत्री, नेता, अफसर, पुलिस एवं धनिक वर्ग ये नये युग के सामन्ती चेहरे हैं। ये सब मिलकर आमजन का शोषण कर रहे हैं। ये लोग डकैतों के पोषक हैं। इनके अत्याचारों के कारण ही लोग विद्रोही होकर डाकू बन जाते हैं। रानी लक्ष्मीबाई ने ‘बरजोरा डाकू’ का हृदय परिवर्तित कर अपनी फौज में सम्मिलित कर लिया था और वह अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ा। बिनोवाजी व जयप्रकाशजी ने भी यहाँ के डाकुओं को समाज की धारा में बापस मोड़ने का सराहनीय प्रयास किया लेकिन आधुनिक प्रजातंत्र के जननायक उनसे बूथ कैप्चरिंग कराते हैं, विरोधियों का दमन कराते हैं, उन्हें हथियार प्रदान करते हैं। नेता, अफसर और ठेकेदारों के गठजोड़ ने भ्रष्टाचार को चरम पर पहुँचा दिया है। इस भ्रष्टाचार के कारण बुन्देलखण्ड का विकास जितना और जिस तेजी से होना चाहिए था, नहीं हो रहा है। फलतः अभी भी गरीबी का साम्राज्य है। इसी कारण प्रजातंत्र से लोगों का विश्वास उठ गया-
‘‘प्रजातंत्र धोखो लगै, इंदु कैवे चोखी।
माटी मिलौ सुदेश मर रई जनता भूखी।’’5
इसी तरह-‘‘भूखी सब जनता मरै, नेता गोल मटोल।
चींथ चींथ के देश खों, करतई पोलम पोल।’’6
वर्तमान में मूल्यों का हृस बहुत तेजी से हो रहा है। दहेज की भयावहता जग जाहिर है- ‘‘काट रओ दहेज को बिच्छू, पीड़ित हो रओ सकल समाज।’’7
शोषण और अत्याचार की चक्की में तो यहाँ की जनता युगो-युगों से पीसी जा रही है यथा-
‘‘तुरकन ने तिली सी अकोर लई, गोरन ने गगरी सी बोर लई।
अब अपने भारत के भैंयन ने परजा कों बिरिया सो झोर लई।
दओ उसेय पुलिस की पतीली ने,
लओ उधेर मुंसफी तसीली ने,
लील्हे सब लेत हैं किसानई कों
चींथ खाव जजी ने बकीलों ने।
मका जैसी अड़िया बिचोर लई, सहद की छतनियां सी टोर लई।’’8
डाकूग्रस्त क्षेत्र होने से यहाँ के कवियों का ध्यान इस समस्या की ओर कुछ अधिक ही गया है। यहाँ के लोग सदैव ही बन्दूकों और संगीनों के साये में दहशत भरी जिंदगी जीने पर मजबूर रहे हैं-
‘‘गैल गैल अब सो बिछी है बारूरी रेत
बन्दूकन के गाँव हैं, कारतूस के खेत।
करत डाकुअन कों सदा कारतूस जो सैल,
बेई बनत अब गाँव में मुखिया पंच पटैला।’’9
वर्तमान राजनीति ने समाज को वोटो की खातिर जातियों और वर्गों में विभाजित कर दिया है। चुनावों में इसी कारण हिंसा होने लगी है। एक साथ रहने वाला बुन्देली समाज अब पार्टियों में बंट गया है। बुन्देली कवि ने इस भाव को इस प्रकार व्यक्त किया है-
‘‘हिरकन लगत हुलास जब, बढ़न लगत है हेत।
वोट बैंक की मिसमिसी रंत भौर कर देत।’’10
नेताओं ने वोट तो लिए परन्तु उनकी आर्थिक बदहाली पर कोई ध्यान नहीं दिया। यहाँ के अनपढ़ और गरीब लोग अपना वोट, केवल एक बोतल देशी शराब में या धोती में दे देते हैं। वे अभी भी भूमिहीन हैं और मजदूरी करने हेतु अभिशप्त हैं -
‘‘भुंसारे से गये खेतन में सइयां करन मजूरी।
एक मेंड़ कोऊँ मोनो होती, इच्छा होती पूरी।’’11
उन्हें मजदूरी भी सरकारी दरों के अनुसार नहीं मिलती, कुछ लोग थोड़ा सा दे देते हैं, तो कुछ लोग यों ही बेगार करा लेते हैं। बेरोजगारी का यह आलम हैं कि -
‘‘बारा-सोरा पास सड़क पै लगे मंजूरी कर रए।’’12
चुनावी घोषणाओं में नेता लोग भूमिहीनों को भूमि देने की लम्बी-लम्बी बातें करते हैं परन्तु सत्ता में आते ही वे सब वायदे भूल जाते हैं। यदि भूमिहीनों को जमीनें मिलती भी हैं, वे बंजर होती हैं या प्रभावशाली लोगों के कब्जे वाली होती हैं। अतः इस तरह उस जमीन का कोई मतलब नहीं होता। भूमिहीनों की इस भावना को कविता में इस तरह व्यक्त किया गया है-
‘‘एक बनी कानून सनत तें सब खों खेती मिल जै,
हम खों मिल जै एक टपरिया करम हमाओ खुल जै।
सिरकारउ की झूठी बातें का विश्वास करूंरी।’’13
बढ़ती हुई मंहगाई भूमिहीनों के लिए कोढ़ में खाज सिद्ध हो रही है, मंहगाई के कारण स्थिति यह हो गयी है कि-
‘‘उतै लगत अब एक रुपइया जितै लगत ती पाई।
काँ की होरी काँ को होरा? कलयुग परौ सबई पै तोरा।
X X X X
दार उधार मुहल्ला भर की, अब नौ नई चुकाई
काँसे लै आवैं तिरकाई।’’14
इस मंहगाई और गरीबी के कारण लोगों में हताशा का भाव घर कर गया है। ऊँच-नीच, छुआ-छूत और असमानता के कारण लोगों में ईर्ष्या, द्वेष, डाह, बैर के भाव जाग्रत हो गये हैं। डाकुओं से मिलकर लोग विरोधियों का अपहरण करा रहे हैं, डकैती डलवा रहे हैं और दूसरे के दुख से प्रसन्न हो रहे हैं जबकि पहले ऐसा नहीं था। अब मूल्यों का हास तेजी से हो रहा है अब वातावरण बहुत विषाक्त हो गया है-
‘‘अब कौनऊ नइँ पूंछतई, इक दूजे की खैर
कुलियन कुलियन में मिलै, द्वेष ईर्ष्या बैर।
फँसे लोभ लालच सबई, नईं इच्छन को अंत
अफसर नेता चोर है, आज देश के संत।’’15
बुन्देलखण्ड में आज भी हरिजन सवर्णों के सामने अपनी खटिया पर नहीं बैठ सकता, उनके समक्ष जूते नहीं पहन सकता। बहुत से गाँवों में यह स्थिति अभी भी है-
‘‘हरिजन जिनको कहत खाट पै अभऊँ न बैठे,
बैठें तो मुखिया कों, देखत तुरतई उठ बैठें,
नई उठें तौं रामइँ जानै कित्ते जूते परे।’’16
पुलिस के अत्याचार ऐसे हैं कि जिनके यहाँ डकैती पड़ती है, पुलिस उसी को पकड़ कर उस पर डकैतों को आश्रय देने का इल्जाम लगाकर बंद कर देती है -
‘‘बा दिन देखी नई गाँव में गई डकैती पर,
जिन पै परी उनई को उल्टे लै गई पुलिस पकर।’’17
यह इस स्वतंत्र भारत के बुन्देलखण्ड की तस्वीर है। यह संयुक्त बुन्देलखण्ड आज भी उसी सामन्ती मानसिकता में जी रहा है। विकास का, शिक्षा का, समानता का यहाँ नामोनिशान नहीं है। इन सब सुविधाओं का लाभ केवल एक वर्ग विशेष तक ही सीमित रह गया है। सामान्य-जन आज भी बदहाल है। बुन्देलखण्ड को स्पेशल पैकेज देकर इसकी समस्यायें नहीं सुलझ सकती। इसकी समस्या का समाधान पृथक बुन्देलखण्ड राज्य बनने पर ही होगा।

संदर्भ-

1. सं0 कैलाश मड़बैया, बुन्देली के प्रतिनिधि-कवि, मनीष प्रकाशन, भोपाल, 1995 पृ0 11 कवि जागनिक
2. सं0 घनश्याम कश्यप, ईसुरी की फागें, शब्द पीठ- इलाहाबाद, 1997 पृ0 132 कवि ईसुरी।
3. सं0 अशोक शर्मा, बुन्देली भाषा और साहित्य, म0प्र0 हि0 ग्रं0 अकादमी, भोपाल 2005, पृ0 85, कवि संतोष सिंह बुंदेला।
4. वही पृष्ठ 88 कवि संतोष सिंह बुंदेला।
5. सं0 श्यामसुन्दर श्रीवास्तव, ठनी साँप नौरा में, सर्वोदय साहित्य संगम मिहौना (भिण्ड) म0प्र0 2004, पृ0 27 कवि रामेश्वर प्रसाद गुप्ता।
6. वही पृ0 27 कवि रामेश्वर प्रसाद गुप्ता।
7. सं0 कैलाश मड़बैया, बुन्देली के प्रतिनिधि कवि, मनीष प्रकाशन भोपाल, 1995 पृ0 65, कवि मुंशीलाल पटैरिया
8. सं0 श्यामसुन्दर श्रीवास्तव, ठनी साँप नौरा में, सर्वोदय साहित्य संगम मिहौना (भिण्ड) म0प्र0 2004 पृ0 23 कवि शिवानन्द मिश्र बुन्देला।
9. वही पृ0 39 कवि रसूल अहमद सागर
10. वही पृ0 39 कवि रसूल अहमद सागर
11. वही पृ0 40 कवि चुन्नीलाल ‘विमल’
12. वही पृ0 40 कवि चुन्नीलाल ‘विमल’
13. वही पृ0 40 कवि चुन्नीलाल ‘विमल’
14. सं0 कैलाश मड़बैया, बुन्देली के प्रतिनिधि कवि मनीष प्रकाशन, भोपाल 1995 पृ0 25 कवि जगदीश सहाय खरे।
15. सं0 श्यामसुन्दर श्रीवास्तव, ठनी साँप नौरा में, सर्वोदय साहित्य संगम, मिहौना (भिण्ड) म0प्र0
16. वही पृ0 46 कवि विजय सिंह पाल।
17. वही पृ0 46 कवि विजय सिंह पाल।

डी0एम0 242, दीनदयाल नगर,
ग्वालियर 474005 म0प्र0

धरोहर / ईसुरी की फागें



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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धरोहर
ईसुरी की फागें
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धरोहर / ईसुरी की फागें
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आऔ को अमरौती खाकें, ई दुनियाँ में आकें।
नंगे गैल पकर गये, धर गये, का करतूत कमाकें।
जर गये, बर गये, धुन्ध लकरियन, धर गये लोग जराकें।
बार बार नईं जनमत ‘ईसुर’, कूख आपनी माँकें।। 1

आगये दिन मरबे के नीरे, चलन जात जे जी रे।
अब बा देह अगन नईं रै गई, हाँत पाँव सब सीरे।
डारन लगे रात हैं नइयाँ, पत्र होत जब पीरे।
जितनी फाग बनावें ‘ईसुर’, गावें पण्डा धीरे।। 2

अपनी बोल समारौ बानी, कौन बड़ी जिन्दगानी।
जेई बानी हौदै बैठारै, जेई चढ़ावै पानी।
जेई बानी रथ पै बैठारै, जेई नरक की खानी।
कहत ‘ईसुरी’ सुन लो भई, जेई जगत्तर जानी।। 3

ऐसो होत नहीं यारी में, दगा दोसदारी में।
चंदन काट बमूर लगाये, केसर की क्यारी में।
चन्दा ऊपर गान परत है, देख लेत थारी में।
‘ईसुर’ कहत निबानै परहै, नई उमर बारी में।। 4

कौ है प्रीत निबाबे बारो, सो मैं एक बिचारो।
मित्र को ऐसे मिलबो चइये, ज्यों कुंजी उर तारो।
जैसें क्षीर में नीर मिलादो, होत कभऊँ न न्यारो।
‘ईसुर’ राम भजन बिन जैसें, होत नहीं निस्तारो।। 5

चौपर है राजन के लानें, जिनै जागीरी खानें।
बड़े भोर सें बिछौ गलीचा, ठान ओई की ठानें।
निस दिन तान लगी चौपर की, मरे जात भैरानें।
कात ‘ईसुरी’ जुर कें बैठे, लवरा कैई सयाने।। 6

जबसें छुई रजऊ की बइयाँ, चैन परत है नइँयाँ।
सूरज जोत परत बेंदी पै, भर भर देत तरइयाँ।
कग्ग सगुन भये मगरे पै, छैला सोऊ अबइयाँ।
कहत ‘ईसुरी’ सुनलो प्यारी, ज्यो पिंजरा की टुइयाँ।। 7

जग में जौलों, राम जिवावै, जे बातें बरकावै।
हाथ पाँव दृग दांत बतीसऊ, सदा ओई तन रावै।
रिन ग्रही ना बनै काऊकौ, ना घर बनों मिटावै।
इतनी बातें रहें ‘ईसुरी’, कुलै दाग ना आवै।। 8

जिदना रजऊ पैरतीं गानो, जिअरा होत बिरानो।
बेंदा बीज दावनी दुर को, पान झलरया कानों।
सरमाला लल्लरी बिचौली, मोरैं हरा सुहानो।
पाँवपोस पैजनियाँ पोरा, ‘ईसुरी’ कौन बखानो।। 9

जो कोउ जोग में भोग जमावै, सो गुनबान कहावै।
सुन्न सिखर सें ऊपर जाकें, आसन अचल जमावै।
धरती में ना आसमान में, अमर मड़ैया छावै।
‘ईसुर’ कात कुटुम अपने सें, आवा गमन मिटावै।। 10

नईयाँ रजऊ तुमारी सानी सब दुनियाँ हम छानी।
सिंघल दीप छान लओ घर-घर, ना पदमिनी दिखानी।
पूरब पच्छिम उत्तर दक्खिन, खोज लई रजधानी।
रूपवंत जो तिरियाँ जग में, ते भर सकतीं पानी।
बड़ भागी हैं ओई ‘ईसुरी’ तिनकी तुम ठकुरानी।। 11

हो गई रजऊ बिदा की बेरा, रहे दिना दस तेरा।
तुमरे लानैं करत रहत तें, दिन में दस दस फेरा।
नित नये खेल होत ते जाँ पर, लै गई बिपत बसेरा।
‘ईसुर’ अपँय पिया के संगै, हो जैंहों नौ-तेरा।। 12

मधुकर होत न प्रीत पुरानी, उत्तम मन की जानी।
पथरी आग तजत है नईंयाँ रहै जुगन भर पानी।
जैसें फूल गुलाब पखुरिया, सूकैं अधिक बसानी।
‘ईसुर’ कहत प्रीत उत्तम की, निबहत भर जिंदगानी।। 13

नैना इनके जगत उजारे, हमें देखतन मारे।
भस्मी चढ़ा बनाकें बाबा, लाखन दये किनारे।
धर धर कें काजर की कोरें, ठाँड़े मानुस फारे।
मानुस की की चली ‘ईसुरी’ भये पाखान दरारे।। 14

लोकसंस्कृति और लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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सम्पादकीय
बात दिल की


लोकसंस्कृति और लोकभाषा का संरक्षण अपरिहार्य
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किसी भी क्षेत्र के विकास में उस क्षेत्र संस्कृति की अहम् भूमिका रहती है। संस्कृति, भाषा, बोली आदि के साथ-साथ उस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, लोकसाहित्य, लोककथाओं, लोकगाथाओं, लोकविश्वासों, लोकरंजन के विविध पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सांस्कृतिकता का, ऐतिहासिकता का लोप होने, उसके विनष्ट होने से उस क्षेत्र में विकास की गति और भविष्य का उज्ज्वल पक्ष कहीं दूर तिरोहित होने लगता है।
बुन्देली संस्कृति के सामने, इस क्षेत्र की ऐतिहासिक विरासत, भाषा-बोली के सामने अपने अस्तित्व का संकट लगातार खड़ा हो रहा है। किसी समय में अपनी आन-बान-शान का प्रतीक रहा बुन्देलखण्ड वर्तमान में गरीबी, बदहाली, पिछड़ेपन के लिए जाना जा रहा है। विद्रूपता यह है कि इसके बाद भी बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने वालों की कमी नहीं है। सांस्कृतिक विरासत से सम्पन्न, स्वाभिमान से ओत-प्रोत, शैक्षणिक क्षेत्र में सफलता के प्रतिमान स्थापित करने वाले इस क्षेत्र की विरासत को पूरी तरह से नष्ट करने का प्रयास किया जा रहा है। विचार करना होगा कि इस क्षेत्र में पर्याप्त नदियाँ हैं; वैविध्यपूर्ण उपजाऊ मृदा है; प्रचुर मात्रा में खनिज सम्पदा है; वनाच्छादित हरे-भरे क्षेत्र हैं फिर भी इस क्षेत्र को विकास के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकार का मुँह ताकना पड़ता है।
संसाधनों की पर्याप्तता के बाद भी क्षेत्र का विकास न होना यदि सरकारों की अरुचि को दर्शाता है तो साथ ही साथ यहां के जनमानस में भी जागरूकता की कमी को प्रदर्शित करता है। किसी भी क्षेत्र, समाज, राज्य, देश के विकास में किसी भी व्यक्ति का योगदान उसी तरह से महत्वपूर्ण होता है जैसे कि उस व्यक्ति का अपने परिवार के विकास में योगदान रहता है। परिवार के विकास के प्रति अरुचि होने से विकासयात्रा बाधित होती है, कुछ ऐसा ही बुन्देलखण्ड के साथ हो रहा है। यहां के निवासी उन्नत अवसरों की तलाश में यहाँ से पलायन कर रहे हैं। युवा पीढ़ी अपने आपको किसी भी रूप में इस क्षेत्र में स्थापित नहीं करना चाहती है। इस कारण से इधर के शैक्षणिक संसाधन, औद्योगिक क्षेत्र, खेत-खलिहान, गाँव आदि बदहाली की मार को सह रहे हैं।
बुन्देलखण्ड के कुछ जोशीले, उत्साही नौजवानों और अनुभवी बुजुर्गों के प्रयासों, प्रदर्शनों, संघर्षों, माँगों आदि के द्वारा बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण हेतु कार्य किया जा रहा है। इस प्रयास के चलते और बुन्देलखण्ड के नाम पर राजनीति करने की मंशा से सरकार ‘पैकेज’ आदि के द्वारा आर्थिक सहायता का झिझकता भरा कदम उठाने लगती हैं। बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक विरासत को देखते हुए इस तरह के प्रयास खुशी नहीं वरन् क्षोभ पैदा करते हैं। यह सब कहीं न कहीं इस क्षेत्र के जनमानस का अपने क्षेत्र के प्रति स्नेह, अपनत्व, जागरूकता में कमी के कारण ही होता है।
जागरूकता में कमी अपनी सांस्कृतिक विरासत को लेकर बहुत अधिक है जो नितान्त चिन्ता का विषय होना चाहिए। युवा पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिकता, ऐतिहासिकता से किसी प्रकार का कोई सरोकार नहीं दिखाई देता है। उसे क्षेत्र के लोकसाहित्य, लोककला, लोकगाथा, लोककथा, लोकविश्वास, लोकपर्व आदि के साथ ही साथ इस क्षेत्र की विशेषताओं के बारे में भी पता करने की आवश्यकता नहीं। किसी क्षेत्र का स्वर्णिम अतीत उसके उज्ज्वल भविष्य की आधारशिला बनता है किन्तु वर्तमान पीढ़ी कोे अतीत को जानने की न तो चाह है और न ही वह इसके भविष्य को उज्ज्वल बनाने को प्रयासरत् है। यहां की बोली-भाषा को अपनाना-बोलना उसे गँवारू और पिछड़ेपन का द्योतक लगता है। इस दोष के शिकार युवा हैं तो बुजुर्गवार भी कम दोषी नहीं हैं जो अपने गौरवमयी अतीत की सांस्कृतिक विरासत का हस्तांतरण नहीं कर रहे हैं।
हमें समझना होगा कि संस्कृति का, विरासत का हस्तांतरण किसी भी रूप में सत्ता का, वर्चस्व का हस्तांतरण नहीं होता है। इस प्रकार का हस्तांतरण क्षेत्र की सांस्कृतिकता का, सामाजिकता का विकास ही करता है। यह ध्यान हम सभी को रखना होगा कि संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन मनुष्य पशु समान होता है और बुन्देलखण्ड को हम संस्कृतिविहीन, भाषाविहीन, बोलीविहीन करके उसकी गौरवगाथा को मिटाते जा रहे हैं। यदि इस दिशा में शीघ्र ही प्रयास न किये गये; वर्तमान पीढ़ी को बुन्देलखण्ड की सांस्कृतिक विरासत से, भाषाई-बोली की मधुरता से परिचित न करवाया गया तो बुन्देलखण्ड को एक शब्द के रूप में केवल शब्दकोश में देख पायेंगे। इसके अलावा हम बुन्देलखण्ड के लोक से सम्बन्धित विविध पक्षों को भी सदा-सदा को विलुप्त कर चुके होंगे। स्थिति बद से बदतर हो इसके पूर्व ही हम सभी को सँभलना होगा, इस दिशा में सकारात्मक प्रयास करना होगा।
स्पंदन के अंक ‘बुन्देलखण्ड विशेष’ के द्वारा लोकसंस्कृति के कुछ पहलुओं को आपके सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। आशा है कि अंक आपको पसंद आयेगा और आपकी अपेक्षाओं पर खरा उतरेगा।