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Friday, July 16, 2010

अपनी नोनी बुन्देली बोली ---- पं0 बाबूलाल द्विवेदी



नवम्बर 09-फरवरी 10 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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बुन्देली कविता ---- अपनी नोनी बुन्देली बोली
पं0 बाबूलाल द्विवेदी



हिन्दी सें मौं लगी बुन्देली सबसे करत किलौली।
जनवा जियै देश कौ जिउ कत, ऊ जिउ की जा बोली।।
आये गंगापुरी-कुढार सें, रुद परतापजू राव।
ओर छोर गंगा सी बै रहॅ धरो ओरछा नाव।।
पडिहारन कौ राज हतौ, जब कम हो गव पर्भाव।
किलो बनावे खौं निउ डारी, करो शेर ने घाव।।
बारा कुंवर हते राजा के बड़े भारती चन्द।
जैजाक भुक्ति (दशार्ण) नाव खौं बदलो उन ने बुन्देलखण्ड।।
ई अपने बुन्देलखण्ड में खेलत रंग रेंगोली।
जनवा जिये देश कौ जिउ कत, ऊ जिउ की जा बोली।।
भये सरगराजा भारती (चंद) के भैया मंझले राजा।
मधुकर शाह ने राज संभारो कालिंजर जस छाजा।।
तिलक लगावे जब अकबर ने लगादई पावंदी।
मानीनई, कत मधुकर शाही आजउ रामानन्दी।।
उनकी रानी कुंवरि गनेश ने देखो काम अधूरो।
ओरछा नाव ससुर दव इनने धाम बना दव पूरो।।
पुक्खन पुक्खन आए राम सुनि जा बोली हमजोली।
जनवा जियै देश कौ जिउ कत, ऊ जिउ की जा बोली।।
जमना सें नरवदा-टोंस, चम्बल नदिया के बीच।
ग्यारा हजार छः सौ पैंसठ गांव, परगना चवालीस।।
आव ककाजू, हवजू, कवजू, बोलत महल मड़ैया।
कोंड़न किसा कानियां के सुन खेलत चैयॉ मैंयॉ।।
गुईंयां गुईंयां चाय चरावें छिरियां, भैंसे, गंईयां।
नोनी बोली सुगर सलौनी और कितउ जा नइयां।
छत्तिस गढ़ी मराठी मालइ, ब्रज भाषा रस घोली।।
जनवा जिये देश कौ जिउ कत, ऊ जिउ की जा बोली।।
जिला सात उत्तर प्रदेश के झांसी और ललितपुर।
चित्रकूट, जालौन, महोबा, बांदा और हमीरपुर।
मध्य प्रदेश के चउदा-दतिया, रायसेन, जब्बलपुर।
गुना, हुसंगाबाद, शिवपुरी, ग्वालियर और छतरपुर।।
पन्ना, सागर, टीकमगढ़, विदिशा, दमोह, नरसिंगपुर।
भारत को जिउ-जो बुन्देलखण्ड-जिला इकईस मिलाकर।
सब के ओंठन ओंठन खेलत हँस-हँस करत ठिठौली।।
जनवा जिये देश कौ जिउ कत, ऊ जिउ की जा बोली।।
कोउ कत जा सिरमौन सवन में, कोउ बेलन की बेली।
हिन्दी के माथे की बिंदिया, कोउ कत इयै सहेली।।
परम रसीली, गुन गरवीली-है एकइ अलबेली।
मिसरी सी मीठी नौनी जा मनहर नई नवेली।।
सब भाषन की बर कैं सेली-पैरा राम ढकेली।
बाँके बोल बुन्देली के जे-‘मधुप’ की मधुर बुन्देली।।
पली, पुसी, खेलत, बड्डी, भइ सन्सकिरत की ओली।
जनवा जिये देश कौ जिउ कत, ऊ जिउ की जा बोली।।

मानसमधुप, साहित्यायुर्वेद रत्न,
ग्राम छिल्ला बानपुर, ललितपुर, उ0प्र0

Thursday, September 17, 2009

बुन्देली कविता - डालचंद्र अनुरागी


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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बुन्देली कविता
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डालचन्द्र अनुरागी

(1) धरती को भगवान
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गांवन के रहवइया-भइया-मेहनत सील किसान।
धरती कौ भगवान कयें हम धरती कौ भगवान।।
ऊसर बंजर धरती तुमनै, खेती जोग बनायी।
कउं बांध हैं डारे तुमनै, कउं पै नहर बहायी।।
न देखी भोरइयां संजा, न देखी दुपहैरी।
अपने हांतन की मेहनत सौं है सुगन्ध फैलायी।।
डटे रहैं, खेतन में ऐसैं, सीमा डटे जवान।
धरती कौ भगवान कयें हम धरती कौ भगवान।।
मेड़न पै मखमल सी दूबा, खेतन में हरयाली।
लहलाती कोमल फसलन कौ है तूं नीकौ माली।।
तोहे गरे कौ हार बनातीं अरसी, मटरी राई।
तेरौ नित अभिनन्दन करती खड़ी खेत की बाली।।
झूम-झूम खेतन में गावैं, फसलैं स्वागत गान।
धरती कौ भगवान कयें, हम धरती कौ भगवान।।
घासफूस की बनी झोपड़ी, कुंआ पास में तेरौ।
जुनई बाजरा की रोटी संग, खारओ मठा महेरौ।।
तोरी शीतलता के आंगू शरमा गई जुन्हइया।
परमानन्द खेतन डीलन में, संजा होय भुरेरौ।।
फटो-पुरानौ, पटका पहरै, दैरओ सबकौ दान।
धरती कौ भगवान कयें, हम धरती कौ भगवान।।
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(2) श्रम की कहानी
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कौन जानै विदेशी असल बुन्देली बानी।
गाँव और खेतन की सुनियो कहानी।।
उग आयी खेतन में, जुनरी-समारी।
खुरपी सैं गोड़ रई गाँवन की नारी।।
लिख दई अंगुरियन सैं, श्रम की कहानी।
गाँव और खेतन की सुनियो कहानी।।
चँहक र्रइं मैंड़न पै गलगलियाँ कारीं।
सखियाँ मिल गाय र्रइं, गाँवन की गारीं।।
लँहगा गुलाबी ओढ़ लुंगरा रंग धानी।
गाँव और खेतन की सुनियो कहानी।।
सरसौं नै बाँध लई, दुल्हा की पगिया।
राई नै ओढ़ लई, पीरी चुनरिया।।
नाच उठी खेतन कै राजा की रानी।
गाँव और खेतन की सुनियो कहानी।।
पुरवा के झूला पै नन्हीं फुहारैं।
उठ र्रइं हिमालय सैं ठण्डी बहारैं।।
चुनरिया भीगी रें अंगिया जुरानी।
गाँव और खेतन की सुनियो कहानी।।
मुंय में वे हरिहर, हांतन में हँसिया।
मूंड़ी पै घैला है, काँधे गूंदरिया।
मेट दई आलस की नाम और निशानी।
गाँव और खेतन की सुनियो कहानी।।
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उरई जिला-जालौन

बुन्देली कविता - सुरेशचंद्र त्रिपाठी


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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बुन्देली कविता
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सुरेश चन्द्र त्रिपाठी


(1) हम जानत हैं
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समरथ का नइँ दोष गुसइयाँ, तुम का जानौ, हम जानत हैं।
घलीं तुम्हाए कभउँ पन्हइयाँ, तुम का जानौ, हम जानत हैं।
करने हते हाथ मोड़ी के पीरे, सो कढ़ुआ काढ़ो तो,
स्यानी बिटिया जैसें काढ़ी, तुम का जानौ, हम जानत हैं।
रुक्का पै लगवाय अँगूठा, शुन्न बढ़ाय हजार लिख लये,
जमींदार है जौन आदमी, तुम का जानौ, हम जानत हैं।
तब से ओखे बँजरा मैं, हर जोतत, दिहिया भई पुरानी,
अभउँ ब्याज कहाँ चुक पाओ, तुम का जानौ, हम जानत हैं।
ब्याज सहित पैसा दै जा, लै जइये तब, कह छोर लै गओ,
कित्ती सूधी धौरी गइया, तुम का जानौ, हम जानत हैं।
ना मेवा, ना भोग मिठाई, दूध, दही, घी, नेनू, रवड़ी,
नोन -मिर्च के संग पनपथू, तुम का जानौ हम जानत हैं।
सर्जी, स्वेटर, कोट, रजाई, ऊनी कम्बल, गद्दा तकिया,
आये ओखे पास कहाँ से, तुम का जानौ हम जानत हैं।
बदरा, बुँदियाँ, हवा बरफ सी, कोहरा, माव-पूस को जाड़ो,
चदरा भर से रात काटबो, तुम का जानौ हम जानत हैं।
अतरे चैथे ठाड़ो द्वारे करत रहत है गारी-गुल्ला,
रामलली के आँखन अँसुआ, तुम का जानौ हम जानत हैं।
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(2) तरसा तरसो
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पानी उगलै नलकूप, नहाबे का बूढ़ो तरसा तरसो।
गोली गुटकै बन्दूक, धुरै फरसा के मन मन माहुर सो।।
करन माहौट चलो जब धाय, इन्द्र राजा की आज्ञा पाय।
देख हदरानो बदरा, खेत चिरइन नें सरसर पानी बरसो।।
सोच रइ घूरे वाली खाद, जमानों कर कर अपनो याद।
यूरिया, डी0ए0पी0 ने हरो कर दओ, खेत लगत्तो बंजर सो।।
मूड़ कटवाबैं निज बरसीम, हुय रहो चारो खुशी असीम।
चलै ना अब हमपै खुर्पी हँसिया, फूली जरिया को मन हरसो।।
बंधत्ते हीरा-मोती जितै, ढिले हैं ट्रिलर ट्रैक्टर उतै।
परे कोने मैं, बातैं कर कर रातै, गये दुखी हर बक्खर सो।।
ददा ने दवा दई छिरकाय, चना अब फूलो नईं समाय।
इली के लगीं ततइयाँ सीं, चोला उनको निज प्रानन का तरसो।।
बचत्ते जाड़े मैं न जांज जितै, हैं खस्सा लग रये आज।
डेक, टी0वी0, सुजुकी ने घरै भरदओ है गागर में सागर सो।।

911/1 राजेन्द्र नगर उरई उ0प्र0
मो0 9450880390

बुन्देली कविता - रामेश्वर प्रसाद गुप्ता 'इंदु'


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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बुन्देली कविता
रामेश्वर प्रसाद गुप्ता ’इंदु’


(1) जी सें जो बुन्देलखण्ड, विश्व में ललाम जू
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रामजू रमाये जहाँ रज-रज, कण-कण,
जी सें जो बुन्देखण्ड विश्व में ललामजू।
ललामजू विराजते हैं विश्व वीर हरदौल,
छत्रसाल आल्हा और ऊदल के धामजू।।
धामजू है रानी झाँ, झलकारी औ अवन्ति,
नारी शक्ति भी प्रचण्ड इंदु आठों यामजू।
यामजू अवध रानी ने तो दिये वनवास,
ओरछा की रानी ने बनाये राजा रामजू। ।
रामजू की आरती उतारतीं हैं बार-बार,
हीरन की वीरन की भूमि कला कामजू।
कामजू है खजुराहो, कालिन्जर, देवगढ़
पन्ना के तो जुगल किसोर अभिरामजू।।
अभिरामजू हैं गिद्धवाहिनी, रतनगढ़,
मैइहर, पीताम्बरा, शीतला के धामजू।
धामजू को भेज दी खड़ाऊँ गये नहीं आप,
अवध लिवाने आया ‘इंदु’ यहाँ रामजू।।
रामजू की रामायण, चित्रकूट के चरित्र,
तुलसी की जन्मभूमि, कर्मभूमि नामजू।
नामजू हैं केशव, बिहारी, ब्रन्दाव्यास, गुप्त,
ईशुरी की फाग ‘इंदु’ लेखनी ललामजू।।
ललामजू है नर्मदा, बेतवा, पहूज, टौंस,
यमुना, धसान, केन, सिन्धु अभिरामजू।
अभिरामजू प्रकृति, कृति कला, ग्राम-ग्राम,
भारत के खंड में, बुन्देलखण्ड रामजू।।
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(2) मिट गईं राम मड़इंयाँ
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पता नहीं आसों के बदरा, का हैं राम करइंयाँ।
आफत के मारे किसान की, भर-भर जात तरइंयाँ।।
जैसे तैसे फसल बोई थी,
सूखी बऊ बिन पानी।
भई फसल पै बदरा ढाड़ें,
अब कैसे करें किसानी।।
जीको तको आसरो अबनों, नेंक काम को नइयाँ।
आफत के मारे किसान की, भर-भर जात तरइंयाँ।।
असवासन दे-दे कें झूठो,
ऊको कर्ज बढ़ा दओ।
माफ करावे के भाषन दे,
राशन और छुड़ा लओ।।
कयँ को सबइ भ्रष्ट भये भारत, अपनी भरें पुटइंयाँ।
आफत के मारे किसान की, भर-भर जात तरइंयाँ।।
मानुष की का, अब तो भूखे,
ढोर बछेरू मर रये।
बैरी बन रये सब किसान के,
अपनो बंडा भर रये।।
साउकार के बँगला बन गये, मिट गईं राम मड़इंयाँ।
आफत के मारे किसान की, भर-भर जात तरइंयाँ।।
सावन सूने, भादों सूने,
जल के लाने तरसे।
चढ़े चैत पै निष्ठुर बदरा,
लगत अबईं हैं बरसे।
‘इंदु’ चेतुआ चरन पखारे, जाओ और गुसइंयाँ।
आफत के मारे किसान की, भर-भर जात तरइंयाँ।।

बड़ागाँव (झाँसी)-284121(उ0प्र0)
मो0-9305172961

बुन्देली कविता - कृपाराम 'कृपालु'


नवम्बर 08-फरवरी 09 ------- बुन्देलखण्ड विशेष
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बुन्देली कविता
कृपाराम ‘कृपालु’


(1) गरीब की मजबूरी
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चुटकी चून बचै नईं घर में,
का तुमें पै के खुवावो।
लाल मेरे रोटी खों इल्लावे।।
हड़िया भर के धरी महेरी,
का लौं लरका खावें।
लाल मेरे रोटी खों इल्लावे।।
डरी मजूरी पांच दिनां की,
देवे में कतरावें।
लाल मेरे रोटी खों इल्लावे।।
काम लेत छाती में चढ़ कें,
ऊपर से गुर्रावे।
लाल मेरे रोटी खों इल्लावे।।
भूके बच्चा संग लगाकें,
कांलौ फोंरा चलायें।
लाल मेरे रोटी खों इल्लावे।।
कत ‘कृपालु’ नेंक हम तर हेरो,
तौं हमहूँ पल जावें।
लाल मेरे रोटी खों इल्लावे।।
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(2) वे बासी खा जातीं
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अलख भोर जग जातीं।
तब कऊँ वे हारें जा पातीं।।
चैंपे चऊवा काढ़ कें दोरें,
फिर वे मठा भमातीं।
तब कऊँ वे हारें जा पातीं।।
गोबर, कूरा, सानी करकें,
वे चूलौ, सुलगातीं।
तब कऊँ वे हारें जा पातीं।।
रोटी पानी सब निपटा कें,
फिर मोड़ा बिलमातीं।
तब कऊँ वे हारें जा पातीं।।
मींड़ दूध में लरका खैहँ ,
वे बासी खा जातीं।
तब कऊँ वे हारें जा पातीं।।
कहैं कृपालु वे मार कछोटा,
अकरी मोथा निरातीं।
तब कऊँ वे हारें जा पातीं।।
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रामनगर, उरई (जालौन) उ0प्र0